Wednesday, November 4, 2026
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Ghaziabad’s Lawyer: गाजियाबाद की सोसाइटी में वकीलों पर जानलेवा हमले और पुलिस की ढिलाई पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; यूपी पुलिस को नोटिस जारी

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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी बिंदु

  1. 22 अक्टूबर की घटना और जानलेवा हमला:याचिका के अनुसार, 22 अक्टूबर 2026 की रात ‘एपेक्स द फ्लोरस’ सोसाइटी में अवैध निर्माण और आम रास्ते को अवरुद्ध करने के विरोध के बाद दो निवासियों ने बाहरी अज्ञात तत्वों को परिसर के भीतर बुला लिया। इन लोगों ने मध्यस्थता करने आए वकीलों और स्थानीय निवासियों पर लोहे की रॉड और हथियारों से हमला कर दिया, जिससे कई वकीलों की हड्डियां टूट गईं (Fractures) और आंख में गंभीर चोटें आईं।
  2. पुलिस की शिथिलता और क्रास-FIR का आरोप:पीड़ितों का कहना है कि स्पष्ट सीसीटीवी फुटेज और मेडिकल रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बावजूद इंदिरापुरम पुलिस ने गंभीर धाराओं को हटाकर मामला हल्का कर दिया। इसके अलावा, यूपी डीजीपी (UP DGP), गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन और राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) को शिकायतें भेजे जाने के बाद भी मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया, बल्कि वकीलों पर दबाव बनाने के लिए तीन दिन बाद काउंटर-केस दर्ज कर लिया गया।
  3. सुप्रीम कोर्ट से गुहार:याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि यह कानून प्रवर्तन एजेंसियों की संस्थागत विफलता (Systemic Failure) को दर्शाता है, जहाँ वकीलों को निशाना बनाकर की गई हिंसा को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने अदालत से भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कड़ी धाराओं को जोड़ने और परिजनों की सुरक्षा के कड़े आदेश देने की मांग की है।

मुख्य विधिक बिंदु

1. वकीलों पर लक्षित हिंसा पर चिंता:

सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगा है कि पर्याप्त साक्ष्य होने के बावजूद कठोर विधिक धाराओं का समावेश क्यों नहीं किया गया।

2. अगली सुनवाई पर नजर:

अदालत अब यूपी पुलिस द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले जवाब और जांच की स्थिति (Status Report) के आधार पर आगे के निर्देश जारी करेगी।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों व मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन, शारीरिक सुरक्षा और निष्पक्ष अन्वेषण का अधिकार), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 (संज्ञेय अपराधों में निष्पक्ष प्राथमिकी दर्ज करने का वैधानिक दायित्व), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के तहत गंभीर चोट (Grievous Hurt), हत्या का प्रयास (Attempt to Murder), और महिला के शीलभंग (Outraging Modesty of a Woman) के कठोर दंडात्मक प्रावधान, तथा सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्यों पर लक्षित हमलों में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के विधिक सिद्धांतों के तहत भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा संज्ञान लिया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant), न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) और न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana) की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) की एक आवासीय सोसाइटी में वकीलों और उनके परिवारों पर हुए क्रूर हमले के मामले में दायर एक रिट याचिका पर उत्तर प्रदेश पुलिस (UP Police) और संबंधित प्राधिकारियों को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन (SCBA) और दिल्ली उच्च न्यायालय के पीड़ित वकीलों द्वारा दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और मेडिको-लीगल केस (MLC) रिपोर्ट में गंभीर अस्थिभंग (Fractures) और महिला वकील के साथ शीलभंग के अकाट्य साक्ष्य होने के बावजूद जानबूझकर अपराध की गंभीरता को कमतर किया (Deliberately Diluted Offences)। पुलिस ने हत्या के प्रयास जैसी कठोर धाराएं लगाने के बजाय केवल मामूली और जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज किया और हमलावरों को गिरफ्तार करने के बजाय तीन दिन बाद पीड़ित वकीलों के खिलाफ ही एक झूठी क्रॉस-एफआईआर (Cross-FIR) दर्ज कर दी।

