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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?
- ट्रायल कोर्ट का आदेश (6 अक्टूबर):वर्ष 2002 की लूटपाट से जुड़ी एक एफआईआर की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट में बार-बार पासओवर (Passover) दिए जाने के बावजूद कोई सरकारी वकील (Public Prosecutor) पेश नहीं हुआ। ट्रायल जज ने भारी रोष व्यक्त करते हुए राज्य पर ₹5,000 का जुर्माना (Cost) लगाया और आदेश दिया कि यदि एक सप्ताह में यह राशि जमा नहीं होती, तो इसे दिल्ली के अभियोजन निदेशक मकसूद अहमद के वेतन से वसूला जाए।
- हाईकोर्ट में याचिका:अभियोजन निदेशक मकसूद अहमद ने ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनके वकील ने दलील दी कि नियमित सहायक लोक अभियोजक (APP) 21 सितंबर से छुट्टी पर थे और शहर में अभियोजकों की भारी कमी है। इसके अलावा, निदेशक का पक्ष सुने बिना ही उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय कर वेतन कटौती का आदेश जारी कर दिया गया।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
1. “ट्रायल कोर्ट की पीड़ा स्वाभाविक, लेकिन वेतन काटना अनुचित”:
न्यायामूर्ति गिरीश कठपालिया ने निचली अदालत के जज की स्थिति पर सहानुभूति व्यक्त की, लेकिन निदेशक के वेतन काटने के तरीके को गलत माना: “आक्षेपित आदेश ट्रायल जज की पीड़ा की एक स्पष्ट अभिव्यक्ति है, जो मुकदमों के बोझ और जमानत मामलों के त्वरित निपटारे की उच्च न्यायालयों की अपेक्षाओं का सामना करते हैं। साथ ही, किसी भी दुराचार (Malfeasance or Misfeasance) के विशिष्ट अवलोकन के बिना याचिकाकर्ता के वेतन से लागत की वसूली के निर्देश प्रथम दृष्टया उचित नहीं होंगे।”
2. राज्य सरकार पर हर्जाने का स्टे देने से इंकार:
- हाईकोर्ट ने अभियोजन निदेशक मकसूद अहमद के वेतन से पैसे वसूलने के आदेश पर तो स्टे लगा दिया, लेकिन राज्य सरकार पर लगाए गए ₹5,000 के हर्जाने को हटाने से साफ इंकार कर दिया।
- पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है जो यह दिखाए कि राज्य सरकार अभियोजकों की कमी को दूर करने के लिए कोई गंभीर कदम उठा रही है। राज्य ने हर्जाने के आदेश को चुनौती तक नहीं दी है।
नई दिल्ली: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 18 व 19 / दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 24 व 25 (लोक अभियोजकों और सहायक लोक अभियोजकों की नियुक्ति का वैधानिक दायित्व), भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (त्वरित विचारण का मौलिक अधिकार / Right to Speedy Trial), आपराधिक मुकदमों में सरकारी वकीलों की अनुपस्थिति पर अदालतों द्वारा लगाया जाने वाला हर्जाना (Costs on State), तथा प्रशासनिक प्रमुखों के वेतन से व्यक्तिगत रिकवरी के विधिक मानकों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और सुधारात्मक आदेश पारित किया है।
दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया (Justice Girish Kathpalia) की एकल पीठ ने दिल्ली के अभियोजन निदेशक (Director of Prosecution) मकसूद अहमद द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के 6 अक्टूबर 2026 के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसके तहत सुनवाई के दौरान सरकारी वकील के अनुपस्थित रहने पर उनके वेतन से ₹5,000 की रिकवरी करने का निर्देश दिया गया था।
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के न्यायाधीश की पीड़ा और बढ़ते मुकदमों के दबाव को स्वाभाविक माना, किंतु व्यवस्था दी कि बिना किसी विशिष्ट कदाचार या दुर्भावना (Malfeasance or Misfeasance) के निष्कर्ष के सीधे अभियोजन निदेशक के वेतन से कटौती का आदेश प्रथम दृष्टया अनुचित है। हालांकि, हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार पर लगाए गए ₹5,000 के जुर्माने पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया और नाराजगी जताई कि राजधानी में सरकारी वकीलों की भारी कमी को दूर करने के लिए राज्य सरकार कोई गंभीर कदम नहीं उठा रही है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘अभियोजकों की कमी एक बारहमासी समस्या बन चुकी है’
