Thursday, November 5, 2026
HomeLatest NewsSlogan Row: भाजपा के विरोध प्रदर्शन में पाकिस्तान जिंदाबाद का जानबूझकर नारा...

Slogan Row: भाजपा के विरोध प्रदर्शन में पाकिस्तान जिंदाबाद का जानबूझकर नारा लगना अकल्पनीय; जबान फिसलने से मुर्दाबाद की जगह जिंदाबाद निकला

FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp

मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क

  1. 2022 का विरोध प्रदर्शन और 2 साल की देरी:यह मामला 18 दिसंबर 2022 को मांड्या (कर्नाटक) में पाकिस्तान के विदेश मंत्री द्वारा दिए गए आपत्तिजनक बयान के खिलाफ आयोजित प्रदर्शन से जुड़ा है। शिकायतकर्ता (कन्नमबाडी कुमार) ने घटना के 2 साल बाद यूट्यूब वीडियो देखकर 2024 में मांड्या वेस्ट पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई थी।
  2. बिना पूर्व मंजूरी के संज्ञान (Lack of Prosecutorial Sanction):अदालत ने प्रक्रियात्मक खामी को उजागर करते हुए नोट किया कि आईपीसी की धारा 505(1)(b) के तहत आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी अनिवार्य होती है। इस मामले में ट्रायल मजिस्ट्रेट ने बिना पूर्व मंजूरी के ही अपराध का संज्ञान ले लिया था।
  3. सामाजिक अशांति और धारा 153B का अभाव:हाईकोर्ट ने माना कि जांच एजेंसी यह साबित करने में विफल रही कि इस नारे के कारण समाज में कोई विद्वेष या सार्वजनिक अशांति फैली थी। इसके अलावा, आईपीसी की धारा 153B के आवश्यक घटक भी मामले में नहीं पाए गए।

मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष

1. आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea) का अभाव:

किसी भी बयान या नारे को अपराध की श्रेणी में लाने के लिए दुर्भावनापूर्ण इरादा (Criminal Intent) होना आवश्यक है। जब कोई नारा किसी प्रदर्शन के प्रवाह में गलती से लग जाए और उससे कोई सामाजिक अशांति न हो, तो वह अपराध नहीं बनता।

2. न्यायिक विवेक और प्रक्रियात्मक अनुपालन:

मजिस्ट्रेट द्वारा बिना पूर्व मंजूरी के धारा 505 का संज्ञान लेना कानूनी प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन है, जिसे हाईकोर्ट ने धारा 482 CrPC (अब BNSS) के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग करते हुए निरस्त कर दिया।

बेंगलुरु: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 482 (न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति व कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने हेतु उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति / Inherent Powers to Quash Criminal Proceedings—वर्तमान BNSS धारा 528), धारा 196 (लोक व्यवस्था व राज्य के विरुद्ध अपराधों में अभियोजन हेतु सक्षम सरकार की अनिवार्य पूर्व-मंजूरी / Prior Sanction), भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 153B (राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन व प्राख्यान) एवं धारा 505(1)(b) (जनता में भय या अशांति फैलाने वाले सार्वजनिक उपद्रव के कथन), तथा आपराधिक न्यायशास्त्र में ‘आपराधिक मनःस्थिति’ (Mens Rea) के अभाव और जबान फिसलने (Slip of the Tongue) के विधिक मूल्यांकन के तहत कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद (Justice V. Srishananda) की एकल पीठ ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा आयोजित एक राजनीतिक विरोध प्रदर्शन के दौरान ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा लगाने के आरोपी प्रदर्शनकारी डी.एस. रवि कुमार (DS Ravi Kumar) के विरुद्ध मांड्या की अधीनस्थ अदालत में लंबित आपराधिक मुकदमे को पूरी तरह से रद्द (Quashed) कर दिया।

अदालत ने अपने 28 अक्टूबर 2026 के निर्णय में व्यावहारिक और तार्किक दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि भाजपा जैसे राजनीतिक दल द्वारा पाकिस्तान के विदेश मंत्री के विवादित बयान के विरोध में आयोजित प्रदर्शन में किसी प्रदर्शनकारी द्वारा जानबूझकर “पाकिस्तान जिंदाबाद” का नारा लगाना अत्यंत अकल्पनीय (Highly Unimaginable) है। अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को स्वीकार किया कि नारों के प्रवाह में गलती से “मुर्दाबाद” की जगह “जिंदाबाद” शब्द निकल गया था। इसके अतिरिक्त, अदालत ने 2 वर्ष के अत्यधिक विलंब से एफआईआर दर्ज होने, समाज में कोई अशांति न फैलने और धारा 505(1)(b) में अनिवार्य सरकारी मंजूरी (Prior Sanction under Section 196 CrPC) के अभाव में संज्ञान लिए जाने को अवैध पाते हुए आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का आदेश दिया।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘भाजपा के प्रदर्शन में जानबूझकर देश-विरोधी नारा लगाना अकल्पनीय; नारों के प्रवाह में जबान फिसली’:

न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद ने घटना के संदर्भ और अभियुक्त के आचरण का मूल्यांकन करते हुए दर्ज किया: “प्रथम दृष्टया, भारतीय जनता पार्टी (एक राजनीतिक दल) द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में, यह अत्यंत अकल्पनीय (Highly unimaginable) है कि उसमें शामिल प्रदर्शनकारी जानबूझकर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा लगाएंगे। याचिकाकर्ता की इस दलील पर विचार किया जाना आवश्यक है कि नारे लगाने के प्रवाह में गलती से ‘मुर्दाबाद’ के स्थान पर ‘जिंदाबाद’ शब्द निकल गया था (In the flow of raising slogans by mistake the word ‘Zindabad’ crept in instead of ‘Murdabad’)। इस प्रकार के कृत्य में समाज में उपद्रव फैलाने या किसी वर्ग विशेष को आहत करने का कोई आपराधिक इरादा (Mens Rea) परिलक्षित नहीं होता।”

2. ‘2 साल की अत्यधिक देरी और कोई सामाजिक अशांति नहीं’:

  • अदालत ने शिकायतकर्ता के आचरण और जांच की कमजोरियों पर प्रकाश डालते हुए कहा:“शिकायतकर्ता ने यूट्यूब पर घटना का वीडियो देखकर 2 साल की लंबी अवधि बीत जाने के बाद एफआईआर दर्ज कराई। जांच एजेंसी यह स्थापित करने में पूरी तरह विफल रही है कि इस प्रदर्शन में कौन-कौन शामिल था और इस तथाकथित नारे के समाज में क्या दुष्परिणाम या प्रतिक्रियाएं हुईं, जिससे किसी समुदाय या आम जनता में अशांति फैली हो। ऐसा कोई साक्ष्य पत्रावली पर मौजूद नहीं है।”

3. ‘CrPC की धारा 196 के तहत अनिवार्य पूर्व मंजूरी के बिना संज्ञान अवैध’:

  • अदालत ने प्रक्रियात्मक अवैधता को रेखांकित किया:
    • आईपीसी की धारा 505(1)(b) के तहत किसी भी अपराध का न्यायिक संज्ञान लेने से पूर्व सक्षम प्राधिकारी (केंद्र या राज्य सरकार) की औपचारिक अभियोजन मंजूरी (Prior Sanction) अनिवार्य है।
    • संबंधित मजिस्ट्रेट ने ऐसी कोई अनिवार्य मंजूरी रिकॉर्ड पर मौजूद न होने के बावजूद आपराधिक संज्ञान ले लिया, जो सीधे तौर पर प्रक्रियात्मक शून्यता है।
    • इसके अलावा, मामले के तथ्यों से आईपीसी की धारा 153B के अनिवार्य घटक भी आकर्षित नहीं होते।

Also Read; Public Nuisance: गुरुग्राम और नोएडा स्लम में बदल रहे हैं; हरियाणा में स्टिल्ट + 4 नीति पर अलग-अलग फ्लैट्स की बिक्री रोकने की चेतावनी

