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मामले की पृष्ठभूमि और अदालती प्रश्न
- लेआउट प्लान में आपातकालीन व जन-सुविधाओं का अभाव:अदालत ने अधिकारियों से विशेष रूप से पूछा है कि क्या बदलते समय और पुरानी कमियों के अनुभवों को देखते हुए लेआउट प्लान में पुलिस स्टेशन, पुलिस चौकी, पुलिस बूथ, ट्रैफिक बूथ, फायर स्टेशन और क्लीनिक/अस्पतालों के लिए स्थान आरक्षित किए जा रहे हैं या नहीं। यदि ऐसे प्रावधान नहीं हैं, तो अधिकारियों को इन सुविधाओं को प्रदान करने हेतु अपने प्रस्तावों का खुलासा करने का निर्देश दिया गया है।
- ट्रांसफार्मर और कचरा प्रबंधन (Garbage Collection & Transformers):पूर्व की कार्यवाहियों में नगर निगम ने अदालत को बताया था कि विकास प्राधिकरण कॉलोनियों के निर्माण के समय कचरा डंपिंग/कलेक्शन और बिजली के ट्रांसफार्मर लगाने के लिए स्थान तय नहीं करते। इसके परिणामस्वरूप कॉलोनियां बनने के बाद सड़कों के किनारे ट्रांसफार्मर लगा दिए जाते हैं, जो यातायात में बाधा डालते हैं। कोर्ट ने बिजली निगमों के साथ किए गए परामर्श (Consultations) का विवरण भी मांगा है।
- 2025 के नए भवन उप-नियम (Building By-laws 2025):सुनवाई के दौरान एलडीए के वकील ने प्रस्तुत किया कि वर्ष 2025 में लागू किए गए नए बिल्डिंग बाय-लॉज में कचरा निस्तारण और अन्य सुविधाओं के प्रावधान शामिल किए गए हैं, लेकिन वे ट्रांसफार्मर स्थान को लेकर स्पष्टता नहीं दे सके। कोर्ट ने इस पर स्थिति स्पष्ट करने का आदेश दिया।
मुख्य विधिक व प्रशासनिक बिंदु
1. नागरिक अधिकारों और सुरक्षित जीवन का संतुलन:
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख दर्शाता है कि केवल आवासीय भूखंड या मकान बेचना ही विकास प्राधिकरणों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि व्यवस्थित पुलिसिंग, अग्निशमन सेवा और नागरिक स्वच्छता के लिए जमीन का आवंटन टाउन प्लानिंग का अनिवार्य हिस्सा है।
2. अंतर-विभागीय समन्वय (Inter-Departmental Coordination):
अदालत ने स्पष्ट किया है कि लेआउट बनाते समय बिजली विभाग, स्वास्थ्य विभाग और पुलिस प्रशासन के साथ वैधानिक तालमेल बिठाना आवश्यक है।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश नगर योजना और विकास अधिनियम, 1973 (UP Urban Planning and Development Act, 1973) की धारा 8, 9 व 10 (मास्टर प्लान और जोनल लेआउट योजनाओं की तैयारी व नागरिक सुविधाओं का प्रावधान), उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम, 1965 (UP Housing and Development Board Act, 1965), उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959, भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वस्थ, सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण में जीवन जीने का मौलिक अधिकार), तथा शहरों और आवासीय कॉलोनियों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एवं विद्युत बुनियादी ढांचे के सुरक्षित नियोजन पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने व्यापक जनहित में कड़ा रुख अपनाया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति राजन रॉय (Justice Rajan Roy) और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला (Justice Manjive Shukla) की खंडपीठ ने “लेआउट प्लान/टाउन प्लानिंग और आवश्यक सुविधाओं का प्रावधान” (In Re: Layout Plan/Town Planning and Provision of Necessary Amenities) शीर्षक से दर्ज स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (Suo Motu PIL) के न्यायिक दायरे का विस्तार करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और लखनऊ के सभी विकास एवं नागरिक निकायों को कड़े निर्देश जारी किए हैं।