शीर्ष अदालत के समक्ष याचिका में उठाए गए मुख्य कानूनी आधार एवं दलीलें

1. ‘गंभीर चोट और शीलभंग के बावजूद मामूली व जमानती धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करना मनमाना’:

याचिकाकर्ताओं ने इंदिरापुरम पुलिस की कार्यप्रणाली को विधिक रूप से पक्षपातपूर्ण ठहराते हुए याचिका में दर्ज किया: “सीसीटीवी फुटेज और मेडिको-लीगल रिपोर्ट (MLC) से स्पष्ट रूप से प्रमाणित होने के बावजूद—जिसमें याचिकाकर्ताओं को गंभीर फ्रैक्चर, आंख में स्थायी क्षति और सार्वजनिक स्थान पर महिला वकील के शीलभंग की क्रूरता दिखाई दे रही है—पुलिस द्वारा केवल साधारण और जमानती अपराधों (Bailable & Minor Offences) में मामला दर्ज करना पूरी तरह से मनमाना और दुर्भावनापूर्ण है। पुलिस ने हत्या के प्रयास और शीलभंग जैसे गंभीर संज्ञेय अपराधों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया, जो कानून के शासन और विधि प्रवर्तन एजेंसियों की प्रणालीगत विफलता (Systemic Failure) को दर्शाता है।”

2. ‘दोषियों को बचाने हेतु पीड़ितों पर ही क्रॉस-एफआईआर दर्ज करने की दुर्भावनापूर्ण रणनीति’:

  • याचिका में रेखांकित किया गया कि घटना के तीन दिन बाद मुख्य हमलावरों के दबाव में आकर पुलिस ने पीड़ित वकीलों के खिलाफ ही प्रति-प्राथमिकी (Cross-FIR) दर्ज कर ली:
    • मुख्य हमलावरों को गिरफ्तार करने या उन पर कठोर दंडात्मक धाराएं लगाने के बजाय पुलिस ने पीड़ित पक्ष को ही समझौते के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से क्रॉस-केस का सहारा लिया।
    • घटना के समय से ही पीड़ितों और उनके परिजनों को लगातार धमकियां दी जा रही हैं, किंतु पुलिस ने उन्हें कोई सुरक्षा प्रदान नहीं की।

3. वैधानिक मंचों से गुहार के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं:

  • वकीलों ने शीर्ष अदालत को अवगत कराया कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP), पुलिस आयुक्त गाजियाबाद, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन, तथा राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के समक्ष औपचारिक प्रत्यावेदन दिए, किंतु मुख्य हमलावरों के खिलाफ कोई दंडात्मक या निरोधात्मक कदम नहीं उठाए गए।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अक्टूबर – नवंबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक मौलिक अधिकार क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
पीठमुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
आदेश की तिथि3 नवंबर 2026
केस संदर्भए. दीपा व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [Writ Petition (Criminal) No. … / 2026]
याचिकाकर्तागण (पीड़ित अधिवक्ता)1. अधिवक्ता ए. दीपा (Advocate A Deepa) — सदस्य, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA)।
2. अधिवक्ता ए. देब कुमार (Advocate A Deb Kumar) — सदस्य, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA)।
3. अधिवक्ता विपिन शर्मा (Advocate Vipin Sharma) — दिल्ली उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन।
4. अधिवक्ता अनूप गोयल (Advocate Anup Goyal) — दिल्ली उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन।
घटनास्थल‘एपेक्स द फ्लोरस’ (Apex The Florus) सोसाइटी, वसुंधरा, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)।
घटना का विवरण (22 अक्टूबर 2026 की रात)सोसाइटी परिसर के भीतर अनधिकृत/अवैध निर्माण करने और सामान्य आवागमन का रास्ता अवरुद्ध करने को लेकर दो निवासियों के साथ विवाद हुआ। आरोप है कि उन दो निवासियों ने बाहर से अज्ञात गुंडों के एक गिरोह को सोसाइटी के अंदर बुलाया। इस गिरोह ने वकीलों और बीच-बचाव करने आए अन्य निवासियों पर लाठी-डंडों से जानलेवा हमला कर दिया।
शारीरिक चोटें और साक्ष्य• कई वकीलों को गंभीर अस्थिभंग (Fractures) हुए और आंख में गहरी चोट आई।
• महिला अधिवक्ता के साथ सार्वजनिक रूप से मारपीट और शीलभंग किया गया।
• घटना के स्पष्ट सीसीटीवी फुटेज और सरकारी अस्पताल के मेडिको-लीगल प्रमाण पत्र (MLCs) अभिलेख पर उपलब्ध हैं।
पुलिस की भूमिका पर आरोपइंदिरापुरम थाने की पुलिस ने गंभीर चोटों और हमले के बावजूद केवल मामूली धाराओं में एनसीआर/एफआईआर दर्ज की। तीन दिन बाद हमलावरों को लाभ पहुंचाने के लिए पीड़ित अधिवक्ताओं के खिलाफ ही क्रॉस-केस बना दिया।
याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई राहतें1. निष्पक्ष व स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच कराने अथवा BNS की कठोर धाराओं (यथा हत्या का प्रयास, गंभीर चोट, शीलभंग) को जोड़ने का निर्देश।
2. गाजियाबाद पुलिस से मामले की विस्तृत स्थिति रिपोर्ट (Status Report) तलब करना।
3. पीड़ित वकीलों और उनके परिवारों को प्रतिशोध के खतरे से बचाने हेतु तत्काल पुलिस सुरक्षा (Police Protection) प्रदान करना।
शीर्ष अदालत की कार्रवाईयाचिका पर विचार करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस और राज्य सरकार को नोटिस जारी; स्थिति रिपोर्ट तलब करने की प्रक्रिया प्रारंभ।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘लक्षित हिंसा, निष्पक्ष जांच और न्यायपालिका के अधिकारियों की सुरक्षा’

