Wednesday, November 4, 2026
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Place De-notify: जंतर-मंतर को कभी विरोध स्थल बनाना ही नहीं चाहिए था; किसी को विशिष्ट स्थान पर प्रदर्शन का मौलिक अधिकार नहीं, दिल्ली पुलिस का रहा जवाब

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दिल्ली पुलिस द्वारा अदालत में प्रस्तुत आंकड़े और तर्क

  1. सीमित क्षमता और भीड़ का दबाव:जंतर-मंतर पर केवल 1,500 लोगों के एकत्र होने की क्षमता है। जुलाई में कॉकरोच जनता पार्टी (Cockroach Janta Party) के प्रदर्शन के दौरान भीड़ इस क्षमता से कई गुना अधिक हो गई थी, जिससे पूरी लुटियंस दिल्ली की यातायात और सुरक्षा व्यवस्था ठप हो गई थी।
  2. संवेदनशील क्षेत्र और सुरक्षा जोखिम:जंतर-मंतर के 3 से 4 किलोमीटर के दायरे में 78 विदेशी दूतावास/मिशन और 99 केंद्र सरकार के कार्यालय स्थित हैं, जहाँ प्रतिदिन लगभग 1,46,040 लोगों का आवागमन होता है। इसके अलावा, आसपास के आवासीय क्षेत्रों में लगभग 64,500 नागरिक निवास करते हैं।
  3. अपराध और सार्वजनिक अव्यवस्था के आंकड़े (1 से 27 अगस्त):पुलिस ने डेटा पेश करते हुए बताया कि अगस्त के केवल 27 दिनों के भीतर विरोध प्रदर्शनों के कारण उस क्षेत्र में:
    • 250 इमरजेंसी कॉल (Distress Calls) प्राप्त हुईं।
    • 109 चोरी की एफआईआर और 10 वाहन चोरी के मामले दर्ज हुए।
    • 23 एफआईआर सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने, दंगा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की दर्ज की गईं।
    • 14 मामले दिल्ली पुलिस अधिनियम के तहत दर्ज किए गए।

मुख्य विधिक व प्रशासनिक बिंदु

1. विरोध का अधिकार बनाम स्थान का चयन:

दिल्ली पुलिस ने दोहराया कि अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत प्रदर्शन का अधिकार निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। राज्य प्रशासन लोक व्यवस्था (Public Order) और आम जनता की सुरक्षा के हित में विरोध प्रदर्शनों के लिए स्थान और समय तय करने हेतु पूरी तरह अधिकृत है।

2. सुप्रीम कोर्ट की व्यापक सुनवाई:

यह हलफनामा सुप्रीम कोर्ट के उस व्यापक विचार-विमर्श का हिस्सा है, जिसमें अदालत दिल्ली में बार-बार होने वाले धरने-प्रदर्शनों, रामलीला मैदान व जंतर-मंतर की स्थिति और आम नागरिकों व दिहाड़ी मजदूरों की आजीविका पर पड़ने वाले असर की सुनवाई कर रही है।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) व अनुच्छेद 19(1)(b) (निरायुध शांतिपूर्ण सम्मेलन का अधिकार) बनाम अनुच्छेद 19(2) व 19(3) (सार्वजनिक व्यवस्था, संप्रभुता और सुरक्षा के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन), दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 के तहत पुलिस आयुक्त की विनियामक शक्तियां, सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) बनाम भारत संघ [(2018) 17 SCC 324] (जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के नियमन संबंधी दिशानिर्देश) व अमित साहनी (शाहीन बाग वाद) [(2020) 10 SCC 439], तथा ‘सार्वजनिक स्थान के भौगोलिक चयन का अधिकार बनाम कानून-व्यवस्था’ के संवैधानिक सिद्धांतों पर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit) दाखिल किया है।

दिल्ली पुलिस के पुलिस उपायुक्त (DCP) अनुराग कुमार द्वारा दायर हलफनामे में गृह मंत्रालय (MHA) की उच्चस्तरीय समिति की सर्वसम्मत सिफारिशों का हवाला देते हुए जंतर-मंतर को आधिकारिक विरोध स्थल की सूची से बाहर करने (De-notification) के कार्यकारी फैसले को पूरी तरह विधिक व प्रशासनिक दृष्टि से वैध ठहराया गया है।

दिल्ली पुलिस ने दो-टूक रुख अपनाया कि जंतर-मंतर मूलतः एक सार्वजनिक सड़क (Public Road) है और इसे कभी भी एक निर्दिष्ट प्रदर्शन स्थल के रूप में चिह्नित नहीं किया जाना चाहिए था। हलफनामे में स्पष्ट किया गया कि किसी भी नागरिक या राजनीतिक दल को संविधान के तहत किसी अपनी पसंद के विशिष्ट स्थान पर ही विरोध प्रदर्शन करने का मौलिक अधिकार (No Fundamental Right to Protest at a Particular Site) प्राप्त नहीं है। डिजिटल युग और सोशल मीडिया के सर्वव्यापी प्रसार के दौर में सरकार की सत्ता के केंद्र से प्रदर्शन स्थल की ‘भौगोलिक निकटता’ (Geographical Proximity) का कोई व्यावहारिक औचित्य नहीं रह गया है।