खंडपीठ ने राज्य सरकार, लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA), उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद (UP Awas Vikas Parishad) और लखनऊ नगर निगम (LMC) को निर्देश दिया कि वे चार सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करें कि नई आवासीय कॉलोनियों और कस्बों के लेआउट प्लान में पुलिस स्टेशनों, पुलिस चौकियों, फायर स्टेशनों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों/अस्पतालों, कचरा डंपिंग स्थलों और बिजली के ट्रांसफॉर्मर लगाने के लिए पर्याप्त जगह छोड़ी जा रही है या नहीं। अदालत ने भावी नागरिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भविष्य की टाउन प्लानिंग का एक व्यापक रोडमैप (Comprehensive Roadmap) तैयार करने का आदेश देते हुए अगली सुनवाई 7 दिसंबर 2026 को नियत की है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी बिंदु एवं प्रशासनिक निर्देश
1. ‘टाउन प्लानिंग में आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता स्वस्थ और सुरक्षित जीवन हेतु अनिवार्य’:
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने अनियोजित शहरीकरण पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए अपने आदेश में रेखांकित किया: “सार्वजनिक विकास प्राधिकरणों द्वारा विकसित आवासीय कॉलोनियों में नागरिकों के लिए स्वस्थ, स्वच्छ, आरोग्यकर और सुरक्षित जीवन दशाएं (Healthy, hygienic and safe living conditions) सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक नागरिक सुविधाओं की अग्रिम उपलब्धता एक अपरिहार्य शर्त है। अक्सर यह देखा जाता है कि कॉलोनियां बसने के बाद कचरा एकत्र करने और बिजली के ट्रांसफॉर्मर लगाने के लिए कोई जगह नहीं बचती। इसके परिणामस्वरूप सड़कों के किनारे अवैध रूप से ट्रांसफॉर्मर लगा दिए जाते हैं, जो यातायात को बाधित करते हैं और पैदल चलने वालों व स्थानीय नागरिकों के जीवन के लिए निरंतर जानलेवा खतरा बने रहते हैं।”
2. सुरक्षा, स्वास्थ्य और आपातकालीन सेवाओं का लेआउट प्लान में अनिवार्य समावेशन:
अदालत ने प्राधिकरणों से बिंदुवार स्पष्टीकरण तलब किया है:
- सुरक्षा एवं पुलिसिंग व्यवस्था: क्या नए लेआउट प्लान में आबादी के अनुपात के आधार पर पुलिस स्टेशन, पुलिस चौकियां (Police Outposts), पुलिस बूथ और ट्रैफिक बूथ के लिए विशिष्ट भूखंड आरक्षित किए गए हैं?
- अग्निशमन व आपदा प्रबंधन: क्या तेजी से बढ़ती घनी कॉलोनियों और बहुमंजिला इमारतों को देखते हुए फायर स्टेशन (Fire Stations) हेतु मानक अनुसार स्थल चिह्नित हैं?
- चिकित्सा सुविधाएं: क्या नागरिकों की प्राथमिक आपातकालीन स्वास्थ्य जरूरतों हेतु चिकित्सा क्लीनिक या सरकारी अस्पताल के लिए भूमि आवंटित की गई है?
- प्रस्तावों का प्रकटीकरण: यदि वर्तमान में लेआउट नियमों में इन सुविधाओं का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो संबंधित प्राधिकरण इन अनिवार्य सेवाओं को शामिल करने हेतु अपने भविष्य के प्रस्ताव अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें।
3. ट्रांसफॉर्मर स्थापना और कचरा प्रबंधन (Garbage Disposal) पर अंतर्विभागीय परामर्श:
- विद्युत कंपनियों से समन्वय: अदालत ने सवाल उठाया कि लेआउट प्लान तैयार करते समय मध्यांचल विद्युत वितरण निगम (MVVNL), पारेषण निगम और संबंधित विद्युत विभागों से क्या कोई औपचारिक परामर्श किया जाता है?
- अस्पष्ट भवन उपनियम (Building By-laws): सुनवाई के दौरान एलडीए और आवास विकास के वकील ने कहा कि 2025 में लागू नए भवन उपनियमों में कचरा निस्तारण और अन्य सुविधाओं का प्रावधान है, किंतु वे ट्रांसफॉर्मर स्थापना के विशिष्ट नियमों पर अनिश्चित थे। अदालत ने आदेश दिया कि वे सुसंगत नियम और दिशानिर्देश रिकॉर्ड पर रखें।
- नगर निगम से सुझाव: लखनऊ नगर निगम को अलग से हलफनामा दायर कर उन व्यावहारिक सुविधाओं की सूची देने को कहा गया है जिन्हें लेआउट प्लान की स्वीकृति से पूर्व अनिवार्य किया जाना चाहिए।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2025–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ (संवैधानिक स्वतः संज्ञान जनहित याचिका क्षेत्राधिकार) |
| पीठ | न्यायमूर्ति राजन रॉय (Justice Rajan Roy) एवं न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला (Justice Manjive Shukla) |
| आदेश की तिथि | 3 नवंबर 2026 (अगली सुनवाई 7 दिसंबर 2026 को नियत) |
| केस शीर्षक | स्वतः संज्ञान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [In Re: Layout Plan/Town Planning and Provision of Necessary Amenities — PIL No. … / 2026] |
