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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क
- महिला के आरोप और मांगी गई राहत:महिला ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि विवाह के बाद उसे शारीरिक, यौन और भावनात्मक उत्पीड़न, दहेज की मांग और धमकियों का सामना करना पड़ा। उसने पति पर उसके पिता से ₹35 लाख मांगने और अश्लील तस्वीरें वायरल करने की धमकी देने का भी आरोप लगाया था।
- पति व परिजनों की दलील (अधिवक्ता मनीष भदौरिया):पति के वकील ने सभी आरोपों का खंडन करते हुए अदालत को बताया कि दोनों पक्षों के बीच जनवरी 2021 में ही ₹10 लाख में समझौता (Settlement) हो गया था। यह भी प्रस्तुत किया गया कि महिला स्वयं ₹75,000 प्रति माह से अधिक कमा रही है और अपना सामान लेकर स्वेच्छा से ससुराल छोड़कर गई थी।
- साक्ष्य न प्रस्तुत करने पर बंद हुआ अवसर:अदालत ने पाया कि महिला को साक्ष्य हलफनामा (Evidence Affidavit) दाखिल करने और अपना पक्ष रखने के लिए तीन बार स्पष्ट अवसर दिए गए थे, लेकिन वह विफल रही। इसके चलते 26 सितंबर 2026 को साक्ष्य प्रस्तुत करने का उसका अधिकार समाप्त (Right to lead evidence closed) कर दिया गया था।
- अदालत का कानूनी निष्कर्ष:कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही प्रतिवादियों में से कोई एक पक्ष एकतरफा (Ex-parte) रहा हो, तब भी अपना केस खुद साबित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी याचिकाकर्ता की ही होती है। वह केवल बचाव पक्ष की कमियों का लाभ उठाकर राहत प्राप्त नहीं कर सकती।
मुख्य विधिक निष्कर्ष
1. केवल आरोपों पर राहत नहीं:
फैसले ने स्थापित किया कि घरेलू हिंसा अधिनियम का दायरा भले ही व्यापक हो, लेकिन बिना ठोस कानूनी सबूत या गवाही के अदालतें राहत का आदेश पारित नहीं कर सकतीं।
2. प्रक्रियात्मक सख्ती:
साक्ष्य प्रस्तुत न करने पर अदालत का कड़ा रुख यह दिखाता है कि मुकदमों को बिना साक्ष्य के असीम काल तक लंबित रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
नई दिल्ली: घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act, 2005) की धारा 2(a) (‘व्यथित व्यक्ति’ / Aggrieved Person की वैधानिक परिभाषा), धारा 3 (‘घरेलू हिंसा’ की विस्तृत परिभाषा—शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक व आर्थिक शोषण), धारा 12 (राहत हेतु आवेदन), धारा 18, 19, 20 व 22 (संरक्षण, निवास, मौद्रिक अनुतोष एवं प्रतिकर के आदेश), भारतीय साक्ष्य अधिनियम/भारतीय साक्ष्य संहिता के तहत ‘सबूत का भार’ (Burden of Proof), तथा प्रतिवादी के एकपक्षीय (Ex Parte) रहने पर भी वादी द्वारा अपने मामले को स्वयं प्रमाणित करने के विधिक सिद्धांतों पर दिल्ली की एक सक्षम मजिस्ट्रेट अदालत ने अत्यंत महत्वपूर्ण और स्पष्ट निर्णय सुनाया है।
साकेत/पटियाला हाउस स्थित दिल्ली अदालत की न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate) ऋषिका श्रीवास्तव (Judicial Magistrate Rishika Srivastava) ने एक महिला द्वारा अपने पति, सास-ससुर और ससुराल के अन्य सदस्यों के विरुद्ध दायर घरेलू हिंसा की शिकायत को खारिज (Dismissed) कर दिया।
अदालत ने 28 अक्टूबर 2026 के अपने निर्णय में दो-टूक व्यवस्था दी कि कानून के तहत ‘व्यथित व्यक्ति’ (Aggrieved Person) के रूप में राहत पाने के लिए केवल उत्पीड़न के अस्पष्ट और मनगढ़ंत आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है; याचिकाकर्ता महिला पर यह अनिवार्य विधिक दायित्व है कि वह घरेलू हिंसा की परिभाषा के तहत आने वाले कम से कम किसी एक कृत्य को ठोस साक्ष्यों के साथ अदालत में प्रमाणित करे। महिला को साक्ष्य पेश करने के तीन अवसर दिए गए थे, किंतु उसने न तो साक्ष्य हलफनामा दायर किया और न ही कोई गवाही दी, जिसके कारण उसका साक्ष्य का अधिकार 26 सितंबर 2026 को बंद कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि जब रिकॉर्ड पर कोई साक्ष्य नहीं है, तो निराधार आरोपों के आधार पर ₹50 लाख का मुआवजा या ₹40,000 का मासिक भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता।
अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘कानून की परिभाषा में आने वाले कम से कम एक कृत्य को साबित करना अनिवार्य; केवल दावे काफी नहीं’:
न्यायिक मजिस्ट्रेट ऋषिका श्रीवास्तव ने डीवी एक्ट की धारा 2(a) और धारा 3 के कानूनी दायरे का विश्लेषण करते हुए अपने फैसले में स्पष्ट दर्ज किया: “कानून के तहत घरेलू हिंसा की परिभाषा निश्चित रूप से अत्यंत व्यापक और विस्तृत (Expansive) है, किंतु कानून की नजर में एक ‘व्यथित व्यक्ति’ (Aggrieved Person) माने जाने और राहत पाने हेतु यह साबित करने का भार याचिकाकर्ता पर ही है कि उसके साथ उक्त परिभाषा के दायरे में आने वाला कम से कम कोई कृत्य (At least some act) कारित किया गया था। इस संबंध में केवल मात्र अभिकथन या आरोप (Mere averment) लगा देना पर्याप्त नहीं है। चूंकि याचिकाकर्ता महिला ने अपने दावों के समर्थन में कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया है, अतः उसके द्वारा लगाए गए सभी आरोप अप्रमाणित और असत्यापित (Unsubstantiated and unproved) ही रह गए हैं।”
2. ‘प्रतिवादी एकपक्षीय (Ex Parte) भी हो, तब भी महिला को अपना मामला अपने दम पर साबित करना होगा’:
- अदालत ने सिविल और क्वासी-क्रिमिनल न्यायशास्त्र के बुनियादी नियम को दोहराते हुए कहा:“यद्यपि मामले में प्रतिवादियों में से एक के विरुद्ध कार्यवाही एकपक्षीय (Ex parte) रूप से आगे बढ़ी थी, फिर भी मुकदमे को अपने गुण-दोष (Merits) पर साबित करने का वैधानिक भार पूरी तरह से महिला पर ही था।याचिकाकर्ता केवल प्रतिवादी पक्ष के बचाव की कमजोरी या उसकी अनुपस्थिति पर निर्भर रहकर अपनी राहत का दावा नहीं कर सकती। वादी को अपने पैरों पर खड़े होकर आरोपों को साबित करना होता है।”
3. बार-बार अवसर दिए जाने के बाद भी साक्ष्य न देना:
- अदालत ने प्रक्रियात्मक चूक को रेखांकित किया कि महिला को अपने दावों के समर्थन में दस्तावेज और मौखिक गवाही पेश करने के लिए तीन बार स्पष्ट अवसर दिए गए थे। इसके बावजूद उसने साक्ष्य का हलफनामा तक दाखिल नहीं किया, जिसके चलते 26 सितंबर 2026 को उसका साक्ष्य का अधिकार कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया था।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2021–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
|---|---|
| फोरम / न्यायालय | न्यायालय, न्यायिक मजिस्ट्रेट, नई दिल्ली |
| पीठासीन न्यायिक अधिकारी | ऋषिका श्रीवास्तव (Judicial Magistrate Rishika Srivastava) |
| निर्णय की तिथि | 28 अक्टूबर 2026 (विस्तृत आदेश नवंबर 2026 में जारी) |
| केस संदर्भ | शिकायतकर्ता (पत्नी) बनाम अभियुक्त/प्रतिवादी (पति, सास-ससुर व अन्य) [CC No. … / DV Act] |
| याचिकाकर्ता महिला के आरोप | 1. गंभीर उत्पीड़न: शादी के दौरान उसके साथ लगातार शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और यौन दुर्व्यवहार किया गया। 2. दहेज मांग: पिता से ₹35 लाख की नकदी मांगने और न देने पर प्रताड़ित करने का आरोप। 3. आपराधिक धमकी: आरोप लगाया कि पति ने उसकी अश्लील/निजी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी दी। |
| महिला द्वारा मांगी गई राहतें | • धारा 18 व 19: संरक्षण आदेश (Protection Orders) एवं ससुराल में निवास का अधिकार (Residence Orders)। • धारा 20: ₹40,000 प्रति माह का नियमित भरण-पोषण। • धारा 22: कथित मानसिक प्रताड़ना, भावनात्मक पीड़ा और यौन हिंसा के लिए ₹50,00,000 (पचास लाख रुपये) का एकमुश्त प्रतिकर/मुआवजा। |
