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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी बिंदु
- अभियोजन का मूल आरोप बनाम गवाहों के बयान:अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि मामा ने अपनी नाबालिग भांजी के साथ बार-बार दुष्कर्म किया। हालांकि, ट्रायल कोर्ट के समक्ष जब अभियोजन साक्ष्य दर्ज किए जा रहे थे, तब नाबालिग पीड़िता (P.W.-1) और उसकी मां (P.W.-2/शिकायतकर्ता) दोनों ही अपने आरोपों से पलट गईं और उन्हें पक्षद्रोही (Hostile Witnesses) घोषित कर दिया गया।
- ट्रायल कोर्ट में पीड़िता व मां का स्पष्टीकरण:
- नाबालिग पीड़िता (P.W.-1): उसने बयान दिया कि मामा ने उसे केवल मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग करने पर डांटा था। इससे नाराज होकर उसने झूठे आरोप लगाए थे।
- पीड़िता की मां (P.W.-2): उसने स्वीकार किया कि उसने एक पड़ोसी के दबाव में आकर एफआईआर दर्ज कराई थी। उसकी बेटी ने उसे कभी किसी यौन उत्पीड़न की बात नहीं बताई थी और पुलिस ने उसका गलत बयान दर्ज किया था।
- POCSO Act की धारा 22 का अनुप्रयोग:अदालत ने पाया कि कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से बचाना है, लेकिन इसका दुरुपयोग किसी निर्दोष व्यक्ति को प्रताड़ित करने या निजी दुश्मनी निकालने के लिए नहीं किया जा सकता। POCSO अधिनियम की धारा 22 विशेष रूप से बच्चों के संबंध में झूठी शिकायत या झूठी सूचना देने वाले के खिलाफ सजा और जुर्माने का प्रावधान करती है।
मुख्य विधिक निष्कर्ष
1. व्यक्तिगत रंजिश के लिए POCSO के दुरुपयोग पर प्रहार:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि जब गवाह खुद अदालत में स्वीकार करते हैं कि केस केवल मोबाइल पर डांटने या पड़ोसियों के उकसावे पर दर्ज कराया गया था, तो ऐसी झूठी शिकायत दर्ज कराने वाले को बिना सजा के नहीं छोड़ा जा सकता।
2. SSP मेरठ को सीधी हिदायत:
अदालत ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, मेरठ को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे धारा 22 POCSO Act के तहत तुरंत एफआईआर दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करें।
प्रयागराज/मेरठ: लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012) की धारा 22 (झूठे परिवाद या मिथ्या सूचना देने के लिए दंड / Punishment for false complaint or false information), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 483 / दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 439 (जमानत की विशेष शक्तियां), भारतीय साक्ष्य अधिनियम/भारतीय साक्ष्य संहिता के तहत मुकर चुके गवाहों (Hostile Witnesses) के बयानों का विधिक प्रभाव, तथा पारिवारिक प्रतिशोध या पड़ोसियों के दबाव में पॉक्सो जैसे कठोर कानूनों के दुरुपयोग की रोकथाम पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत नज़ीरी और सख्त आदेश पारित किया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (Justice Arun Kumar Singh Deshwal) की एकल पीठ ने मेरठ पुलिस द्वारा भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो अधिनियम के तहत गिरफ्तार किए गए एक व्यक्ति की नियमित जमानत याचिका स्वीकार करते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP, Meerut) को सीधे निर्देशित किया है कि वह प्रथम सूचनाकर्ता महिला (आरोपी की सगी बहन) के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 22 के तहत तत्काल आपराधिक प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करें।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट में दर्ज साक्ष्यों का संज्ञान लेते हुए पाया कि नाबालिग भांजी (P.W.-1) ने खुली अदालत में यह गवाही दी कि उसके सगे मामा ने उसके साथ कभी कोई गलत काम नहीं किया था; मामा ने केवल उसे मोबाइल फोन का अत्यधिक इस्तेमाल करने पर डांट दिया था, जिससे नाराज होकर उसने यह गंभीर आरोप लगा दिया। वहीं शिकायतकर्ता मां (P.W.-2) ने ट्रायल कोर्ट में स्वीकार किया कि उसने एक पड़ोसी के दबाव और प्रभाव में आकर अपने निर्दोष भाई के खिलाफ बलात्कार की झूठी एफआईआर लिखवाई थी।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक निर्देश
