Sunday, November 1, 2026
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Service Reinstates: किशोरावस्था और कॉलेज के विवादों में हुए बरी मामलों को न बताना बर्खास्तगी का स्वतः आधार नहीं; 2011 में नियुक्त सिपाही की सेवा बहाली का केस जानें

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मामले की पृष्ठभूमि: कॉलेज विवाद से लेकर 10 साल की बेदाग सेवा तक

  1. किशोरावस्था के मामले और बरी होना:याचिकाकर्ता का जन्म 1985 में हुआ था। वर्ष 2003 में (जब उसकी उम्र 17-18 वर्ष थी) उसके खिलाफ पहला मामला दर्ज हुआ था। दूसरा मामला अगस्त 2006 में दर्ज हुआ जब वह 20 वर्ष का था और कॉलेज छात्र संघ का अध्यक्ष था। यह मामला कॉलेज विवाद से जुड़ा था। 2011 में पुलिस भर्ती से वर्षों पहले दोनों मामलों में अदालत ने उसे बरी कर दिया था।
  2. 2011 में भर्ती और बाद का खुलासा:2011 में कांस्टेबल पद के लिए आवेदन करते समय उसने शुरुआती फॉर्म में ‘नहीं’ लिखा था, लेकिन बाद के हलफनामे में उसने पूरी जानकारी दे दी थी। मार्च 2011 में पुलिस सत्यापन (Police Verification) पूरा होने के बाद 30 मई 2011 को उसे कांस्टेबल नियुक्त किया गया।
  3. सब-इंस्पेक्टर (SI) परीक्षा 2017 में स्वेच्छा से प्रकटीकरण:2017 में उसने सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा दी और लिखित, शारीरिक व इंटरव्यू पास किया। इस दौरान उसने स्वयं दोनों मामलों की पूरी जानकारी फॉर्म में दर्ज की। इसके बाद 2021 में विभाग ने 10 साल बाद उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू कर बर्खास्त कर दिया था।

हाईकोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष और सिद्धांत

1. धोखाधड़ी या कपटपूर्ण मंशा का अभाव:

कोर्ट ने पाया कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले पहली बार के आवेदक के रूप में याचिकाकर्ता का मानना था कि जिन मामलों में बरी (Acquittal) हो चुका है, उन्हें बताना आवश्यक नहीं है। 2017 की सब-इंस्पेक्टर परीक्षा में उसकी ओर से स्वयं विवरण दर्ज करना यह साबित करता है कि उसने जानबूझकर कोई तथ्य नहीं छिपाया था।

2. अनुच्छेद 226 के तहत संवैधानिक अधिकार:

राज्य सरकार का यह तर्क खारिज कर दिया गया कि याचिकाकर्ता ने डीआईजी (DIG) के दंड घटाने के आदेश को चुनौती नहीं दी थी, इसलिए वह हाईकोर्ट नहीं आ सकता। कोर्ट ने माना कि आजीविका बचाने के लिए विभागीय स्तर पर कम की गई सजा स्वीकार करने वाला कर्मचारी बाद में स्वप्रेरणा से की गई बर्खास्तगी को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती देने का अधिकार नहीं खोता।

3. यांत्रिक और मनमानी कार्यवाही:

अदालत ने माना कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी और पुनरीक्षण प्राधिकारी (ADGP/DGP) ने कर्मचारी की 10 वर्षों की “मेधावी सेवा” को पूरी तरह अनदेखा करके यांत्रिक और मनमाने ढंग से बर्खास्तगी का आदेश पारित किया था।

