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मामले की पृष्ठभूमि और पक्षकारों के तर्क
- ट्वीट्स में लगाए गए आरोप (वादी का मामला):वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर दो पोस्ट शेयर किए थे। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ कांग्रेस पार्टी के पक्ष में राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त है और उसने अपनी संपादकीय निष्पक्षता खो दी है। उन्होंने भारत चुनाव आयोग पर अखबार की रिपोर्टिंग की आलोचना की और राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस द्वारा दिए गए विज्ञापनों के चुनावी खर्च के आंकड़ों का हवाला देते हुए वित्तीय साठगांठ का आरोप लगाया।
- अखबार समूह की मांग:इंडियन एक्सप्रेस के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता दिनयार मडोन ने डिजिटल कंटेंट को तुरंत हटाने (Takedown) का दबाव बनाते हुए तर्क दिया कि डिजिटल मीडिया का प्रभाव कभी खत्म नहीं होता और यह अखबार के व्यावसायिक सम्मान पर हमला है।
- जेठमलानी का पक्ष:जेठमलानी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ज़ाल अंध्यारुजिना ने तर्क दिया कि ये पोस्ट राजनीतिक टिप्पणी (Political Commentary) और संपादकीय झुकाव पर एक निष्पक्ष टिप्पणी (Fair Comment) के दायरे में आते हैं और यह मानहानि का मामला नहीं बनता।
हाईकोर्ट का दृष्टिकोण और भावी रुख
1. विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता:
अदालत ने माना कि अंतरिम चरण पर ही सामग्री हटाने का आदेश देना उचित नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए दोनों पक्षों की दलीलों, साक्ष्यों और औचित्य की व्यापक स्तर पर जांच करनी होगी।
2. री-ट्वीट न करने का आश्वासन:
कोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि प्रतिवादी महेश जेठमलानी विवादित पोस्ट्स को दोबारा री-ट्वीट नहीं करेंगे, जो फिलहाल अंतरिम राहत की स्थिति बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। इस मामले में अगली सुनवाई 27 नवंबर 2026 को होगी।
मुंबई: मानहानि विधि में ‘बॉर्नार्ड बनाम पेरीमैन’ (Bonnard v. Perryman) के तहत अंतरिम निषेधाज्ञा का सुस्थापित सिद्धांत, भारत का संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता—राजनीतिक टिप्पणी व आलोचना का अधिकार), डिजिटल मीडिया में मानहानि बनाम निष्पक्ष टिप्पणी (Fair Comment & Justification), सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश XXXIX नियम 1 व 2 (अस्थायी निषेधाज्ञा), तथा एक कॉर्पोरेट मीडिया संस्थान की ‘व्यापारिक साख’ (Business Integrity) पर हमले के विधिक परीक्षण पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।
बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आरिफ डॉक्टर (Justice Arif Doctor) की एकल पीठ ने प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र द इंडियन एक्सप्रेस (The Indian Express) द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व राज्यसभा सांसद महेश जेठमलानी (Senior Advocate Mahesh Jethmalani) के खिलाफ दायर दीवानी मानहानि वाद में समाचार पत्र समूह को तत्काल कोई अंतरिम राहत देने या विवादित ट्वीट्स को तुरंत हटाने (Takedown) का आदेश देने से साफ इनकार कर दिया।
अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता जेठमलानी के इस वैधानिक अंडरटेकिंग (वचनबद्धता) को रिकॉर्ड पर दर्ज किया कि वे विवादित दो ट्वीट्स को आगे रीट्वीट नहीं करेंगे (Will not be retweeting the two allegedly offending tweets)। अदालत ने व्यवस्था दी कि अंतरिम/तदर्थ (Ad-interim) चरण पर यह आश्वासन पर्याप्त है। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी सोशल मीडिया पोस्ट को हटाने का आदेश देने से पूर्व अदालत को बचाव पक्ष की ‘सत्यता/औचित्य’ (Plea of Justification) और निष्पक्ष टिप्पणी की दलीलों पर विस्तृत सुनवाई करनी होगी, जो अदालती छुट्टियों के बाद नियमित सुनवाई पर ही संभव है। साथ ही, अदालत ने दोनों पक्षों को आपस में बैठकर विवाद को सुलझाने की सलाह दी और मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर 2026 तय की।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘तत्काल पोस्ट हटाने का आदेश नहीं हो सकता; सत्यता के बचाव पर विस्तृत सुनवाई जरूरी’:
न्यायमूर्ति आरिफ डॉक्टर ने समाचार पत्र समूह की तत्काल अंतरिम रोक की मांग को अस्वीकार करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: “प्रतिवादी (महेश जेठमलानी) कथित रूप से आपत्तिजनक दोनों ट्वीट्स को रीट्वीट नहीं करेंगे। मेरी सुविचारित राय में, तदर्थ (Ad-interim) चरण में यह कदम पूरी तरह पर्याप्त है। चूंकि पोस्ट को हटाने (Takedown) के आदेश के लिए एक विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता होगी, जिसमें अदालत को ‘सत्यता/औचित्य’ (Plea of Justification) आदि के आधारों की गहन पड़ताल करनी होगी, इसलिए इस प्रारंभिक चरण में ऐसा आदेश पारित करना उचित नहीं होगा। अदालत की छुट्टियां समाप्त होने के बाद जब अंतरिम आवेदन पर विस्तार से सुनवाई होगी, तब मैं इस पर विचार करूंगा।”
2. दोनों पक्षों को आपसी समझौते की व्यावहारिक न्यायिक सलाह:
- न्यायमूर्ति डॉक्टर ने सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं को विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने का सुझाव देते हुए रोचक मौखिक टिप्पणी की:“मुझे कोई ऐसा तरीका बताइए जिससे आप इसे सुलझा सकें… इसे खत्म करने का प्रयास करें। क्योंकि यदि आप उनके ट्वीट्स पढ़ें, तो आपके मुवक्किल (जेठमलानी) ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ पर अपना बहुत सारा कीमती और बहुमूल्य समय खर्च कर रहे हैं—उसे पढ़ना, उसे फॉलो करना, उस पर टिप्पणियां करना। उनके पास करने के लिए और भी बहुत से अच्छे काम हैं! वे अपना इतना बहुमूल्य समय और ऊर्जा इस पर क्यों लगा रहे हैं? इसलिए, इसे आपस में बैठकर समाप्त कीजिए।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक विवरण (2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
|---|---|
| वादी पक्ष | द इंडियन एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड (The Indian Express Pvt Ltd) — प्रमुख राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्र समूह। |
| प्रतिवादी पक्ष | वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी (Senior Advocate Mahesh Jethmalani) एवं अन्य। |
| विवाद का मूल उद्भव | महेश जेठमलानी द्वारा अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ (X – पूर्व ट्विटर) पर प्रकाशित किए गए दो पोस्ट्स (Two Tweets)। |
| ट्वीट्स में लगाए गए कथित आरोप | 1. राजनीतिक पक्षपात: जेठमलानी ने आरोप लगाया कि ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ कांग्रेस पार्टी के पक्ष में राजनीतिक रूप से पक्षपाती है और उसने अपनी संपादकीय स्वतंत्रता (Editorial Independence) से समझौता कर लिया है। 2. ECI रिपोर्टिंग पर आक्षेप: समाचार पत्र द्वारा भारत निर्वाचन आयोग (ECI) पर की गई रिपोर्टिंग की आलोचना की गई। 3. वित्तीय संलिप्तता का दावा: राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस पार्टी द्वारा समाचार पत्र को दिए गए आधिकारिक विज्ञापनों के चुनाव व्यय विवरण (Election Expenditure Filings) का हवाला देते हुए कथित वित्तीय संबंधों का आरोप लगाया गया। |