| प्रतिवादी पक्ष | 1. उत्तर प्रदेश सरकार (आवास एवं शहरी नियोजन विभाग / नगर विकास विभाग) 2. लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) 3. उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद 4. लखनऊ नगर निगम (LMC) 5. विद्युत वितरण निगम (MVVNL / UPPCL) |
| पीआईएल का मूल उद्भव | उच्च न्यायालय ने यह स्वतः संज्ञान जनहित याचिका मूलतः शहरी नियोजन की उन गंभीर खामियों को दूर करने के लिए दर्ज की थी, जहाँ विकास प्राधिकरण कॉलोनियां तो काट देते हैं, किंतु न तो ठोस कचरा एकत्र करने के लिए कोई विशिष्ट स्थल आरक्षित करते हैं और न ही बिजली के भारी ट्रांसफॉर्मर लगाने के लिए। परिणामस्वरूप, कॉलोनियों के बसने के बाद नगर निगम को कचरा उठाने में भारी कठिनाई होती है और बिजली विभाग सड़कों व फुटपाथों पर ट्रांसफॉर्मर खड़े कर देता है, जिससे आए दिन गंभीर सड़क हादसे और करंट लगने की घटनाएं होती हैं। |
| निकायों का विधिक रुख | • नगर निगम: विकास प्राधिकरणों पर आरोप लगाया कि वे व्यावसायिक लाभ के चक्कर में शत-प्रतिशत जमीन बेच देते हैं और सार्वजनिक उपयोगिता (Public Utilities) हेतु जगह नहीं छोड़ते। • LDA व आवास परिषद: दलील दी कि वर्ष 2025 में अधिसूचित नए भवन उपनियमों (Building By-laws 2025) में सार्वजनिक सुविधाओं के प्रावधान हैं, किंतु वे ट्रांसफॉर्मर स्थापना के विशिष्ट उपबंधों की सटीक जानकारी पेश नहीं कर सके। |
| हाईकोर्ट द्वारा दायरा विस्तार | अदालत ने केवल कचरे और ट्रांसफॉर्मर तक सीमित न रहकर सुरक्षा, स्वास्थ्य, अग्नि सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को भी शहरी नियोजन के अनिवार्य घटकों के रूप में शामिल करते हुए याचिका का दायरा विस्तृत कर दिया। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘सतत शहरी नियोजन और अनुच्छेद 21’
- उत्तर प्रदेश नगर योजना और विकास अधिनियम, 1973 के सांविधिक प्रावधान:
- धारा 8 व 9: विकास प्राधिकरणों (LDA आदि) को यह स्पष्ट अधिदेश देती हैं कि वे किसी भी क्षेत्र के जोनल विकास प्लान में सड़कों, खुले स्थानों, पार्कों, विद्यालयों, सार्वजनिक उपयोगिताओं (सीवेज, अपशिष्ट प्रबंधन, विद्युत) और नागरिक सुविधाओं के लिए भूमि का अनिवार्य आरक्षण सुनिश्चित करें।
- कानूनन कोई भी निजी या सरकारी लेआउट तब तक स्वीकृत नहीं किया जा सकता जब तक कि उसमें आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं के लिए पर्याप्त भूमि न छोड़ी गई हो। प्राधिकरणों द्वारा केवल आवासीय और व्यावसायिक भूखंड काटकर राजस्व कमाना और बुनियादी नागरिक सेवाओं को भगवान भरोसे छोड़ देना कानून की मूल भावना के विपरीत है।
- ‘जीवन के अधिकार’ (Article 21) का अनिवार्य घटक:
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विजयनगर रेजिडेंट्स एसोसिएशन बनाम कर्नाटक राज्य और फ्रेंड्स कॉलोनी रेजिडेंट्स सोसायटी बनाम उड़ीसा राज्य [(2004) 8 SCC 733] में स्पष्ट किया है कि टाउन प्लानिंग के नियम केवल प्रशासनिक दिशानिर्देश नहीं हैं, बल्कि वे नागरिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमापूर्ण जीवन की रक्षा के लिए बनाए गए वैधानिक सुरक्षा कवच हैं।
- सड़कों पर ट्रांसफॉर्मर का खुला जाल और कॉलोनियों के मुहाने पर कचरे का जमावड़ा नागरिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के मौलिक अधिकार का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
- सार्वजनिक सुरक्षा बनाम विभागीय अलगाव (Departmental Silos):
- आधुनिक शहरी नियोजन में “अंतर्विभागीय समन्वय” प्राथमिक आवश्यकता है।
- अक्सर विकास प्राधिकरण लेआउट पास करते समय पुलिस विभाग से यह नहीं पूछते कि कानून-व्यवस्था हेतु थाने या चौकी की आवश्यकता कहाँ होगी; न ही अग्निशमन विभाग (Fire Services) से पूछा जाता है कि आग लगने पर दमकल की बड़ी गाड़ियां मुड़ सकेंगी या नहीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह न्यायिक हस्तक्षेप इन सभी विभागों को एक मंच पर लाकर ‘एकीकृत शहरी नियोजन नीति’ लागू कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ (संवैधानिक स्वतः संज्ञान जनहित याचिका क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: स्वतः संज्ञान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [Suo Motu PIL — In Re: Layout Plan/Town Planning and Provision of Necessary Amenities — PIL No. … / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति राजन रॉय (Justice Rajan Roy) एवं न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला (Justice Manjive Shukla)