जबलपुर: भारत का संविधान के अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का असाधारण रिट क्षेत्राधिकार), अनुच्छेद 311(2) (लोक सेवकों की पदच्युति व निष्कासन पर संवैधानिक संरक्षण), सेवा न्यायशास्त्र में आनुपातिकता का सिद्धांत (Doctrine of Proportionality), अनुशासनात्मक कार्यवाहियों में अत्यधिक देरी (Inordinate delay of 10 years in departmental inquiry), दुर्भावनापूर्ण पुनरीक्षण (Malice in law and fact in suo motu revision), तथा पूर्व आपराधिक मामलों के प्रकटीकरण/गैर-प्रकटीकरण के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय की ऐतिहासिक नज़ीरें—अवतार सिंह बनाम भारत संघ [(2016) 8 SCC 471], पवन कुमार बनाम हरियाणा राज्य [(2022) SCC OnLine SC 532] एवं सत्येंद्र सिंह तोमर बनाम मध्य प्रदेश राज्य [2024] के विधिक सिद्धांतों पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण, संवेदनशील और नज़ीरी फैसला सुनाया है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह (Justice Vivek Kumar Singh) की एकल पीठ ने वर्ष 2011 में पुलिस कांस्टेबल के पद पर नियुक्त हुए एक कर्मी को 2022 में सेवा से हटाए जाने के आदेश को सिरे से रद्द करते हुए उसे तत्काल सेवा में बहाल (Reinstated forthwith) करने का आदेश दिया है।

अदालत ने पाया कि जिन दो आपराधिक मामलों को 2011 के भर्ती फॉर्म में न दर्शाने का आरोप लगाया गया था, वे याचिकाकर्ता के किशोर वय (Teenager – 17-18 वर्ष) और कॉलेज छात्र राजनीति (20 वर्ष) के समय के मामूली विवादों से उपजे थे, और दोनों ही मामलों में उसकी भर्ती से वर्षों पूर्व ससम्मान/सुलह के आधार पर दोषमुक्ति (Acquittal) हो चुकी थी। खंडपीठ ने दो-टूक व्यवस्था दी कि स्थानीय पुलिस सत्यापन (Police Verification) पास करने और विभाग को 10 वर्ष से अधिक की “सराहनीय एवं निष्कलंक सेवा” (Commendable & Meritorious Service) देने के बाद अचानक शुरू की गई विभागीय जांच और जल्दबाजी में की गई स्वतः संज्ञान पुनरीक्षण (Suo Motu Revision) की कार्यवाही पूरी तरह से मनमानी, असंगत और कानून की दृष्टि में अप्रवर्तनीय है।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ’10 वर्ष की सराहनीय सेवा के बाद बर्खास्तगी का आदेश प्रत्यक्षतः मनमाना और असंगत’:

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने अपने 28 अक्टूबर के निर्णय में पुलिस मुख्यालय और अपीलीय अधिकारियों के आदेशों की विधिक वैधता का परीक्षण करते हुए दर्ज किया: “स्थानीय पुलिस थानों ने 2011 में उसके चरित्र सत्यापन (Verification) को मंजूरी दी थी, और उसने विभाग को 10 वर्षों से अधिक की सराहनीय सेवा (Commendable Service) प्रदान की है। ऐसे में आक्षेपित स्वतः संज्ञान पुनरीक्षण नोटिस दिनांक 21 मार्च 2022, पुनरीक्षण निष्कासन आदेश दिनांक 4 अप्रैल 2022, और पुलिस महानिदेशक (DGP) का आदेश दिनांक 4 जुलाई 2022—प्रत्यक्षतः मनमाने (Manifestly Arbitrary), असंगत (Disproportionate) और कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं (Unsustainable in the eyes of law) हैं। रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि दोनों मामूली मामले उस समय घटित हुए थे जब याचिकाकर्ता एक किशोर और कॉलेज छात्र था, और दोनों ही मामले उसकी 2011 की भर्ती से कई वर्ष पूर्व दोषमुक्ति (Acquittal) में समाप्त हो चुके थे।”

2. ‘आजीविका बचाने के लिए छोटी सजा स्वीकार करने से अनुच्छेद 226 का अधिकार समाप्त नहीं होता’:

  • राज्य सरकार ने यह तकनीकी आपत्ति उठाई थी कि चूंकि याचिकाकर्ता ने डीआईजी (DIG) द्वारा दी गई एक वेतन वृद्धि रोकने की लघु-शास्ति को स्वीकार कर लिया था और उसे चुनौती नहीं दी थी, इसलिए वह बाद के आदेश को चुनौती नहीं दे सकता।
  • हाईकोर्ट ने सरकार के इस तर्क को “पूरी तरह भ्रामक और गलत” (Wholly Misconceived) करार देते हुए व्यवस्था दी:“एक कर्मचारी जो अपनी आजीविका सुरक्षित करने और ड्यूटी पर वापस लौटने के लिए अपीलीय बहाली आदेश के तहत ‘एक वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने’ की घटाई गई सजा को स्वीकार कर लेता है, वह भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उस उत्तरवर्ती स्वतः संज्ञान पुनरीक्षण आदेश (Suo Motu Revisional Order) को चुनौती देने के अपने मौलिक व संवैधानिक अधिकार को कदापि नहीं खोता, जो सीधे तौर पर उसकी नौकरी छीन लेता है।”

3. धोखाधड़ी की मंशा का अभाव (Absence of Fraudulent Intent):

  • अदालत ने नोट किया कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले एक पहली बार के आवेदक के रूप में याचिकाकर्ता का यह वास्तविक विश्वास था कि जिन मामलों में वर्षों पहले बरी किया जा चुका है, उन्हें ‘लंबित आपराधिक मामला’ नहीं माना जाता।
  • अदालत ने उसके आचरण में सत्यनिष्ठा पाई क्योंकि:
    1. भर्ती के दौरान दिए गए बाद के विस्तृत हलफनामे में उसने पूछताछ पर ‘हाँ’ दर्ज किया था।
    2. वर्ष 2017 में जब उसने उप-निरीक्षक (Sub-Inspector) पद की परीक्षा पास की, तो उसने स्वेच्छा से दोनों आपराधिक मामलों और निवारक कार्यवाहियों का पूरा ब्योरा स्वयं आवेदन पत्र में दर्ज किया था। यह दर्शाता है कि उसका उद्देश्य कभी भी विभाग से तथ्य छिपाने का नहीं था।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2003–2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
याचिकाकर्तामध्य प्रदेश पुलिस में वर्ष 2011 से पदस्थ कांस्टेबल (आरक्षक)।
प्रतिवादी पक्षमध्य प्रदेश राज्य (गृह विभाग), पुलिस महानिदेशक (DGP), अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADG), पुलिस उप-महानिरीक्षक (DIG) एवं पुलिस अधीक्षक (SP)।
विवादित आपराधिक मुकदमों का इतिहासमामला 1 (वर्ष 2003): दर्ज होते समय याचिकाकर्ता की आयु मात्र 17-18 वर्ष (किशोर) थी।
मामला 2 (अगस्त 2006): कॉलेज छात्रसंघ अध्यक्ष (आयु 20 वर्ष) रहने के दौरान कॉलेज के एक विवाद से उपजा मुकदमा।
— दोनों मुकदमों में वर्ष 2011 की पुलिस भर्ती से काफी पहले ही अदालत द्वारा दोषमुक्ति (Acquittal) का फैसला आ चुका था।
2011 भर्ती प्रक्रिया की स्थितिप्रारंभिक आवेदन पत्र में आपराधिक मामले के कॉलम में ‘ना’ अंकित हुआ था, किंतु उसके पश्चात सत्यापन हेतु दिए गए विस्तृत शपथ-पत्र में उसने अभियोजन व हिरासत के कॉलम में ‘हाँ’ दर्ज किया था। मार्च 2011 में स्थानीय थानों द्वारा चरित्र सत्यापन रिपोर्ट क्लियर की गई और 30 मई 2011 को उसे औपचारिक नियुक्ति पत्र मिला।
2017 सब-इंस्पेक्टर भर्ती6 वर्ष की निष्कलंक सेवा के बाद उसने म.प्र. पुलिस सब-इंस्पेक्टर परीक्षा दी, जिसमें लिखित, शारीरिक और साक्षात्कार तीनों चरण उत्तीर्ण किए। इस परीक्षा के फॉर्म में उसने दोनों मामलों का पूरा ब्योरा स्वतः दर्ज किया।
विभागीय कार्रवाई का सिलसिला (2021–2022)• 24 नवंबर 2021: 10 वर्ष से अधिक की सेवा बीत जाने के बाद पुलिस अधीक्षक (SP) ने 2011 के कथित गैर-प्रकटीकरण के आधार पर उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया।
• अपीलीय राहत (DIG): डीआईजी ने अपील स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी रद्द की और सजा को घटाकर ‘एक संचयी वेतन वृद्धि रोकने’ में तब्दील कर सेवा में बहाल किया।
• स्वतः संज्ञान पुनरीक्षण (ADG): डीआईजी के आदेश के मात्र 7 दिनों के भीतर एडीजी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कारण बताओ नोटिस (21 मार्च 2022) जारी किया और 4 अप्रैल 2022 को डीआईजी के आदेश को पलटते हुए पुनः बर्खास्तगी का आदेश ठोक दिया, जिसकी पुष्टि 4 जुलाई 2022 को डीजीपी ने कर दी।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णयरिट याचिका स्वीकार (Allowed); बर्खास्तगी के सभी प्रशासनिक आदेश निरस्त; तत्काल सेवा बहाली का निर्देश; सेवा की निरंतरता (Continuity of Service) और काल्पनिक लाभ (Notional Benefits) देय होंगे, किंतु सेवा से बाहर रहने की अवधि का पिछला वेतन (Back Wages) देय नहीं होगा।