दिल्ली पुलिस के हलफनामे के मुख्य कानूनी आधार एवं प्रशासनिक सांख्यिकी

1. ‘जंतर-मंतर मूलतः एक सार्वजनिक सड़क है; किसी विशेष स्थान पर प्रदर्शन का कोई मौलिक अधिकार नहीं’:

पुलिस उपायुक्त अनुराग कुमार द्वारा दायर हलफनामे में संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए दर्ज किया गया: “जंतर-मंतर मूल रूप से एक सार्वजनिक सड़क (Public Road) है और इसे कभी भी एक निर्दिष्ट विरोध स्थल (Designated Protest Venue) के रूप में चिह्नित नहीं किया जाना चाहिए था। किसी भी नागरिक या संगठन को संविधान के तहत किसी विशिष्ट स्थल पर ही विरोध प्रदर्शन करने का कोई मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है (Nobody has the fundamental right to protest at a particular site)। जंतर-मंतर को गैर-अधिसूचित (De-notify) करने का निर्णय गृह मंत्रालय (MHA) की एक उच्चस्तरीय समिति की सर्वसम्मत सिफारिश पर लिया गया एक विशुद्ध प्रशासनिक एवं कार्यपालिका निर्णय (Administrative and Executive Decision) है, जो कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक हित में है।”

2. ‘डिजिटल युग में सत्ता के केंद्र के पास प्रदर्शन का भौगोलिक औचित्य समाप्त’:

  • पुलिस ने याचिकाकर्ता के ‘निकटता और प्रभावशीलता’ वाले तर्क को खारिज करते हुए कहा:“डिजिटल तकनीक के मौजूदा युग और सोशल मीडिया के व्यापक उपयोग के चलते, सरकार की सत्ता के केंद्र से किसी विरोध स्थल की भौगोलिक निकटता (Geographical proximity to the seat of Government) अब पूरी तरह से अप्रासंगिक और व्यर्थ (Ceased to be relevant and has become redundant) हो चुकी है। आज किसी भी मुद्दे पर संदेश पलक झपकते ही पूरी दुनिया और नीति-निर्माताओं तक पहुँच जाता है।”

3. सुरक्षा जोखिम और भीड़ क्षमता की सीमा (Security Concerns & Crime Data):

हलफनामे में जंतर-मंतर के आसपास की अत्यधिक संवेदनशीलता और हालिया अपराध आंकड़ों का विस्तृत ब्योरा पेश किया गया:

  • सीमित क्षमता: जंतर-मंतर की अधिकतम धारण क्षमता केवल 1,500 व्यक्तियों की है, जबकि राजनीतिक दलों (जैसे जुलाई में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ द्वारा किए गए प्रदर्शन) ने हजारों की अनियंत्रित भीड़ जुटाकर इस क्षमता का घोर उल्लंघन किया।
  • संवेदनशील राजनयिक क्षेत्र: जंतर-मंतर के मात्र 3 से 4 किलोमीटर के दायरे में 78 विदेशी दूतावास एवं उच्चायोग (Embassies/Missions), 99 केंद्रीय सरकारी कार्यालय/मंत्रालय स्थित हैं, जहाँ प्रतिदिन लगभग 1,46,040 लोगों की आवाजाही होती है, साथ ही आसपास के आवासीय परिसरों में 64,500 स्थानीय नागरिक निवास करते हैं।
  • अपराध और अशांति का 27 दिनों का डेटा (1 अगस्त से 27 अगस्त के बीच):
    • 250 इमरजेंसी पुलिस डिस्ट्रेस कॉल्स
    • 109 चोरी की प्राथमिकी (Theft FIRs)
    • 10 वाहन चोरी के मामले
    • 254 संपत्ति नुकसान (Property-loss) के दावे
    • 23 सार्वजनिक व्यवस्था उल्लंघन, दंगा और सार्वजनिक संपत्ति विरूपण की FIR
    • 14 मामले दिल्ली पुलिस अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के तहत दर्ज किए गए।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2018–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित याचिका क्षेत्राधिकार)
केस संदर्भअधिवक्ता स्वाति सिंह बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition (Civil) No. … / 2026]
हलफनामा प्रस्तुतकर्ताअनुराग कुमार (Anurag Kumar) — पुलिस उपायुक्त (DCP), नई दिल्ली जिला / दिल्ली पुलिस।
प्रतिवादी पक्षगृह मंत्रालय (MHA), भारत सरकार एवं दिल्ली पुलिस आयुक्त।
याचिकाकर्ता की मुख्य विधिक दलीलें1. मौलिक अधिकारों का हनन: जंतर-मंतर को विरोध स्थल की सूची से हटाना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19(1)(b) (शांतिपूर्ण सभा) पर अनुचित आघात है।
2. स्थान की महत्ता (Centrality of Location): किसी विरोध प्रदर्शन की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह संबंधित सत्ता प्रतिष्ठानों के कितने करीब है, जनता के लिए कितना सुलभ है और लक्षित नीति-निर्माताओं को सीधे दिखाई देता है या नहीं।
3. विनियमन बनाम निषेध: राज्य ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ के नाम पर अधिकारों को विनियमित (Regulate) कर सकता है, किंतु ऐसा नियमन पूर्ण प्रतिबंध (Prohibition) का रूप नहीं ले सकता जिससे संवैधानिक अधिकार ही निष्प्रभावी (Illusory) हो जाएं।
दिल्ली पुलिस का मुख्य बचाव• जंतर-मंतर एक अत्यंत व्यस्त सार्वजनिक यातायात मार्ग (सड़क) है।
• सीमित क्षमता (1,500 व्यक्ति) के मुकाबले विशाल राजनीतिक रैलियां होने से संसद मार्ग, कनॉट प्लेस और लुटियंस दिल्ली पूरी तरह पंगु हो जाते हैं।
• विदेशी दूतावासों की सुरक्षा और वीवीआईपी आवागमन के लिए यह एक सतत सुरक्षा खतरा बन चुका था।
• प्रदर्शनकारियों के लिए रामलीला मैदान जैसे बड़े अधिसूचित विकल्प पहले से उपलब्ध हैं।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘विरोध का अधिकार बनाम स्थान का चयन और सार्वजनिक व्यवस्था’

  • ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) बनाम भारत संघ’ [(2018) 17 SCC 324] की नज़ीर:
    • एनजीटी (NGT) द्वारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में यह व्यवस्था दी थी कि दिल्ली पुलिस एक विस्तृत दिशानिर्देश तैयार करे जिसमें जंतर-मंतर और बोट क्लब पर सीमित संख्या में शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति दी जा सके।
    • तथापि, उसी निर्णय में शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि विरोध का अधिकार कोई निरपेक्ष अधिकार नहीं है। यदि कानून-व्यवस्था, यातायात प्रबंधन या सुरक्षा कारणों से पुलिस प्रशासन यह पाता है कि किसी स्थल पर शांति बनाए रखना असंभव हो गया है, तो प्रशासन वैकल्पिक स्थल (जैसे रामलीला मैदान या बुराड़ी) उपलब्ध कराकर संवेदनशील क्षेत्रों को गैर-अधिसूचित करने का अधिकार रखता है।
  • ‘स्थान का चयन’ बनाम ‘अभिव्यक्ति का अधिकार’ (No Right to a Specific Location):
    • सर्वोच्च न्यायालय ने रेलवे बोर्ड बनाम निरंजन सिंह [(1969) 1 SCC 502] और हालिया शाहीन बाग निर्णय [(2020) 10 SCC 439] में लगातार यह रेखांकित किया है कि:“संविधान के तहत सभा करने या विरोध दर्ज करने की स्वतंत्रता नागरिकों को किसी भी सार्वजनिक संपत्ति, सड़क या अपनी पसंद की किसी भी विशिष्ट जगह पर कब्जा करने का अधिकार नहीं देती। अभिव्यक्ति का अधिकार विचारों की प्रस्तुति में निहित है, न कि सार्वजनिक मार्गों को अवरुद्ध करने में।”
  • अंतरराष्ट्रीय दायित्व (Vienna Convention) और संप्रभु सुरक्षा:
    • जंतर-मंतर से चाणक्यपुरी और कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित विदेशी दूतावासों की अत्यधिक निकटता है।
    • राजनयिक संबंधों पर विएना कन्वेंशन, 1961 के तहत भारत सरकार पर विदेशी मिशनों और उनके राजनयिकों को किसी भी प्रकार के व्यवधान, अशांति या खतरे से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने का अंतरराष्ट्रीय दायित्व है। 27 दिनों में 23 दंगे व सार्वजनिक शांति भंग की एफआईआर दर्ज होना यह सिद्ध करता है कि जंतर-मंतर की स्थिति इस अंतरराष्ट्रीय व संप्रभु दायित्व के विपरीत जा रही थी।
  • डिजिटल युग में प्रदर्शन का स्वरूप:
    • दिल्ली पुलिस का यह तर्क कि डिजिटल माध्यमों के दौर में भौतिक निकटता अनिवार्य नहीं रही, आधुनिक न्यायशास्त्र में प्रासंगिक है। जब विरोध का उद्देश्य मीडिया और नीति-निर्माताओं का ध्यान खींचना हो, तो रामलीला मैदान जैसे बड़े और नियंत्रित मैदानों में किया गया शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी उतना ही प्रभावी होता है, बिना आम जनता के दैनिक जीवन को पंगु बनाए।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित याचिका क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: स्वाति सिंह बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition (Civil) No. … / 2026]
  • दस्तावेज़: दिल्ली पुलिस आयुक्त / पुलिस उपायुक्त (नई दिल्ली जिला) अनुराग कुमार द्वारा दाखिल जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit)
  • हलफनामा दाखिले की तिथि: 3 नवंबर 2026

