Sunday, November 1, 2026
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Housing Project: सुप्रीम कोर्ट देश के हर अटके हाउसिंग प्रोजेक्ट के फ्लैट खरीदारों का फोरम नहीं बन सकता; मुख्य केस में सिद्धांत तय होने तक इंतजार करें या हाईकोर्ट जाएं

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मामले की पृष्ठभूमि: सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं का बढ़ता अंबार

  1. स्थानांतरण याचिकाओं (Transfer Petitions) का मामला:विभिन्न अटकी हुई रियल एस्टेट परियोजनाओं के खरीदारों ने सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरण याचिकाएं दायर कर मांग की थी कि देश के अलग-अलग उच्च न्यायालयों में लंबित उनके मामलों को सुप्रीम कोर्ट में चल रही मुख्य सुनवाई के साथ जोड़ दिया जाए। वकीलों ने तर्क दिया कि बिल्डर परियोजनाएं छोड़कर भाग चुके हैं और हाईकोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
  2. अदालत की मित्र (Amicus Curiae) पर अतिरिक्त बोझ:याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि अदालत द्वारा नियुक्त न्याय मित्र (Amicus Curiae) पहले से ही रियल एस्टेट शिकायतों की जांच कर रहे हैं। इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि न्याय मित्र केवल उन्हीं डेवलपर कंपनियों के समूहों की जांच कर रहे हैं जिनका संज्ञान कोर्ट ने पहले लिया है, और देश के हर प्रोजेक्ट का बोझ न्याय मित्र पर नहीं डाला जा सकता।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

1. “अगर आप आएंगे, तो 200 लोग और आएंगे—अंत कभी नहीं होगा”:

CJI सूर्या कांत ने सुप्रीम कोर्ट में नई याचिकाओं के बढ़ते प्रवाह पर टिप्पणी करते हुए कहा: “हर दिन हम 4-5 लोगों को नई याचिकाएं दाखिल करते देख रहे हैं। यह एक नया जरिया बन गया है। आप यहां आएंगे, फिर उसी प्रोजेक्ट से 200 लोग और आ जाएंगे। इस तरह फैसला कभी नहीं हो पाएगा। इसका कोई अंत नहीं होगा। आपको इंतजार करना होगा या संबंधित उच्च न्यायालयों का रुख करना होगा।”

2. “सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हाईकोर्ट्स अलग रुख नहीं अपना सकते”:

  • अदालत ने रेखांकित किया कि मुख्य (Lead) मामले में शीर्ष अदालत द्वारा तय किए गए कानूनी सिद्धांत देश भर के सभी उच्च न्यायालयों पर बाध्यकारी होंगे।
  • CJI कांत ने कहा: “एक बार जब यह अदालत कोई रुख तय कर लेती है, तो उच्च न्यायालय उससे अलग रुख नहीं अपना सकते। जो भी सिद्धांत इस कोर्ट द्वारा तय किए जाएंगे, हाईकोर्ट्स उसी के अनुसार लंबित मामलों का फैसला करेंगी।”

3. संस्थागत समय का संरक्षण:

  • न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अदालत की मौजूदा कार्यवाहियों को देश की हर अटकी परियोजना तक विस्तारित नहीं किया जा सकता। इससे न्यायालय और न्याय मित्र दोनों पर मुकदमों का असहनीय बोझ पड़ेगा और मुख्य विधिक प्रश्न का निपटारा टलता रहेगा।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 32 एवं 139A (उच्चतम न्यायालय में मुकदमों के अंतरण / Transfer of Cases की शक्ति), अनुच्छेद 141 (सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि की सभी अधीनस्थ व उच्च न्यायालयों पर बाध्यकारिता), रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 (RERA), तथा डेवलपर्स व वित्तीय संस्थानों (बैंकों) की मिलीभगत से अधूरे पड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में फ्लैट खरीदारों (Homebuyers) के मुकदमों के प्रबंधन पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक रुख स्पष्ट किया है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने देश भर के विभिन्न अटके हुए हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के घर खरीदारों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर याचिकाएं (Transfer Petitions), अंतरिम आवेदन (IAs) और विविध आवेदन (MAs) दाखिल करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ा ऐतराज जताया।

शीर्ष अदालत ने दो-टूक व्यवस्था दी कि सर्वोच्च न्यायालय भारत के प्रत्येक विवादित या अटके हुए हाउसिंग प्रोजेक्ट के व्यक्तिगत विवादों को सुलझाने का मंच (Forum) नहीं बन सकता। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि डेवलपर्स और वित्तीय संस्थानों की अनियमितताओं से जुड़े कानूनी पहलुओं पर ‘मुख्य लीड केस’ (Lead Case) अंतिम निस्तारण हेतु पूरी तरह तैयार है। ऐसे में अन्य प्रोजेक्ट्स के फ्लैट खरीदारों को शीर्ष अदालत द्वारा कानूनी सिद्धांत तय किए जाने तक प्रतीक्षा करनी चाहिए या अपने संबंधित उच्च न्यायालयों में राहत तलाशनी चाहिए।