विधिक एवं सेवा न्यायशास्त्र विश्लेषण: ‘अवतार सिंह नज़ीर और आनुपातिकता का सिद्धांत’

  • सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ (Avtar Singh v. Union of India):
    • सुप्रीम कोर्ट की 3-जजों की पीठ ने यह मील का पत्थर सिद्धांत स्थापित किया था कि यदि किसी अभ्यर्थी ने अपने पूर्व आपराधिक इतिहास की कोई जानकारी नहीं दी है, तो नियोक्ता को आँख मूंदकर या यांत्रिक रूप से (Mechanically) उसे सेवा से बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है।
    • प्राधिकारी को यह देखना अनिवार्य है कि:
      1. क्या अपराध जघन्य, नैतिक अधमता (Moral Turpitude) या गंभीर हिंसा से जुड़ा था?
      2. क्या घटना के समय अभ्यर्थी अपरिपक्व या किशोरावस्था में था?
      3. क्या मामला दोषमुक्ति या सुलह में समाप्त हो चुका था?
      4. क्या अभ्यर्थी की बाद की सेवा और आचरण संतोषजनक रहा है?
  • छात्र राजनीति और युवावस्था के विवादों का विधिक मूल्यांकन:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने पवन कुमार बनाम हरियाणा राज्य और सत्येंद्र सिंह तोमर मामलों में दोहराया है कि कॉलेज के दिनों में युवाओं के बीच होने वाले मामूली झगड़ों या छात्र राजनीति के मामलों को किसी उम्मीदवार के पूरे जीवन का अभिशाप नहीं बनाया जा सकता।
    • जब व्यक्ति 10 वर्ष तक पुलिस बल में अनुशासित रहकर सेवा कर चुका हो, राष्ट्रपति/विभाग द्वारा कोई प्रतिकूल प्रविष्टि न दी गई हो, तो कॉलेज के दिनों के पुराने विवाद को आधार बनाकर उसे बर्खास्त करना ‘आनुपातिकता के सिद्धांत’ (Doctrine of Proportionality) का घोर उल्लंघन है।
  • स्वतः संज्ञान पुनरीक्षण में प्रशासनिक दुर्भावना (Malice in Law):
    • डीआईजी द्वारा सहानुभूतिपूर्वक विचार कर बहाल किए जाने के मात्र सात दिनों के भीतर अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADG) द्वारा बिना किसी नई सामग्री या साक्ष्य के स्वतः संज्ञान लेकर पूर्व आदेश को उलट देना प्रशासनिक हठधर्मिता और ‘कानूनी दुर्भावना’ को दर्शाता है।
    • उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक शक्तियों का प्रयोग न्यायोचित और संतुलित होना चाहिए, प्रतिशोधात्मक नहीं।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • न्यायालय: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, मुख्य पीठ जबलपुर (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: याचिकाकर्ता (पूर्व कांस्टेबल) बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य [Writ Petition under Article 226]
  • पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह (एकल पीठ)
  • आदेश की तिथि: 28 अक्टूबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: याचिका पूर्णतः स्वीकार; निष्कासन आदेश (Revisional Removal Order) रद्द; तत्काल सेवा बहाली का आदेश।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (कांस्टेबल) की ओर से: अधिवक्ता आयुषी तिवारी (Advocate Ayushi Tiwari)।
  • प्रतिवादी राज्य सरकार (म.प्र. गृह विभाग) की ओर से: उप-महाधिवक्ता (Deputy Advocate General) श्वेता यादव (Shweta Yadav)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (रिट अधिकारिता), अनुच्छेद 311(2) (लोक सेवकों की सुरक्षा) एवं अनुच्छेद 14 व 16 (समानता एवं लोक नियोजन में अवसर)
    • मध्य प्रदेश पुलिस विनियम (MP Police Regulations) — विभागीय जांच, दंड, अपील एवं पुनरीक्षण संबंधी विनियम
    • सेवा न्यायशास्त्र के सर्वमान्य सिद्धांत — आनुपातिकता का सिद्धांत (Proportionality) एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Principles of Natural Justice)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • पूर्व आपराधिक इतिहास के गैर-प्रकटीकरण और सेवा बहाली का विधिक मानक: ‘किशोरावस्था या छात्र राजनीति के दौरान दर्ज ऐसे मामूली आपराधिक मामले जो भर्ती से वर्षों पूर्व दोषमुक्ति (Acquittal) में समाप्त हो चुके हों, उनका भर्ती फॉर्म में अनजाने में गैर-प्रकटीकरण किसी कर्मचारी को 10 वर्ष की सराहनीय एवं निष्कलंक सेवा के पश्चात बर्खास्त करने का वैध कानूनी आधार नहीं बन सकता; आजीविका बचाने हेतु अपीलीय प्राधिकारी की लघु-शास्ति स्वीकार करने से कर्मचारी का अनुच्छेद 226 के तहत बर्खास्तगी को चुनौती देने का संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं होता; ऐसा दंडादेश आनुपातिकता के सिद्धांत का खुला उल्लंघन होने के कारण रद्द किए जाने योग्य है।’
  • वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के इस फैसले के तहत राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय को याचिकाकर्ता को उसके मूल कांस्टेबल पद पर तत्काल प्रभाव से कार्यभार ग्रहण कराना होगा; उसे सेवा से बाहर रहने की अवधि का वास्तविक वेतन (No Work No Pay सिद्धांत के तहत) नहीं मिलेगा, किंतु सेवा की वरिष्ठता, वेतन वृद्धि और पेंशन निर्धारण हेतु निरंतर सेवा (Continuity of Service with Notional Benefits) के सभी लाभ अनिवार्य रूप से प्रदान किए जाएंगे।