| वादी (एक्सप्रेस) की दलीलें | वरिष्ठ अधिवक्ता दिनयार मैडन ने तत्काल Takedown की मांग करते हुए दलील दी कि: • डिजिटल सामग्री भौतिक प्रिंट की तरह समय के साथ धूमिल नहीं होती, बल्कि इंटरनेट पर स्थायी रूप से उपलब्ध रहकर प्रतिष्ठा को निरंतर नुकसान पहुंचाती है। • जब किसी मीडिया घराने की व्यावसायिक शुचिता (Business Integrity) पर हमला किया जाए, तो मानहानि का मुकदमा पूरी तरह पोषणीय है। • बचाव पक्ष केवल ट्रायल में ‘उचित सिद्ध करने’ का खोखला वादा करके अंतरिम रोक से नहीं बच सकता। |
| प्रतिवादी (जेठमलानी) की दलीलें | वरिष्ठ अधिवक्ता ज़ल अंध्यारुजिना ने तर्क दिया कि: • जेठमलानी के बयान शुद्ध रूप से एक समाचार पत्र के वैचारिक और संपादकीय झुकाव पर निष्पक्ष टिप्पणी (Fair Comment) और राजनीतिक समीक्षा (Political Commentary) के दायरे में आते हैं। • वे सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों (जैसे चुनाव आयोग के आधिकारिक चुनावी खर्च रिकॉर्ड) पर आधारित हैं और ट्रायल में इनका औचित्य (Justification) सिद्ध किया जाएगा। |
| हाईकोर्ट का अंतिम अंतरिम आदेश | ट्वीट्स को तुरंत हटाने (Takedown) का अंतरिम आदेश देने से इनकार; जेठमलानी द्वारा आगे रीट्वीट न करने का आश्वासन पर्याप्त माना; मामले की विस्तृत सुनवाई 27 नवंबर 2026 तक स्थगित। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘बॉर्नार्ड सिद्धांत और डिजिटल मानहानि में अंतरिम रोक’
- ‘बॉर्नार्ड बनाम पेरीमैन’ (Bonnard v. Perryman [1891] 2 Ch 269) का शास्त्रीय नियम:
- मानहानि के मुकदमों में अंतरिम निषेधाज्ञा देने का विधिक मानक अत्यंत कठोर है।
- सुस्थापित कानून यह है कि यदि प्रतिवादी अदालत के समक्ष यह रुख लेता है कि उसके द्वारा दिए गए बयान सत्य हैं या वे सार्वजनिक हित में की गई ‘निष्पक्ष टिप्पणी’ (Fair Comment) हैं और वह विचारण (Trial) के दौरान इसे प्रमाणित करने का दायित्व लेता है, तो अदालतें आमतौर पर मुकदमे की शुरुआत में ही बयानों को हटाने या भाषण पर पूर्व-प्रतिबंध (Prior Restraint / Gag Order) लगाने से न्यायिक आत्मसंयम बरतती हैं।
- सत्यता के बचाव (Justification) का परीक्षण:
- जेठमलानी ने अपने बयानों के समर्थन में चुनाव आयोग के सार्वजनिक चुनावी खर्च के रिकॉर्ड का हवाला दिया है।
- उच्च न्यायालय ने सही माना कि क्या ये वित्तीय रिकॉर्ड उनके द्वारा लगाए गए आरोपों को उचित ठहराते हैं या नहीं, यह एक ऐसा मिश्रित तथ्य और कानून का प्रश्न है जिसका निर्धारण केवल दोनों पक्षों के साक्ष्यों और पूर्ण बहस के बाद ही किया जा सकता है। तदर्थ स्तर पर सीधे पोस्ट हटा देना प्रतिवादी के अनुच्छेद 19(1)(a) के अधिकारों का हनन होगा।
- रीट्वीट न करने का वचन—एक अंतरिम संतुलन:
- चूंकि डिजिटल युग में किसी पोस्ट के दोबारा वायरल होने से प्रतिष्ठा को संभावित नुकसान का खतरा रहता है, इसलिए अदालत ने जेठमलानी का यह वचन दर्ज कर लिया कि वे उन ट्वीट्स को दोबारा रीट्वीट नहीं करेंगे।
- इससे समाचार पत्र की तात्कालिक चिंता (कि विवाद और न फैले) भी संबोधित हो गई और प्रतिवादी के कानूनी बचाव के अधिकार पर भी कोई पूर्व-निर्णय नहीं थोपा गया।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: बॉम्बे उच्च न्यायालय, मूल दीवानी क्षेत्राधिकार (Ordinary Original Civil Jurisdiction)
- केस संदर्भ: द इंडियन एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड बनाम महेश जेठमलानी व अन्य [Interim Application in Defamation Suit / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति आरिफ डॉक्टर (Justice Arif Doctor) (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 2 नवंबर 2026