  • ‘ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’ [(2014) 2 SCC 1] का अनिवार्य अधिदेश:
    • सर्वोच्च न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट विधिक सिद्धांत स्थापित किया है कि यदि किसी शिकायत और प्राथमिक मेडिकल साक्ष्य से संज्ञेय और गंभीर अपराध (Cognizable Offence) का घटित होना प्रकट होता है, तो पुलिस अधिकारी के पास धाराओं को हल्का करने या प्राथमिकी दर्ज न करने का कोई विवेकाधिकार (Discretion) नहीं है।
    • हड्डियों के टूटने (Fracture) और आंख की रोशनी को खतरा होने पर BNS की धारा 117 (गंभीर चोट) और घातक हथियारों से सिर पर वार होने पर धारा 109 (हत्या का प्रयास) के तहत मामला दर्ज करना अनिवार्य कानूनी बाध्यता थी।
  • क्रॉस-एफआईआर (Cross-FIR) के दुरुपयोग की प्रवृत्ति:
    • भारतीय आपराधिक न्यायप्रणाली में यह एक कुत्सित रणनीति बन चुकी है कि जब प्रभावशाली या अपराधी तत्व किसी संज्ञेय अपराध को अंजाम देते हैं, तो वे पुलिस तंत्र की मिलीभगत से पीड़ितों पर ही एक झूठा क्रॉस-केस दर्ज करा देते हैं ताकि अदालत में दोनों पक्षों को “आपसी झगड़ा” दिखाकर मुख्य अभियुक्तों को आसानी से जमानत दिलाई जा सके।
    • सुप्रीम कोर्ट ने बाबूभाई बनाम गुजरात राज्य [(2010) 15 SCC 267] में यह व्यवस्था दी है कि निष्पक्ष और पूर्वाग्रह-मुक्त जांच (Fair and Impartial Investigation) संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है। यदि जांच अधिकारी ही आरोपियों को बचाने के लिए अपराध को कमजोर करता है, तो शीर्ष अदालत सीधे हस्तक्षेप कर जांच को स्थानांतरित या नियंत्रित कर सकती है।
  • न्यायालय के अधिकारियों (Officers of the Court) पर हमलों का राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य:
    • हाल के दिनों में वकीलों पर हो रहे हमलों (यथा कर्नाटक में वकीलों का आंदोलन, दिल्ली में पुलिस विवाद और अब गाजियाबाद में हमला) ने वकीलों की सुरक्षा के मुद्दे को अत्यंत संवेदनशील बना दिया है।
    • जब समाज में कानून का ज्ञान रखने वाले अधिवक्ता ही पुलिस की पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली और गुंडों के हाथों असुरक्षित हो जाएंगे, तो सामान्य नागरिकों के विधिक अधिकारों की रक्षा करना असंभव हो जाएगा।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
  • केस संदर्भ: ए. दीपा व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [Writ Petition (Criminal) No. … / 2026]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
  • आदेश की तिथि: 3 नवंबर 2026
  • कार्यवाही का स्वरूप: रिट याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई संपन्न; उत्तर प्रदेश पुलिस (गृह विभाग/गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट) को कारण बताओ नोटिस जारी।