Service Reinstates: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court), जबलपुर पीठ
न्यायाधीशन्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह (Justice Vivek Kumar Singh)
याचिकाकर्ता (कांस्टेबल)मध्य प्रदेश पुलिस का बर्खास्त कांस्टेबल | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता आयुषी तिवारी
प्रतिवादी पक्षमध्य प्रदेश राज्य व पुलिस विभाग | प्रतिनिधित्व: उप अधिवक्ता जनरल श्वेता यादव
मूल विवाद2011 की कांस्टेबल भर्ती के फॉर्म में 2003 (उम्र 17-18 वर्ष) और 2006 (कॉलेज विवाद, उम्र 20 वर्ष) के दो बरी हो चुके मामलों की जानकारी न देना।
प्रशासनिक आदेशSP आदेश (2021): बर्खास्तगी।
DIG आदेश: सजा घटाकर 1 वार्षिक वेतनवृद्धि पर रोक।
ADGP/DGP आदेश (2022): स्वप्रेरणा (Suo Motu) समीक्षा कर दोबारा बर्खास्तगी।
अदालत का अंतिम निर्णयबर्खास्तगी आदेश रद्द: कांस्टेबल को सेवा में तुरंत बहाल (Reinstate) करने का निर्देश। काटी गई अवधि के लिए काल्पनिक लाभ (Notional Benefits) व सेवा निरंतरता मिलेगी, परंतु पिछला वेतन (Back Wages) नहीं मिलेगा।
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