- कार्यवाही का स्वरूप: अंतरिम निषेधाज्ञा (Takedown) अर्जी पर सुनवाई; अगली तिथि 27 नवंबर 2026।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- वादी (द इंडियन एक्सप्रेस प्रा. लि.) की ओर से:
- वरिष्ठ अधिवक्ता दिनयार मैडन (Senior Advocate Dinyar Madon)।
- साथ में अधिवक्ता: ज़ियाद मैडन, प्रणित कुलकर्णी, और तेजस्वी घाग (निर्देशन: पूर्वी कमानी)।
- प्रतिवादी (वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी) की ओर से:
- वरिष्ठ अधिवक्ता ज़ल अंध्यारुजिना (Senior Advocate Zal Andhyarujina)।
- साथ में अधिवक्ता: सेरेना जेठमलानी, रेवती देसाई, अपूर्वा दीवानजी, अनोज मेनन, और निमिषा शुक्ला (निर्देशन: देसाई एंड दीवानजी एसोसिएट्स)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) — आदेश XXXIX नियम 1 व 2 (अस्थायी निषेधाज्ञा के सिद्धांत)
- भारतीय मानहानि विधि (टॉर्ट्स एवं भारतीय न्याय संहिता) — मानहानि, निष्पक्ष टिप्पणी (Fair Comment) और औचित्य/सत्यता (Justification) के अपवाद
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) — सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डिजिटल सामग्री का विधिक दायरा
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- डिजिटल मानहानि और अंतरिम निषेधाज्ञा का विधिक मानक: ‘दीवानी मानहानि के मुकदमों में किसी सोशल मीडिया पोस्ट को प्रारंभिक स्तर पर हटाने (Takedown) का अंतरिम आदेश यांत्रिक रूप से पारित नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब प्रतिवादी निष्पक्ष टिप्पणी और सत्यता (Justification) का बचाव लेता हो; अदालत को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा के संरक्षण के बीच संतुलन साधना होता है; प्रतिवादी द्वारा सामग्री को आगे रीट्वीट या पुनः प्रसारित न करने का वचन तदर्थ स्तर पर वादी की प्रतिष्ठा के संरक्षण हेतु पर्याप्त विधिक संतुलन प्रदान करता है; ऐसे संवेदनशील मामलों में पूर्ण बहस के बाद ही अंतिम अंतरिम आदेश दिया जाना चाहिए।’
- वर्तमान स्थिति व अंतरिम प्रभाव: बॉम्बे उच्च न्यायालय के इस आदेश के पश्चात महेश जेठमलानी के ‘एक्स’ हैंडल पर मौजूद दोनों ट्वीट्स फिलहाल ऑनलाइन बने रहेंगे, किंतु वे उन्हें स्वयं आगे रीट्वीट या पुनः प्रचारित नहीं कर सकेंगे; मामले में स्थायी निषेधाज्ञा और पोस्ट हटाने की मांग पर अंतिम अंतरिम निर्णय 27 नवंबर 2026 को होने वाली अगली विस्तृत सुनवाई के बाद तय होगा।
Defame By Media: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court), मुंबई |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति आरिफ डॉक्टर (Justice Arif Doctor) |
| मामला/साइटेशन | द इंडियन एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड बनाम महेश जेठमलानी व अन्य (The Indian Express v. Mahesh Jethmalani & Ors.) |
| वादी (Plaintiff) | द इंडियन एक्सप्रेस समूह | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता दिनयार मडोन |
| प्रतिवादी (Defendant) | वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता ज़ाल अंध्यारुजिना |
| मूल विवाद | X (ट्विटर) पर जेठमलानी द्वारा इंडियन एक्सप्रेस पर राजनीतिक पक्षपात, कांग्रेस से वित्तीय साठगांठ और चुनाव आयोग पर गलत रिपोर्टिंग का आरोप लगाने वाले 2 ट्वीट्स। |
| अदालत का अंतरिम निर्णय | तत्काल टेकडाउन से इनकार: ट्वीट्स हटाने का तत्काल आदेश देने से इनकार; जेठमलानी का री-ट्वीट न करने का वचन रिकॉर्ड पर लिया; मामले की विस्तृत सुनवाई 27 नवंबर 2026 को तय। |