पक्षकारों का प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता: अधिवक्ता स्वाति सिंह (Advocate Swaty Singh)।
  • प्रतिवादी पक्ष: दिल्ली पुलिस / गृह मंत्रालय (MHA) — अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एवं केंद्र सरकार के विधि अधिकारी।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(1)(b) (शांतिपूर्ण सभा का अधिकार) सहपठित अनुच्छेद 19(2) व 19(3) (सार्वजनिक व्यवस्था व संप्रभुता हेतु युक्तियुक्त निर्बंधन)
    • दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 (Delhi Police Act, 1978) — धारा 28, 30 व 31 (सार्वजनिक मार्गों के विनियमन, जुलूसों व सभाओं के नियंत्रण हेतु पुलिस आयुक्त की शक्तियां)
    • राजनयिक संबंधों पर विएना कन्वेंशन, 1961 (Vienna Convention on Diplomatic Relations) — मिशन परिसरों की सुरक्षा और शुचिता का अंतरराष्ट्रीय दायित्व
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और गैर-कानूनी जमाव की रोकथाम के प्रावधान
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • सार्वजनिक स्थलों के विनियामक गैर-अधिसूचना (De-notification) का विधिक मानक: ‘संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध और सभा करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है, किंतु यह किसी विशिष्ट भौगोलिक स्थान (जैसे जंतर-मंतर) पर ही प्रदर्शन करने का कोई निरपेक्ष विधिक अधिकार प्रदान नहीं करता; जब कोई स्थल मूलतः सार्वजनिक यातायात मार्ग (सड़क) हो और उसकी भौतिक क्षमता (1,500 व्यक्ति) के मुकाबले अनियंत्रित भीड़ से सार्वजनिक व्यवस्था, आम नागरिकों के आवागमन और निकटवर्ती संवेदनशील संस्थानों (विदेशी दूतावासों व मंत्रालयों) की संप्रभु सुरक्षा को गंभीर खतरा उत्पन्न होता हो, तो कार्यपालिका द्वारा सुरक्षा समिति की सिफारिश पर उस स्थल को विरोध सूची से हटाना (De-notify करना) एक वैध प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय है; बशर्ते राज्य प्रदर्शनकारियों को अपनी आवाज उठाने हेतु अन्य उपयुक्त और सुरक्षित वैकल्पिक स्थल (यथा रामलीला मैदान) उपलब्ध कराए।’
  • वर्तमान स्थिति व आगामी प्रक्रिया: दिल्ली पुलिस के इस विस्तृत हलफनामे के बाद सर्वोच्च न्यायालय की संबंधित पीठ इस मामले की अगली सुनवाई में याचिकाकर्ता के प्रत्युत्तर (Rejoinder) और 2018 के MKSS दिशानिर्देशों के आलोक में परीक्षण करेगी कि क्या जंतर-मंतर पर पूरी रोक बरकरार रखी जाए अथवा इसके उपयोग हेतु कोई नया सीमित कोटा तंत्र निर्धारित किया जाए।

Place De-notify: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
हलफनामाकर्तादिल्ली पुलिस (पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार के माध्यम से)
याचिकाकर्ता (Petitioner)अधिवक्ता स्वाती सिंह (Advocate Swaty Singh)
मूल विषय/विवादजंतर-मंतर को विरोध स्थल (Protest Site) के रूप में वि-अधिसूचित (De-notify) किए जाने के सरकारी फैसले के खिलाफ याचिका।
संवैधानिक दलीलेंयाचिकाकर्ता: जंतर-मंतर को हटाना अनुच्छेद 19(1)(a) [अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता] और 19(1)(b) [शांतिपूर्ण सभा] का हनन है। स्थान की सुलभता और दृश्यता ही विरोध का आधार है।
दिल्ली पुलिस: किसी विशेष जगह पर प्रदर्शन का कोई मौलिक अधिकार नहीं है; जनसुरक्षा और यातायात हेतु उचित नियमन (Reasonable Restrictions) वैध है।
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