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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?
- अकाउंट निष्क्रिय करना और GAC का दरवाजा खटखटाना:याचिकाकर्ता सार्थक भगत के इंस्टाग्राम अकाउंट्स को मेटा द्वारा कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स के उल्लंघन का हवाला देकर बिना किसी पूर्व नोटिस या जवाब का अवसर दिए निष्क्रिय (Disable) कर दिया गया था। इन-ऐप रिव्यू में कोई राहत न मिलने पर उन्होंने ‘सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021’ के नियम 3A के तहत स्थापित शिकायत अपीलीय समिति (GAC – Grievance Appellate Committee) में 11 सितंबर को अपील दायर की।
- 30 दिनों की वैधानिक सीमा का उल्लंघन:नियमों के अनुसार GAC को 30 दिनों के भीतर फैसला सुनाना होता है, लेकिन निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी अपील लंबित रहने पर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख कर केंद्र सरकार को निर्देश देने और अकाउंट बहाल करने की मांग की थी।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी सिद्धांत
1. “सार्वजनिक कार्य बनाम निजी व्यावसायिक सेवा”:
न्यायमूर्ति महाजन ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत ‘परमादेश’ (Writ of Mandamus) केवल तभी जारी किया जा सकता है जब किसी संस्था पर कोई वैधानिक या सार्वजनिक कर्तव्य का दायित्व हो। मेटा एक निजी संस्था है जो उपयोगकर्ताओं के साथ संविदात्मक (Contractual) संबंधों पर काम करती है, इसलिए उसके खिलाफ रिट पोषणीय (Maintainable) नहीं है।
2. “सिविल सूट ही एकमात्र उपाय”:
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी उपयोगकर्ता का अकाउंट गलत तरीके से ब्लॉक किया गया है, तो वह नुकसान की भरपाई या अकाउंट बहाली के लिए सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है, न कि संवैधानिक अदालत का।
3. GAC के लिए त्वरित निस्तारण का आदेश:
यद्यपि कोर्ट ने मेटा या केंद्र सरकार के खिलाफ कोई रिट जारी करने से इंकार कर दिया, लेकिन उसने IT नियम, 2021 के तहत गठित शिकायत अपीलीय समिति (GAC) को निर्देश दिया कि वह सार्थक भगत की लंबित अपील पर शीघ्र अति शीघ्र कानून के अनुसार निर्णय पारित करे।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार बनाम ‘अन्य प्राधिकारी’ व ‘लोक कर्तव्य’ का विधिक दायरा), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) सहपठित सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (IT Rules, 2021) के नियम 3A (शिकायत अपीलीय समिति / Grievance Appellate Committee – GAC), सोशल मीडिया मध्यवर्तियों (Social Media Intermediaries) द्वारा कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स के उल्लंघन पर अकाउंट सस्पेंशन/डिसेबल करने की निजी संविदात्मक प्रकृति, तथा परमादेश रिट (Writ of Mandamus) जारी करने के अनिवार्य विधिक मानकों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी न्यायिक व्यवस्था दी है।
दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) की एकल पीठ ने सार्थक भगत (Sarthak Bhagat) द्वारा इंस्टाग्राम अकाउंट्स को बिना पूर्व नोटिस डिसेबल किए जाने के खिलाफ दायर रिट याचिका का निस्तारण करते हुए स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी कि मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक. (Meta Platforms) के खिलाफ इंस्टाग्राम अकाउंट बहाली के लिए अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पोषणीय (Maintainable) नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि यदि किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने निजी संविदात्मक सेवा शर्तों या ‘कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स’ के आधार पर किसी यूजर का अकाउंट ब्लॉक या सस्पेंड किया है, तो उसके खिलाफ विधिक उपचार दीवानी वाद (Civil Suit) दायर करना है, न कि उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना। हालांकि, अदालत ने केंद्र सरकार द्वारा गठित शिकायत अपीलीय समिति (GAC) को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की लंबित अपील पर शीघ्रता से निर्णय ले।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘मेटा कोई लोक कर्तव्य (Public Duty) नहीं निभाता; संचालन पूर्णतः निजी है’
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने की अनिवार्य पूर्व-शर्तों का विश्लेषण करते हुए अपने 27 अक्टूबर 2026 के आदेश में दर्ज किया: “इंस्टाग्राम भले ही सूचना के प्रसार और जनमत (Public Opinion) को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, किंतु इसका प्राथमिक कार्य अभिव्यक्ति के लिए एक मंच (Platform for Expression) प्रदान करना मात्र है। सार्वजनिक विमर्श इसके संचालन का एक परिणाम है, न कि इसका कोई सार्वजनिक कर्तव्य। इसका संचालन पूरी तरह से निजी प्रकृति (Private in nature) का है, और किसी भी सरकारी अधिदेश ने इसे राज्य के किसी पारंपरिक कार्य को नहीं सौंपा है। प्रतिवादी संख्या 3 (मेटा) न तो किसी सार्वजनिक कर्तव्य के निर्वहन में ऐसा मंच प्रदान करने के लिए बाध्य है और न ही अपनी सेवाएं देने के लिए कानूनी रूप से विवश है। संचार और सामाजिक संपर्क के लिए केवल एक मंच प्रदान करना अपने आप में कोई सरकारी कार्य या राज्य की जिम्मेदारियों से जुड़ा कार्य नहीं बन जाता।”
2. ‘उपचार सिविल सूट है, रिट याचिका नहीं’:
- उच्च न्यायालय ने दो-टूक कहा कि मेटा और उसके यूजर्स के बीच का संबंध एक निजी अनुबंध (Private Contract) पर आधारित है, जो प्लेटफॉर्म की ‘सेवा की शर्तों’ (Terms of Service) और ‘कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स’ द्वारा नियंत्रित होता है।
- अनुबंध के कथित उल्लंघन या अनुचित अकाउंट टर्मिनेशन के खिलाफ उपचार सक्षम दीवानी अदालत में दीवानी मुकदमा (Civil Suit for Breach of Contract / Damages) दायर करना है, न कि संवैधानिक रिट याचिका।
3. परमादेश (Mandamus) की विफलता और GAC को निर्देश:
- याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह मेटा से आईटी नियमों का पालन कराए।
- अदालत ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि परमादेश (Writ of Mandamus) जारी करने के लिए यह सिद्ध करना अनिवार्य है कि किसी वैधानिक कर्तव्य (Statutory Duty) की जानबूझकर उपेक्षा की गई है, जो वर्तमान मामले में सरकार की ओर से प्रदर्शित नहीं होती।
- हालांकि, यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता ने आईटी नियम, 2021 के नियम 3A के तहत शिकायत अपीलीय समिति (GAC) के समक्ष 11 सितंबर को अपील दायर की थी, जो निर्धारित 30 दिनों की वैधानिक अवधि बीतने के बाद भी लंबित थी, हाईकोर्ट ने GAC को निर्देश दिया कि वह इस अपील पर कानून के अनुसार शीघ्र निर्णय पारित करे।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| याचिकाकर्ता | सार्थक भगत (Sarthak Bhagat) — इंस्टाग्राम यूजर/कंटेंट क्रिएटर। |
| प्रतिवादी पक्ष | 1. भारत संघ (इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय / MeitY)। 2. शिकायत अपीलीय समिति (GAC)। 3. मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक. (Meta Platforms Inc.) — इंस्टाग्राम की मूल कंपनी। |