- आदेश की तिथि: 3 नवंबर 2026
- हलफनामा दाखिल करने की समय-सीमा: चार सप्ताह के भीतर
- अगली सुनवाई की तिथि: 7 दिसंबर 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- न्यायालय की ओर से: स्वतः संज्ञान जनहित याचिका।
- उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से: मुख्य स्थायी अधिवक्ता (CSC)।
- लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) व आवास परिषद की ओर से: प्राधिकरण के स्थायी विधिक परामर्शदाता।
- लखनऊ नगर निगम (LMC) की ओर से: नगर निगम के स्थायी अधिवक्ता।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) एवं अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- उत्तर प्रदेश नगर योजना और विकास अधिनियम, 1973 (UP Urban Planning and Development Act, 1973) — धारा 8, 9, 10 व 14 (मास्टर प्लान, जोनल लेआउट व विकास अनुज्ञा)
- उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम, 1965 (UP Housing & Development Board Act, 1965)
- उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 — ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और सार्वजनिक स्वास्थ्य के कर्तव्य
- राष्ट्रीय भवन संहिता, 2016 (National Building Code of India – NBC) एवं उत्तर प्रदेश भवन निर्माण एवं विकास उपविधि (संशोधित 2025)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- एकीकृत शहरी नियोजन, नागरिक सुविधाएं और जनसुरक्षा का विधिक मानक: ‘शहरी और आवासीय क्षेत्रों का विकास केवल भवनों और सड़कों के निर्माण तक सीमित नहीं हो सकता; नागरिकों को स्वच्छ, प्रदूषण-मुक्त और सुरक्षित वातावरण प्रदान करना अनुच्छेद 21 के तहत एक गैर-परक्राम्य संवैधानिक गारंटी है; विकास प्राधिकरणों और नगर निकायों का यह वैधानिक दायित्व है कि वे किसी भी लेआउट प्लान को स्वीकृति देने से पूर्व ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Garbage Disposal), विद्युत बुनियादी ढांचे (Transformers), अग्निशमन स्टेशनों, पुलिस चौकियों और स्वास्थ्य केंद्रों हेतु अनिवार्य भूखंड आरक्षित करें; लेआउट में जगह के अभाव के चलते सार्वजनिक सड़कों व फुटपाथों पर ट्रांसफॉर्मर लगाना लोक सुरक्षा और यातायात की स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन है; तथा भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सभी संबंधित उपयोगिता विभागों (Utilities) के साथ पूर्व परामर्श कर एक व्यापक व एकीकृत रोडमैप तैयार किया जाना राज्य की विधिक बाध्यता है।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: उच्च न्यायालय के इस आदेश के पश्चात प्रमुख सचिव (आवास एवं शहरी नियोजन), प्रमुख सचिव (नगर विकास), एलडीए उपाध्यक्ष, आवास आयुक्त और नगर आयुक्त लखनऊ को आगामी चार सप्ताह के भीतर अपने-अपने विभागों की ओर से बिंदुवार जवाबी हलफनामे और भविष्य की टाउन प्लानिंग का विस्तृत ब्लूप्रिंट अदालत में दाखिल करना होगा; 7 दिसंबर 2026 को खंडपीठ इन हलफनामों की समीक्षा कर पूरे राज्य के लिए बाध्यकारी दिशानिर्देश जारी करने पर विचार करेगी।
Town Planning: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) |
| पीठ | न्यायमूर्ति राजन रॉय एवं न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला |
| मामला/विषय | टाउन प्लानिंग व लेआउट प्लान में बुनियादी सुविधाओं का स्वतः संज्ञान मामला (Layout Plan/Town Planning and Provision of Necessary Amenities) |
| प्रतिवादी निकाय | उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA), यूपी आवास एवं विकास परिषद, लखनऊ नगर निगम |
| मुख्य निर्देश | 1. 4 सप्ताह के भीतर लेआउट प्लान में पुलिस चौकी, फायर स्टेशन, कचरा प्रबंधन व अस्पतालों हेतु भूमि प्रावधान पर हलफनामा। 2. भविष्य की टाउन प्लानिंग के लिए व्यापक रोडमैप पेश करना। |
| अगली सुनवाई | 07 दिसंबर 2026 |