शीर्ष अदालत की तीखी मौखिक टिप्पणियां: ‘यह याचिकाओं का नया चैनल बन गया है’

सुनवाई के दौरान जब विभिन्न अटके प्रोजेक्ट्स के वकीलों ने अपने मुकदमों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग की, तो खंडपीठ ने बढ़ते मुकदमों के बोझ और मुख्य मामले में हो रही देरी पर नाराजगी जताई:

1. ‘रोज लोग IAs और अवमानना याचिकाएं दाखिल कर रहे हैं; मुख्य केस अटक जाएगा’

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं के वकीलों को संबोधित करते हुए कहा: “हमने कभी नहीं सोचा था कि हर दिन लोग नई अंतरिम अर्जियां (IAs), विविध आवेदन (MAs) और अवमानना याचिकाएं दाखिल करते रहेंगे, और हम मुख्य मामले का फैसला किए बिना केवल इन्हीं में उलझे रह जाएंगे। आपके लिए बेहतर यही है कि आप प्रतीक्षा करें। हर दिन हम चार या पांच नए लोगों को याचिकाएं दाखिल करते देख रहे हैं; यह अब एक नया चैनल (New Channel) बन चुका है।”

2. ‘अब आप आए हैं, कल उसी प्रोजेक्ट से 200 लोग और आ जाएंगे’:

  • जब वकीलों ने तर्क दिया कि बिल्डरों ने प्रोजेक्ट छोड़ दिए हैं और हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं, तो CJI ने दो-टूक कहा:“अब आप यहाँ आए हैं, और फिर उसी प्रोजेक्ट से 200 अन्य लोग यहाँ आ जाएंगे। इस तरह तो मुख्य मामले में कभी कोई निर्णय ही नहीं हो पाएगा। इसका कोई अंत नहीं होगा। आपको या तो इंतजार करना होगा या अपने संबंधित उच्च न्यायालयों (High Courts) का दरवाजा खटखटाना होगा।”

3. ‘न्यायमित्र (Amicus) देश के हर प्रोजेक्ट का ऑडिट नहीं कर सकते’:

  • जब याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायमित्र और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) पहले से ही अटके प्रोजेक्ट्स की जांच कर रहे हैं, तो न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट किया:“इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि भारत के प्रत्येक हाउसिंग प्रोजेक्ट की जांच न्यायमित्र को ही करनी होगी। न्यायमित्र केवल उन्हीं डेवलपर कंपनियों के समूहों के प्रोजेक्ट्स की जांच कर रहे हैं जिनका इस न्यायालय ने पूर्व में विशिष्ट संज्ञान लिया है।अन्य सभी को तब तक इंतजार करना होगा जब तक हम फैसला नहीं सुना देते। हम समान प्रकृति की अनगिनत मुकदमों से न तो न्यायमित्र पर और न ही इस अदालत पर अतिरिक्त बोझ डालने जा रहे हैं।”

4. ‘सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत तय होने के बाद हाईकोर्ट्स अलग फैसला नहीं ले सकते’:

  • मुख्य न्यायाधीश ने संविधान के अनुच्छेद 141 के प्रभाव को दोहराते हुए कहा:“हम इन ट्रांसफर याचिकाओं पर इस चरण में विचार करने के बिल्कुल इच्छुक नहीं हैं क्योंकि मुख्य लीड केस अंतिम निस्तारण के लिए पूरी तरह तैयार (Ripe for final disposal) है। एक बार जब यह अदालत कोई विधिक व्यवस्था तय कर देगी, तो उसके बाद उच्च न्यायालय उससे भिन्न रुख नहीं अपना सकते। उच्च न्यायालय हमारे सिद्धांतों के अनुरूप ही बाकी लंबित मामलों का निपटारा करेंगे।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
मामले की प्रकृतिदेश भर में अटके/अधूरे पड़े हाउसिंग प्रोजेक्ट्स (Stalled Real Estate Projects) को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग वाली ट्रांसफर याचिकाएं (Transfer Petitions)।
याचिकाकर्ताओं (होमबॉयर्स) का पक्ष1. बिल्डरों/डेवलपर्स ने प्रोजेक्ट्स को लावारिस छोड़ दिया है और वित्तीय संस्थानों के साथ मिलकर धन की हेराफेरी की है।
2. कई उच्च न्यायालयों ने भिन्न-भिन्न आदेश दिए हैं और कुछ हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं।
3. न्यायमित्र और सीबीआई पहले से जांच कर रहे हैं, अतः सभी प्रोजेक्ट्स को सुप्रीम कोर्ट में एक साथ सुना जाए।
सुप्रीम कोर्ट का रुखसर्वोच्च न्यायालय देश के हर व्यक्तिगत फ्लैट खरीदार का अपीलीय फोरम नहीं बन सकता; मुख्य केस में विधिक सिद्धांत तय होने के बाद हाईकोर्ट्स उनका पालन करेंगे।
अदालत का प्रक्रियात्मक निर्देशयाचिकाकर्ताओं को अपनी ट्रांसफर याचिकाएं वापस लेने की स्वतंत्रता दी गई; वे मुख्य केस के फैसले के बाद उचित स्तर पर राहत मांग सकते हैं।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 139A बनाम अनुच्छेद 141 का न्यायिक संतुलन’