| पति व ससुराल पक्ष का बचाव | पति व ससुराल पक्ष की ओर से पेश अधिवक्ता मनीष भदौरिया (Advocate Manish Bhadauria) ने सभी आरोपों का खंडन करते हुए दलील दी कि: 1. दोनों पक्षों के बीच जनवरी 2021 में ही ₹10 लाख के अंतिम भुगतान पर विवाद का पूर्ण निपटारा (Settlement) हो चुका था। 2. महिला एक कामकाजी पेशेवर है और प्रति माह ₹75,000 से अधिक कमा रही है। 3. वह अपनी मर्जी से अपना सारा स्त्रीधन और सामान लेकर वैवाहिक घर छोड़कर गई थी; कोई घरेलू हिंसा नहीं हुई। |
| अदालत का प्रक्रियात्मक निष्कर्ष | महिला को गवाही देने के लिए तीन बार समय दिया गया। 26 सितंबर 2026 को उसका साक्ष्य देने का विधिक अधिकार बंद कर दिया गया क्योंकि उसने कोई हलफनामा या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | घरेलू हिंसा का कोई कृत्य प्रमाणित न होने के कारण याचिका पूरी तरह खारिज (Dismissed)। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘डीवी एक्ट में सबूत का भार और साक्ष्यहीन आरोपों की विफलता’
- ‘व्यथित व्यक्ति’ (Aggrieved Person) की विधिक अनिवार्यता:
- डीवी एक्ट, 2005 की धारा 2(a) के अनुसार, केवल किसी पुरुष के साथ विवाह बंधन में बंधना किसी महिला को स्वतः राहत का हकदार नहीं बनाता।
- राहत का दावा करने के लिए महिला को यह सिद्ध करना होता है कि वह प्रतिवादी के साथ ‘साझा गृहस्थी’ (Shared Household) में रही है और उस दौरान उसके साथ धारा 3 में परिभाषित घरेलू हिंसा का कोई कृत्य घटित हुआ है।
- जब तक घरेलू हिंसा का घटित होना प्राथमिक रूप से प्रमाणित नहीं होता, तब तक अदालत धारा 18 (संरक्षण), धारा 19 (आवास), धारा 20 (गुजारा भत्ता) या धारा 22 (मुआवजा) के तहत कोई भी आदेश पारित करने का क्षेत्राधिकार नहीं रखती।
- ‘सबूत का भार’ (Burden of Proof) और भारतीय साक्ष्य संहिता/अधिनियम:
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 101/102 (भारतीय साक्ष्य संहिता के सुसंगत उपबंध) के तहत जो पक्षकार अदालत से अपने पक्ष में फैसला चाहता है, तथ्यों को साबित करने का प्राथमिक दायित्व उसी पर होता है।
- भले ही डीवी एक्ट की कार्यवाही अर्ध-दीवानी (Quasi-Civil) प्रकृति की होती है और यहाँ सबूत का पैमाना ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (Preponderance of Probabilities) होता है, किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि बिना किसी मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य के केवल शिकायत पत्र में लिखे गए आरोपों को सच मान लिया जाए।
- ‘कमलेश देवी बनाम जयपाल’ [(2019) 14 SCC 494] का सिद्धांत:
- सर्वोच्च न्यायालय ने सुस्थापित किया है कि घरेलू हिंसा अधिनियम का उपयोग केवल वैवाहिक विवादों में प्रतिशोध लेने या अनुचित वित्तीय लाभ हासिल करने के लिए एक दबावकारी तंत्र (Coercive Tool) के रूप में नहीं किया जा सकता।
- यदि कोई महिला अदालत में आकर गवाही देने और जिरह (Cross-examination) का सामना करने से बचती है, तो अदालत यह विधिक निष्कर्ष निकालने के लिए स्वतंत्र है कि लगाए गए आरोप पूरी तरह से झूठे और आधारहीन थे।
- स्वतंत्र आय और भरण-पोषण का संतुलन:
- बचाव पक्ष ने यह भी स्थापित किया कि महिला स्वयं ₹75,000 प्रति माह कमा रही थी और पूर्व में ₹10 लाख का सेटलमेंट हो चुका था।
- यद्यपि स्वयं की आय होना घरेलू हिंसा के खिलाफ सुरक्षा पाने में पूर्ण बाधा नहीं है, किंतु धारा 20 के तहत भरण-पोषण और धारा 22 के तहत ₹50 लाख जैसे भारी-भरकम मुआवजे का निर्धारण करते समय महिला की आर्थिक स्वतंत्रता और उसके आचरण को अदालत द्वारा परखा जाना विधिक रूप से आवश्यक है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: न्यायालय, न्यायिक मजिस्ट्रेट (साकेत / पटियाला हाउस कोर्ट), नई दिल्ली