1. ‘सगी बहन ने भाई के खिलाफ कराया झूठा मुकदमा दर्ज; कोर्ट में स्वयं स्वीकार किया’:
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने गवाहों के बयानों का परीक्षण करते हुए अपने 28 अक्टूबर के आदेश में कड़ा रुख दर्ज किया: “अभियोजन गवाह P.W.-1 (नाबालिग पीड़िता) और P.W.-2 (प्रथम सूचनाकर्ता/मां) के बयानों के अवलोकन से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि P.W.-2 (प्रथम सूचनाकर्ता) ने आवेदक के खिलाफ पूरी तरह से झूठा मुकदमा (False Case) दर्ज कराया था, और इस तथ्य को उसने स्वयं विचारण न्यायालय (Trial Court) के समक्ष अपने बयान में स्वीकार किया है। अतः, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), मेरठ को निर्देशित किया जाता है कि वह आवेदक के विरुद्ध झूठा मुकदमा दर्ज कराने के लिए P.W.-2 (प्रथम सूचनाकर्ता) के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 22 के अनुसार एक आपराधिक प्राथमिकी (F.I.R.) दर्ज करें।”
2. ‘मोबाइल की डांट पर इतना बड़ा आरोप और निर्दोष जेल में’:
- अदालत के संज्ञान में लाया गया कि नाबालिग लड़की ने ट्रायल कोर्ट में बताया कि घटना वाले दिन मामा ने केवल उसे पढ़ाई के समय मोबाइल चलाने पर डांटा-फटकारा था।
- गुस्से और बहकावे में आकर उसने मां को झूठी कहानी बताई, जिसके बाद मां ने बिना किसी चिकित्सकीय या तथ्यात्मक पुष्टि के अपने ही भाई पर बार-बार दुष्कर्म करने का घिनौना आरोप मढ़ दिया।
3. मां का पड़ोसी के दबाव में एफआईआर दर्ज कराने का इकबालिया बयान:
- ट्रायल कोर्ट में जब मां (P.W.-2) का परीक्षण हुआ, तो उसने स्पष्ट रूप से अभियोजन कहानी का समर्थन करने से इनकार कर दिया और मुकर गई (Turned Hostile)।
- उसने कोर्ट को बताया कि उसकी बेटी ने उसे कभी भी किसी यौन उत्पीड़न की बात नहीं बताई थी। उसने केवल एक पड़ोसी के कहने और दबाव में आकर पुलिस में तहरीर दी थी, तथा पुलिस ने उसके बयानों को मनमाने ढंग से तोड़-मरोड़ कर लिखा था।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (आपराधिक जमानत क्षेत्राधिकार) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (Justice Arun Kumar Singh Deshwal) (एकल पीठ) |
| आदेश की तिथि | 28 अक्टूबर 2026 (विस्तृत आदेश नवंबर 2026 में जारी) |
| केस संदर्भ | आवेदक (मामा) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [Bail Application / 2026] |
| आवेदक (अभियुक्त) | नाबालिग पीड़िता का सगा मामा — जो मेरठ पुलिस द्वारा दर्ज मामले में लंबे समय से जेल में निरुद्ध था। |
| प्रथम सूचनाकर्ता (P.W.-2) | नाबालिग पीड़िता की सगी मां (आरोपी की सगी बहन)। |
| पीड़िता (P.W.-1) | नाबालिग भांजी। |
| दर्ज मूल अभियोग | प्रथम सूचना रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि मामा ने अपनी सगी नाबालिग भांजी के साथ कई बार बलात्कार किया। मेरठ पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की गंभीर धाराओं और पॉक्सो अधिनियम, 2012 की सुसंगत धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की थी। |
| विचारण न्यायालय में गवाहियों का मोड़ | विचारण के दौरान जब नाबालिग (P.W.-1) और उसकी मां (P.W.-2) कठघरे में आईं, तो दोनों ने अभियोजन के आरोपों का समर्थन करने से पूरी तरह इनकार कर दिया। अदालत ने दोनों को पक्षद्रोही (Hostile) घोषित किया। • P.W.-1 (बेटी): स्वीकार किया कि कोई दुष्कर्म नहीं हुआ; केवल मोबाइल इस्तेमाल पर डांटने के कारण झूठा आरोप लगाया था। • P.W.-2 (मां): स्वीकार किया कि उसने एक पड़ोसी के बहकावे व दबाव में आकर अपने सगे भाई के खिलाफ झूठी शिकायत दी थी। |