न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने आपराधिक न्याय प्रणाली में सरकारी वकीलों की भारी किल्लत पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “सरकारी वकीलों (Prosecutors) की कमी एक बारहमासी समस्या (Perennial Problem) बन चुकी है, जो आपराधिक मुकदमों और यहाँ तक कि ज़मानत मामलों (Bail Matters) के निस्तारण को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है। यह कोई नई समस्या नहीं है। अदालतें लगातार तेजी से मामलों के निपटारे का प्रयास कर रही हैं, किंतु बुनियादी ढांचे और वकीलों की कमी इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा है।”
2. ‘ट्रायल जज की हताशा समझ में आती है, किंतु वेतन से रिकवरी अनुचित’:
- उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश का विश्लेषण करते हुए कहा:“आक्षेपित आदेश ट्रायल जज की पीड़ा और हताशा की स्पष्ट अभिव्यक्ति है, जो मुकदमों के भारी दबाव (Overflowing Dockets) और उच्च अदालतों द्वारा ज़मानत मामलों व मुकदमों के त्वरित निस्तारण की अपेक्षाओं का सामना कर रहे हैं।किंतु इसके साथ ही, याचिकाकर्ता के स्तर पर किसी विशिष्ट कदाचार या दायित्वहीनता (Malfeasance or Misfeasance) के ठोस निष्कर्ष के अभाव में, सीधे उनके वेतन से हर्जाने की वसूली का निर्देश देना प्रथम दृष्टया उचित नहीं होगा।”
3. ‘राज्य सरकार पर लगाया गया हर्जाना बरकरार रहेगा; सरकार ने कोई गंभीर कदम नहीं उठाए’:
- पीठ ने दिल्ली सरकार (NCT of Delhi) पर लगाए गए ₹5,000 के जुर्माने पर रोक लगाने से इनकार करते हुए तल्ख टिप्पणी की:“मेरे समक्ष ऐसा कोई रिकॉर्ड या साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि राज्य सरकार अभियोजकों की इस भारी कमी को दूर करने के लिए कोई गंभीर कदम उठा रही है।यहाँ तक कि राज्य सरकार ने निचली अदालत द्वारा लगाए गए हर्जाने के आदेश को चुनौती तक नहीं दी है। इसलिए, मैं राज्य पर हर्जाना लगाने के आदेश पर रोक लगाने का कोई इच्छुक नहीं हूँ।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2002–2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| याचिकाकर्ता | मकसूद अहमद — अभियोजन निदेशक (Director of Prosecution), दिल्ली सरकार। |
| प्रतिवादी पक्ष | राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली / गृह विभाग)। |
| मूल आपराधिक मामला | वर्ष 2002 की एक पुरानी FIR (डकैती और लूट के गंभीर आरोपों से संबंधित मुकदमा), जो 24 वर्षों से ट्रायल कोर्ट में लंबित है। |
| निचली अदालत की कार्यवाही (06.10.2026) | ट्रायल कोर्ट में सुनवाई के दौरान बार-बार पासओवर (Passover) दिए जाने के बावजूद राज्य की ओर से कोई सरकारी वकील उपस्थित नहीं हुआ। नियमित APP 21 सितंबर 2026 से चिकित्सा अवकाश पर थे। |
| ट्रायल कोर्ट का आक्षेपित आदेश | अदालत ने राज्य पर ₹5,000 का हर्जाना लगाया और आदेश दिया कि यदि एक सप्ताह में यह राशि जमा नहीं की जाती है, तो इसे अभियोजन निदेशक मकसूद अहमद के वेतन से वसूल किया जाए। आदेश की प्रति गृह सचिव को आवश्यक अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु भेजी गई। |
| याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें | 1. दिल्ली में अभियोजकों की भारी कमी है, जिसके चलते एक-एक वकील को 3-4 अदालतों का प्रभार संभालना पड़ता है। 2. वेतन से रिकवरी का आदेश देने से पूर्व उन्हें सुनवाई का कोई अवसर (Audi Alteram Partem) नहीं दिया गया। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | निदेशक के वेतन से रिकवरी पर अंतरिम रोक; राज्य सरकार पर जुर्माना बरकरार; सरकार को एक सप्ताह पूर्व स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश; अगली सुनवाई 3 फरवरी 2027 को नियत। |
विधिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 21, त्वरित न्याय और राज्य की विफलता’
- आपराधिक न्याय प्रणाली की रीढ़ हैं सरकारी वकील:
- दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 24 और 25 (अब BNSS की धारा 18 और 19) के तहत राज्य सरकार पर यह वैधानिक दायित्व है कि वह प्रत्येक सत्र न्यायालय और मजिस्ट्रेट अदालत में मुकदमों के संचालन हेतु पर्याप्त संख्या में लोक अभियोजक (PP) और सहायक लोक अभियोजक (APP) नियुक्त करे।