  • अनुच्छेद 139A और मुकदमों के अंतरण की सीमाएं:
    • संविधान के अनुच्छेद 139A के तहत सर्वोच्च न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि समान या सारभूत रूप से समान विधि के प्रश्न कई उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित हों, तो वह उन मामलों को अपने पास मंगा सकता है।
    • किंतु न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस असाधारण शक्ति का प्रयोग केवल कानून के सिद्धांतों (Questions of Law) को संहिताबद्ध करने के लिए किया जाता है, न कि देश के हर प्रोजेक्ट के ऑडिट, कंस्ट्रक्शन मॉनिटरिंग और व्यक्तिगत खरीदारों की रजिस्ट्री कराने के लिए।
  • अधीनस्थ न्यायपालिका और उच्च न्यायालयों की भूमिका:
    • सुप्रीम कोर्ट द्वारा आम्रपाली, यूनिटेक और सुपरटेक जैसे चुनिंदा मामलों में संज्ञान लेने के बाद यह प्रवृत्ति बन गई थी कि देश का हर बायर्स ग्रुप सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख करने लगा था।
    • पीठ का यह निर्णय संस्थागत संतुलन को बहाल करता है: सुप्रीम कोर्ट ‘नीति और कानून’ तय करेगा, जबकि RERA, NCLT और राज्यों के संबंधित उच्च न्यायालय उस कानून के आधार पर व्यक्तिगत मुकदमों में राहत प्रदान करेंगे।

विधिक विवरण

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (दीवानी अंतरण क्षेत्राधिकार / Civil Transfer Jurisdiction)
  • केस संदर्भ: अटके हाउसिंग प्रोजेक्ट्स ट्रांसफर याचिकाओं का बैच [Transfer Petitions (Civil)]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
  • आदेश की तिथि: 28 अक्टूबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: ट्रांसफर याचिकाओं पर इस चरण में विचार करने से इनकार; याचिकाकर्ताओं को मुख्य फैसले का इंतजार करने या उच्च न्यायालयों के समक्ष जाने की स्वतंत्रता।

प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:

  • भारत का संविधान — अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचार), अनुच्छेद 139A (मुकदमों का अंतरण), एवं अनुच्छेद 141 (सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों की बाध्यकारी प्रकृति)
  • रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 (RERA) — घर खरीदारों के अधिकारों का संरक्षण
  • दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) — रियल एस्टेट कंपनियों का कॉर्पोरेट दिवाला समाधान (धारा 5(8)(f) – वित्तीय लेनदार के रूप में बायर्स)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार और रियल एस्टेट मुकदमों का विधिक मानक: ‘सर्वोच्च न्यायालय देश भर के प्रत्येक अटके हाउसिंग प्रोजेक्ट के व्यक्तिगत विवादों का फोरम नहीं बन सकता; शीर्ष अदालत का कार्य डेवलपर्स और वित्तीय संस्थाओं की देयता से जुड़े व्यापक कानूनी सिद्धांतों को तय करना है; एक बार लीड केस में सिद्धांत तय हो जाने के बाद, अनुच्छेद 141 के तहत देश के सभी उच्च न्यायालय और न्यायाधिकरण उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर मामलों का निस्तारण करने के लिए बाध्य हैं।’
  • वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के स्थानांतरण की अर्जियों को मुख्य केस के साथ जोड़ने से इनकार कर दिया है; शीर्ष अदालत अब केवल मुख्य ‘लीड केस’ में अंतिम कानूनी फैसला सुनाएगी, जिसके आधार पर भविष्य में देश के अन्य सभी हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के विवाद हल किए जाएंगे।

Housing Project: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठमुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
मूल मामलाअटकी हुई हाउसिंग प्रोजेक्ट्स से जुड़ी स्थानांतरण याचिकाएं (Transfer Petitions)
मुख्य मुद्दाक्या सुप्रीम कोर्ट को देश की सभी अटकी रियल एस्टेट परियोजनाओं से जुड़ी व्यक्तिगत याचिकाओं पर सुनवाई करनी चाहिए?
अदालत का फैसलातबादला याचिकाएं स्वीकार करने से इंकार; सुप्रीम कोर्ट मुख्य (Lead) केस में कानूनी सिद्धांत तय करेगा, जिसके आधार पर हाईकोर्ट्स अपने-अपने मामलों का निपटारा करेंगी।
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