| राज्य का विधिक पक्ष | अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता (AGA) भूपेंद्र पाल सिंह ने तकनीकी आधार पर जमानत का विरोध किया, किंतु वे ट्रायल कोर्ट के आधिकारिक रिकॉर्ड और गवाहियों से मुकरने के अकाट्य तथ्य का खंडन नहीं कर सके। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | 1. आवेदक (मामा) को नियमित जमानत (Bail Granted) प्रदान की गई। 2. एसएसपी मेरठ को आदेश दिया गया कि वे झूठा परिवाद दर्ज कराने वाली मां (P.W.-2) के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 22 के तहत तत्काल एफआईआर दर्ज करें। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘पॉक्सो अधिनियम की धारा 22 और झूठे मुकदमों पर न्यायिक प्रहार’
- पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 22 का कानूनी ढांचा:
- पॉक्सो कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए अत्यधिक कठोर प्रावधान करता है, जहाँ धारा 29 और 30 के तहत अभियुक्त के विरुद्ध अपराध की विधिक उपधारणा (Presumption of Guilt) लागू होती है और जमानत मिलना अत्यंत कठिन होता है।
- संसद ने इस कानून के दुरुपयोग की संभावना को भांपते हुए धारा 22 को समाविष्ट किया था:“धारा 22(1): जो कोई किसी बच्चे के प्रति इस अधिनियम के अधीन अपराध किए जाने की कोई झूठी शिकायत करेगा या झूठी सूचना देगा, जिसका एकमात्र आशय किसी व्यक्ति को अपमानित करना, प्रताड़ित करना या नुकसान पहुंचाना हो, वह कारावास से, जो छह महीने तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जाएगा।”
- (यद्यपि धारा 22(2) अवयस्क बच्चे को सजा से छूट देती है, किंतु बालिग मां या अभिभावक जिसने द्वेषवश या दबाव में आकर मामला दर्ज कराया हो, वह पूर्णतः दंड का भागीदार है)।
- पारिवारिक विवादों और तुच्छ बातों पर गंभीर धाराओं का उपयोग:
- न्यायपालिका ने बार-बार चिंता जताई है कि संपत्ति विवादों, पारिवारिक मनमुटाव या मोबाइल फोन पर डांटने जैसी अत्यंत सामान्य घरेलू बातों पर बदला लेने के लिए पॉक्सो और BNS की बलात्कार जैसी धाराओं का सहारा लिया जा रहा है।
- जब कोई गवाह अदालत में आकर यह स्वीकार करता है कि उसने झूठा केस दर्ज कराया था, तो अदालतों को मूकदर्शक बने रहने के बजाय धारा 22 के तहत सक्रिय अभियोजन का आदेश देना चाहिए ताकि कानून का ऐसा भयावह दुरुपयोग रुके।
- निर्दोष के मानवाधिकार और अनुच्छेद 21 का हनन:
- एक निर्दोष व्यक्ति जिसने केवल अभिभावक के रूप में अपनी भांजी को अनुशासन सिखाने के लिए डांटा था, उसे महीनों जेल में बिताना पड़ा और समाज में ‘बलात्कारी’ का सामाजिक दंश झेलना पड़ा।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश स्पष्ट संदेश देता है कि अदालती प्रक्रिया को हथियार बनाकर निर्दोषों का जीवन बर्बाद करने वाले शिकायतकर्ताओं को बख्शा नहीं जाएगा।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (आपराधिक क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: आवेदक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [Bail Application No. … / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (Justice Arun Kumar Singh Deshwal) (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 28 अक्टूबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: आवेदक को नियमित जमानत स्वीकृत; झूठी शिकायत दर्ज कराने वाली मां (P.W.-2) के विरुद्ध पॉक्सो एक्ट की धारा 22 के तहत आपराधिक प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का आदेश जारी।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- आवेदक (मामा/अभियुक्त) की ओर से: अधिवक्ता सैयद शाहनवाज़ शाह (Advocate Syed Shahnawaz Shah)।
- उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से: अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) भूपेंद्र पाल सिंह (Additional Government Advocate Bhupendra Pal Singh)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012):
- धारा 22 — मिथ्या परिवाद या मिथ्या सूचना के लिए शास्ति/दंड
- धारा 29 व 30 — कतिपय अपराधों के बारे में उपधारणा (Presumption as to certain offences)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 483 (उच्च न्यायालय की जमानत शक्तियां / पूर्व CrPC धारा 439) एवं धारा 173 (संज्ञेय मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने का पुलिस दायित्व)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) — बलात्कार एवं गंभीर यौन उत्पीड़न से संबंधित प्रावधान
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम / भारतीय साक्ष्य संहिता (BSA) — धारा 154 (पक्षद्रोही गवाह / Hostile Witness)
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- पॉक्सो अधिनियम के दुरुपयोग और झूठी प्राथमिकी पर दंडात्मक कार्रवाई का विधिक मानक: ‘पॉक्सो अधिनियम की विशेष कठोरता और अभियुक्त के विरुद्ध अपराध की विधिक उपधारणा (Presumption of Guilt) यह मांग करती है कि इस कानून के दुरुपयोग पर न्यायपालिका शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) की नीति अपनाए; जब विचारण के दौरान नाबालिग पीड़िता और उसकी मां (प्रथम सूचनाकर्ता) स्वयं यह स्वीकार कर लें कि मोबाइल की डांट या पड़ोसी के दबाव के चलते प्रतिशोधवश पूरी तरह मनगढ़ंत और झूठा बलात्कार का मामला दर्ज कराया गया था, तो अदालत का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह निर्दोष अभियुक्त को तत्काल जमानत पर रिहा करे और झूठा मुकदमा दर्ज कराने वाले बालिग शिकायतकर्ता के विरुद्ध पॉक्सो अधिनियम की धारा 22 के तहत अनिवार्य रूप से आपराधिक प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दे; कानून की शुचिता की रक्षा और निर्दोषों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) के संरक्षण हेतु ऐसा न्यायिक हस्तक्षेप अपरिहार्य है।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस न्यायिक निर्देश के अनुपालन में आदेश की प्रमाणित प्रति वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), मेरठ को औपचारिक रूप से प्रेषित की गई है; मेरठ पुलिस को शिकायतकर्ता महिला के विरुद्ध पॉक्सो एक्ट की धारा 22 के तहत सुसंगत धाराओं में नया आपराधिक मुकदमा दर्ज कर उच्च न्यायालय के समक्ष अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
False FIR: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court), प्रयागराज |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (Justice Arun Kumar Singh Deshwal) |
| आदेश की तिथि | 28 अक्टूबर 2026 |
| मूल मामला | भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पोक्सो अधिनियम (POCSO Act) के तहत मेरठ के ब्रह्मपुरी/संबंधित पुलिस स्टेशन में दर्ज मामला। |
| आरोपी/याचिकाकर्ता | पीड़िता का सगा मामा | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता सैयद शाहनवाज शाह |
| राज्य पक्ष | राज्य सरकार (उत्तर प्रदेश) | प्रतिनिधित्व: अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) भूपेंद्र पाल सिंह |
| अदालत का अंतिम आदेश | 1. आरोपी मामा को जमानत मंजूर की गई। 2. मेरठ के एसएसपी (SSP Meerut) को झूठी एफआईआर कराने वाली पीड़िता की मां के खिलाफ POCSO Act की धारा 22 के तहत FIR दर्ज करने का आदेश। |