- दिल्ली की अधीनस्थ अदालतों में सैकड़ों पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में गवाहों की गवाही नहीं हो पाती, जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की ज़मानत याचिकाओं पर अभियोजन का पक्ष नहीं आ पाता, और 2002 जैसे पुराने मुकदमों का ट्रायल दशकों तक खिंचता रहता है।
- निजी देयता बनाम प्रशासनिक पद:
- उच्च न्यायालय का यह दृष्टिकोण विधिक रूप से अत्यंत संतुलित है कि प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारियों को व्यवस्थागत विफलता (Systemic Failure) के लिए व्यक्तिगत रूप से दंडित नहीं किया जा सकता, जब तक कि उनके व्यक्तिगत दुर्भावनापूर्ण कृत्य (Personal Malfeasance) का कोई प्रमाण न हो।
- हालांकि, राज्य सरकार पर हर्जाना बरकरार रखकर अदालत ने कार्यपालिका को यह कड़ा संदेश दिया है कि अभियोजन तंत्र की उपेक्षा को न्यायपालिका मूकदर्शक बनकर स्वीकार नहीं करेगी।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय (मूल आपराधिक रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: मकसूद अहमद बनाम राज्य (NCT दिल्ली) [CRL.M.C. / दिल्ली हाईकोर्ट]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 27 अक्टूबर 2026
- आगामी निर्णायक सुनवाई: 3 फरवरी 2027
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (अभियोजन निदेशक) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश गुप्ता (Senior Advocate Ramesh Gupta), अधिवक्ता हेमंत गुप्ता के सहयोग से।
- प्रतिवादी (NCT दिल्ली राज्य) की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) मनजीत आर्य (Manjeet Arya)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (त्वरित विचारण और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) एवं अनुच्छेद 227 (अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का अधीक्षण)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 24, 25 व 25A (अभियोजन निदेशालय एवं सरकारी वकीलों की नियुक्ति) / BNSS 2023 की धारा 18, 19 व 20
- प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत (Audi Alteram Partem) — बिना सुनवाई किसी लोक सेवक के वेतन से कटौती की अमान्यता
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- आपराधिक मुकदमों में अभियोजकों की उपलब्धता का विधिक मानक: ‘पर्याप्त संख्या में सरकारी वकीलों की तैनाती सुनिश्चित करना राज्य सरकार का प्राथमिक संवैधानिक और वैधानिक दायित्व है; अभियोजकों की कमी के कारण मुकदमों में विलंब होने पर राज्य पर हर्जाना लगाना न्यायोचित है, किंतु व्यवस्थागत विफलता के लिए व्यक्तिगत रूप से अभियोजन निदेशक के वेतन से रिकवरी का आदेश बिना कदाचार की पुष्टि के नहीं दिया जा सकता।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: दिल्ली हाईकोर्ट ने अभियोजन निदेशक मकसूद अहमद के वेतन से ₹5,000 की कटौती के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है; ट्रायल कोर्ट द्वारा राज्य पर लगाया गया हर्जाना यथावत लागू रहेगा; दिल्ली सरकार को राजधानी में सरकारी वकीलों की रिक्तियों और भर्ती के संबंध में सुनवाई की अगली तारीख (3 फरवरी 2027) से कम से कम एक सप्ताह पूर्व विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया गया है।
Shortage Of Prosecutor: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया (Justice Girish Kathpalia) |
| मामला/साइटेशन | मकसूद अहमद बनाम दिल्ली राज्य NCT (Maqsood Ahmed v State NCT of Delhi) |
| याचिकाकर्ता | मकसूद अहमद (अभियोजन निदेशक, दिल्ली) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश गुप्ता एवं अधिवक्ता हेमंत गुप्ता |
| प्रतिवादी/राज्य | दिल्ली राज्य सरकार | प्रतिनिधित्व: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) मनजीत आर्य |
| मूल विवाद | निचली अदालत द्वारा सुनवाई के दौरान सरकारी वकील की अनुपस्थिति पर राज्य पर ₹5,000 का हर्जाना लगाना और उसे निदेशक के वेतन से वसूलने का आदेश। |
| अदालत का फैसला | आंशिक अंतरिम राहत; अभियोजन निदेशक के वेतन से ₹5,000 वसूलने के आदेश पर स्टे, लेकिन राज्य पर लगाए गए हर्जाने पर स्टे देने से इंकार। |