- पीठासीन न्यायिक अधिकारी: ऋषिका श्रीवास्तव (Judicial Magistrate Rishika Srivastava)
- निर्णय की तिथि: 28 अक्टूबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत दायर याचिका साक्ष्य के अभाव में पूर्णतः खारिज।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- शिकायतकर्ता (पत्नी) की ओर से: अनुपस्थित / विधिक पैरवी में विफलता।
- प्रतिवादी पक्ष (पति व ससुरालियों) की ओर से: अधिवक्ता मनीष भदौरिया (Advocate Manish Bhadauria)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act, 2005):
- धारा 2(a) — ‘व्यथित व्यक्ति’ (Aggrieved Person) की परिभाषा
- धारा 3 — ‘घरेलू हिंसा’ (Domestic Violence) की परिभाषा
- धारा 12 — मजिस्ट्रेट को आवेदन प्रस्तुत करने की प्रक्रिया
- धारा 18, 19, 20 व 22 — संरक्षण, आवास, भरण-पोषण और क्षतिपूर्ति आदेश
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम / भारतीय साक्ष्य संहिता (BSA) — सबूत का भार (Burden of Proof on the Complainant)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) — आदेश 17 (स्थगन व साक्ष्य का अधिकार बंद किया जाना)
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act, 2005):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- घरेलू हिंसा के मुकदमों में साक्ष्य और राहत पात्रता का विधिक मानक: ‘घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत किसी भी प्रकार का मौद्रिक अनुतोष, भरण-पोषण या प्रतिकर प्राप्त करने के लिए शिकायतकर्ता पर यह प्राथमिक विधिक भार है कि वह कम से कम किसी एक घरेलू हिंसा के कृत्य को विश्वसनीय साक्ष्यों द्वारा सिद्ध करे; केवल शिकायत पत्र में प्रताड़ना, दहेज मांग या दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप लगा देना (Mere Averment) किसी महिला को ‘व्यथित व्यक्ति’ का दर्जा देने के लिए पर्याप्त नहीं है; पर्याप्त अवसर दिए जाने के उपरांत भी यदि शिकायतकर्ता साक्ष्य हलफनामा या गवाही प्रस्तुत करने में विफल रहता है, तो आरोपों को अप्रमाणित माना जाएगा; तथा प्रतिवादी के एकपक्षीय रहने की स्थिति में भी अदालतें साक्ष्य के पूर्ण अभाव में केवल अनुमानों के आधार पर हर्जाने या गुजारे भत्ते का आदेश पारित नहीं कर सकतीं।’
- वर्तमान स्थिति व तात्कालिक प्रभाव: अदालत द्वारा शिकायत खारिज किए जाने के साथ ही पति और उसके परिजनों के विरुद्ध घरेलू हिंसा की यह कार्यवाही समाप्त हो गई है; यदि महिला इस आदेश के विरुद्ध सत्र न्यायालय (Sessions Court) में अपील दायर करना चाहती है, तो उसे डीवी एक्ट की धारा 29 के तहत निर्धारित 30 दिनों की परिसीमा के भीतर अपील प्रस्तुत करनी होगी।
Domestic Violence:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | जिला अदालत, नई दिल्ली |
| न्यायिक अधिकारी | न्यायिक मजिस्ट्रेट ऋषिका श्रीवास्तव (JM Rishika Srivastava) |
| फैसले की तिथि | 28 अक्टूबर 2026 |
| कानूनी प्रावधान | घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act, 2005) |
| प्रतिवादी पक्ष | पति व ससुराल पक्ष | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता मनीष भदौरिया (Advocate Manish Bhadauria) |
| महिला की मांगें | 1. ₹40,000 प्रति माह गुजारा भत्ता व निवास स्थान का आदेश। 2. मानसिक/शारीरिक उत्पीड़न के एवज में ₹50 लाख का मुआवजा। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका खारिज: साक्ष्य प्रस्तुत न करने पर आरोपों को अप्रमाणित माना गया। |