पक्षकारों का प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ताओं (पीड़ित वकीलों) की ओर से: सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ विधिक प्रतिनिधि।
  • उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से: राज्य के स्थायी वकील (Standing Counsel for Uttar Pradesh)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) एवं अनुच्छेद 21 (जीवन, सुरक्षा और निष्पक्ष जांच का अधिकार)
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 173 (संज्ञेय मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने की वैधानिक बाध्यता)
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
      • धारा 109 — हत्या का प्रयास (Attempt to Murder / पूर्व IPC 307)
      • धारा 115 व 117 — स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना (Grievous Hurt / पूर्व IPC 325)
      • धारा 74 व 75 — महिला की लज्जा भंग करना व लैंगिक उत्पीड़न (Outraging Modesty / पूर्व IPC 354)
      • धारा 191 व 190 — दंगा और विधि-विरुद्ध जमाव (Rioting & Unlawful Assembly)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • चिकित्सीय साक्ष्यों के आधार पर उपयुक्त धाराओं में प्राथमिकी और निष्पक्ष जांच का विधिक मानक: ‘जब चिकित्सकीय परीक्षण (MLC) और डिजिटल वीडियो साक्ष्य (CCTV) गंभीर चोटों, अस्थिभंग और महिलाओं के शीलभंग की पुष्टि करते हों, तो पुलिस प्रशासन द्वारा अपराध की गंभीरता को घटाकर केवल साधारण और जमानती धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करना कानून के शासन का खुला उल्लंघन है; पीड़ितों पर दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज की जाने वाली दुर्भावनापूर्ण क्रॉस-प्राथमिकियां निष्पक्ष अन्वेषण के संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 21) को दूषित करती हैं; न्यायालय के अधिकारियों (अधिवक्ताओं) पर आवासीय परिसरों में होने वाले संगठित हमलों पर न्यायपालिका को कड़ा संज्ञान लेते हुए निष्पक्ष अन्वेषण और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।’
  • वर्तमान स्थिति व आगामी प्रक्रिया: सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस और गाजियाबाद पुलिस आयुक्त को मामले में की गई वास्तविक जांच, दर्ज धाराओं की समीक्षा और क्रॉस-केस के आधारों पर एक विस्तृत स्थिति रिपोर्ट (Status Report) शीर्ष अदालत के समक्ष दाखिल करनी होगी; अदालत अगली सुनवाई में पीड़ित वकीलों को सुरक्षा प्रदान करने और स्वतंत्र जांच एजेंसी को मामला सौंपने के बिंदु पर विचार करेगी।

Ghaziabad’s Lawyer:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठCJI सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
याचिकाकर्ताSCBA सदस्य अधिवक्ता ए. दीपा, ए. देब कुमार, तथा दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता विपिन शर्मा व अनूप गोयल
घटना का स्थान/तिथि22 अक्टूबर 2026 की रात; ‘एपेक्स द फ्लोरस’ (Apex The Florus) सोसाइटी, वसुंधरा, गाजियाबाद
संबंधित थानाइंदिरापुरम पुलिस स्टेशन, गाजियाबाद
मूल विवादअवैध निर्माण व रास्ता रोकने के विरोध पर सोसाइटी में बाहरी गुंडों द्वारा वकीलों और निवासियों पर जानलेवा हमला।
मुख्य मांगें1. BNS की कठोर धाराओं (जैसे हत्या का प्रयास) के तहत निष्पक्ष जांच व स्टेटस रिपोर्ट।
2. पीड़ित वकीलों और उनके परिवारों को पुलिस सुरक्षा प्रदान करना।
3. क्रास-FIR में पुलिस की दुर्भावनापूर्ण भूमिका की जांच।
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