| विवाद का मूल उद्गम | याचिकाकर्ता के इंस्टाग्राम अकाउंट्स को बिना किसी पूर्व कारण बताओ नोटिस (Prior Show-Cause Notice) या व्यक्तिगत सुनवाई के मेटा द्वारा ‘कम्युनिटी गाइडलाइंस’ के उल्लंघन का हवाला देकर डिसेबल कर दिया गया। |
| याचिकाकर्ता के प्रयास | 1. प्लेटफॉर्म के आंतरिक समीक्षा तंत्र (In-app Review) का प्रयोग किया, किंतु कोई ठोस कारण बताए बिना बहाली से इनकार कर दिया गया। 2. आईटी नियम, 2021 के नियम 3A के तहत 11 सितंबर को सरकारी अपीलीय समिति (GAC) का रुख किया, किंतु 30 दिन बीत जाने पर भी अपील का निस्तारण नहीं हुआ। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | 1. मेटा के विरुद्ध रिट याचिका पोषणीय नहीं (Not Maintainable) घोषित की गई; दीवानी अदालत में सिविल सूट दाखिल करने की छूट दी गई। 2. परमादेश की मांग नामंजूर। 3. GAC को निर्देश दिया गया कि वह लंबित अपील को बिना किसी अनावश्यक विलंब के तुरंत निस्तारित करे। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 226, ‘अन्य प्राधिकारी’ और सोशल मीडिया मध्यवर्ती’
- अनुच्छेद 226 बनाम निजी कंपनियां (The ‘Public Function’ Test):
- सर्वोच्च न्यायालय ने फेडरल बैंक लिमिटेड बनाम सागर थॉमस [(2003) 10 SCC 733] और के.के. सक्सेना बनाम इंटरनेशनल कमीशन ऑन इरिगेशन [(2015) 4 SCC 670] में यह सिद्धांत सुस्थापित किया है कि किसी निजी निकाय के विरुद्ध अनुच्छेद 226 के तहत रिट तभी जारी की जा सकती है जब वह निकाय किसी सार्वजनिक कर्तव्य या राज्य-समतुल्य कार्य का निर्वहन कर रहा हो।
- भले ही आज फेसबुक, इंस्टाग्राम या यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का जनता पर व्यापक प्रभाव है और वे अभिव्यक्ति का मुख्य डिजिटल जरिया बन चुके हैं, किंतु विधिक दृष्टि से उनका अस्तित्व एक व्यावसायिक, लाभ-उन्मुख और निजी अनुबंध पर आधारित सेवा है। उन्हें राज्य द्वारा कोई संप्रभु कार्य (Sovereign Function) नहीं सौंपा गया है।
- विधिक अंतर: सरकारी ब्लॉकिंग (धारा 69A) बनाम प्लेटफॉर्म द्वारा इन-हाउस बैन:
- केस 1 (सरकारी आदेश): जब केंद्र सरकार आईटी एक्ट की धारा 69A के तहत किसी खाते को ब्लॉक करने का कानूनी निर्देश देती है (जैसे ‘ब्रिंग बैक बैलेट’ मामला), तो वहां राज्य की संप्रभु कार्रवाई और मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19) का हनन होता है; अतः वहां रिट याचिका पूरी तरह पोषणीय होती है।
- केस 2 (प्लेटफॉर्म का आंतरिक निर्णय): जब मेटा स्वयं अपनी ‘कम्युनिटी गाइडलाइंस’ के उल्लंघन के आधार पर किसी यूजर का अकाउंट बंद करता है (जैसा कि सार्थक भगत के मामले में हुआ), तो यह संविदा के उल्लंघन (Breach of User Agreement) का एक विशुद्ध निजी विवाद है, जिसके लिए सिविल कोर्ट में वाद दाखिल करना ही एकमात्र विधिक उपाय है।
- आईटी नियम, 2021 के तहत GAC का महत्व:
- केंद्र सरकार ने 2023 में आईटी नियमों में संशोधन कर शिकायत अपीलीय समिति (GAC) का गठन इसी उद्देश्य से किया था ताकि आम यूजर्स को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के मनमाने फैसलों के खिलाफ एक सस्ता, तेज और ऑनलाइन अर्ध-न्यायिक अपीलीय मंच मिल सके।
- हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि यूजर सीधे रिट कोर्ट नहीं आ सकता, तो उसे नियम 3A के तहत GAC के वैधानिक मंच का पूर्ण लाभ मिलना चाहिए और GAC को 30 दिनों के भीतर अपना फैसला सुनाना अनिवार्य है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय (मूल रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: सार्थक भगत बनाम भारत संघ व अन्य [W.P.(C) / दिल्ली हाईकोर्ट]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति अमित महाजन (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 27 अक्टूबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: रिट याचिका निस्तारित; मेटा के खिलाफ रिट खारिज, सिविल सूट का विधिक विकल्प खुला; GAC को अपील त्वरित तय करने का निर्देश।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (सार्थक भगत) की ओर से: अधिवक्ता यश वर्धन कौशिक (Advocate Yash Vardhan Kaushik)।
- प्रतिवादी संख्या 1 व 2 (भारत संघ व GAC) की ओर से: अधिवक्ता मोहित बंसल, भावना एवं दीपांक यादव।
- प्रतिवादी संख्या 3 (मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक.) की ओर से: अधिवक्ता अमी राणा (Advocate Amee Rana), यश करुणाकरण एवं निवेदिता सुधीर।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार) एवं अनुच्छेद 12 (राज्य की परिभाषा—निजी मध्यवर्ती शामिल नहीं)
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) — धारा 79 (मध्यवर्ती का सुरक्षित बंदरगाह / Safe Harbour)
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (IT Rules, 2021):
- नियम 3A — शिकायत अपीलीय समिति (GAC) द्वारा अपीलों का 30 दिनों में निपटारा
- नियम 3(1)(b) — मध्यवर्तियों द्वारा आचार संहिता का पालन व खातों का निलंबन
- विशिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (Specific Relief Act, 1963) — संविदा के प्रवर्तन व निषेधाज्ञा हेतु सिविल वाद
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और रिट क्षेत्राधिकार का विधिक मानक: ‘सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा अपने कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स के तहत अकाउंट ब्लॉक या टर्मिनेट करना एक निजी संविदात्मक कार्रवाई है; चूंकि मेटा जैसी कंपनियां किसी लोक कर्तव्य या सरकारी दायित्व का निर्वहन नहीं करती हैं, इसलिए उनके खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पोषणीय नहीं है; पीड़ित यूजर के लिए उचित विधिक उपचार सक्षम दीवानी अदालत में सिविल वाद दायर करना अथवा आईटी नियम 2021 के तहत शिकायत अपीलीय समिति (GAC) के समक्ष अपील प्रस्तुत करना है।’
- वर्तमान स्थिति: दिल्ली हाईकोर्ट के इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि मेटा द्वारा मनमाने ढंग से अकाउंट बंद किए जाने पर यूजर सीधे हाईकोर्ट में रिट दाखिल नहीं कर सकते; उन्हें या तो GAC के पास जाना होगा या निचली दीवानी अदालत में सिविल वाद दायर करना होगा।
Social Account: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) |
| मामला/साइटेशन | सार्थक भगत बनाम भारत संघ व अन्य (Sarthak Bhagat v Union of India & Ors.) |
| याचिकाकर्ता | सार्थक भगत | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता यश वर्धन कौशिक |
| प्रतिवादी पक्ष | 1. भारत संघ | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता मोहित बंसल व अन्य 2. मेटा प्लेटफॉर्म्स (Meta) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता अमी राणा व अन्य |
| मूल विवाद | बिना पूर्व नोटिस या कारण बताए इंस्टाग्राम अकाउंट्स को ब्लॉक/अक्षम कर देना और GAC के समक्ष अपील लंबित रहना। |
| अदालत का फैसला | 1. रिट याचिका गैर-रखरखाव योग्य (Not Maintainable): मेटा के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत रिट नहीं चल सकती; पीड़ित सिविल कोर्ट जाए। 2. GAC को निर्देश: शिकायत अपीलीय समिति (GAC) को याचिकाकर्ता की पेंडिंग अपील का त्वरित निस्तारण करने का आदेश |