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2022–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयकर्नाटक उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ बेंगलुरु (आपराधिक अंतर्निहित क्षेत्राधिकार — धारा 482 CrPC)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद (Justice V. Srishananda) (एकल पीठ)
निर्णय की तिथि28 अक्टूबर 2026
केस संदर्भडी.एस. रवि कुमार बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य [Criminal Petition No. … / 2024]
याचिकाकर्ता (अभियुक्त)डी.एस. रवि कुमार (DS Ravi Kumar) — मांड्या निवासी एवं भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ता/प्रदर्शनकारी।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ताअधिवक्ता विनोद कुमार एम. (Advocate Vinod Kumar M)।
प्रतिवादी पक्ष1. कर्नाटक राज्य (मांड्या वेस्ट पुलिस स्टेशन)
2. कण्णम्बाडी कुमार (Kannambadi Kumar) — मूल शिकायतकर्ता।
अभियोजन / राज्य के वकीलउच्च न्यायालय सरकारी अधिवक्ता वाहिदा एम.एम. (HCGP Waheeda MM)।
मूल घटना (18 दिसंबर 2022)पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो द्वारा भारत और भारतीय नेतृत्व के विरुद्ध की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों के विरोध में कर्नाटक के मांड्या में भाजपा समर्थकों द्वारा एक तीव्र विरोध प्रदर्शन और पुतला दहन का आयोजन किया गया था।
विवाद का कारणप्रदर्शन के दौरान नारों के तीव्र प्रवाह में रवि कुमार ने ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारों के बीच कथित तौर पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा उच्चारित कर दिया।
विलंबित शिकायत (वर्ष 2024)घटना के लगभग दो वर्ष बाद (2024 में), एक स्थानीय व्यक्ति कण्णम्बाडी कुमार ने एक यूट्यूब चैनल पर इस घटना का वीडियो क्लिप देखा और मांड्या वेस्ट थाने में शिकायत दर्ज कराई कि इस नारे से वह मानसिक रूप से व्यथित हुआ है और इससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ने का खतरा है। पुलिस ने आईपीसी की धारा 153B और 505(1)(b) में अपराध दर्ज कर लिया।
अभियोजन का पक्षराज्य के वकील ने तर्क दिया कि वीडियो क्लिप से स्पष्ट है कि आरोपी ने उक्त शब्द कहे थे, जिससे समाज में अशांति फैल सकती थी; अतः उसे अधीनस्थ अदालत में मुकदमे का सामना करना चाहिए।
हाईकोर्ट का निष्कर्षराजनीतिक संदर्भ में यह एक आकस्मिक मानवीय भूल थी; कोई अशांति नहीं फैली; मुकदमा चलाना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है; आपराधिक कार्यवाही रद्द (Quashed)।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea) और धारा 196 CrPC की अनिवार्यता’

  • ‘बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य’ [(1995) 3 SCC 214] का विख्यात न्यायिक मानक:
    • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया था कि किसी भीड़ या सार्वजनिक स्थान पर बिना किसी आपराधिक तैयारी के केवल कुछ नारे लगा देने मात्र से—जब तक कि उससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग न हो, दंगे न भड़कें या तात्कालिक हिंसा को बढ़ावा न मिले—आईपीसी के दंडात्मक प्रावधान आकर्षित नहीं होते।
    • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत को लागू करते हुए रेखांकित किया कि जब विरोध प्रदर्शन का मूल उद्देश्य ही पाकिस्तान के विरोध में पुतला जलाना था, तो ऐसे माहौल में किसी व्यक्ति द्वारा अनजाने में उल्टे नारे का निकल जाना किसी भी दृष्टि से देश-विरोधी षड्यंत्र का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
  • आपराधिक मनःस्थिति (Actus Non Facit Reum Nisi Mens Sit Rea):
    • आपराधिक न्यायशास्त्र का यह बुनियादी नियम है कि बिना दोषी मनःस्थिति के केवल भौतिक कृत्य किसी को अपराधी नहीं बना सकता।
    • जबान का फिसलना (Slip of the tongue / Inadvertent utterance) एक सामान्य मानवीय त्रुटि है। यदि संदर्भ देशभक्ति के प्रदर्शन और पाकिस्तान के विरोध का था, तो अभियुक्त के मन में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा लगाकर अशांति फैलाने का कोई आपराधिक आशय मौजूद नहीं था।
  • धारा 196 CrPC (वर्तमान BNSS धारा 218) का सांविधिक सुरक्षा कवच:
    • विधायिका ने राज्य के विरुद्ध अपराधों और सार्वजनिक शांति से जुड़े अपराधों (आईपीसी धारा 153A, 153B, 295A, 505 आदि) के लिए यह सख्त शर्त रखी है कि अदालतें तब तक संज्ञान नहीं लेंगी जब तक कि केंद्र या राज्य सरकार का गृह विभाग मामले की जांच कर औपचारिक मंजूरी न दे दे।
    • यह प्रावधान नागरिकों को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से बचाने के लिए बनाया गया था। कर्नाटक हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल मजिस्ट्रेट ने बिना किसी विधिक मंजूरी के संज्ञान ले लिया, जो सीधे तौर पर अधिकार-विहीन (Without Jurisdiction) था।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: कर्नाटक उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ बेंगलुरु (आपराधिक अंतर्निहित क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: डी.एस. रवि कुमार बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य [Criminal Petition No. … / 2024]
  • पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद (Justice V. Srishananda) (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: 28 अक्टूबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: आपराधिक याचिका स्वीकार; मांड्या ट्रायल कोर्ट में लंबित संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही निरस्त/रद्द (Quashed)।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (डी.एस. रवि कुमार) की ओर से: अधिवक्ता विनोद कुमार एम. (Advocate Vinod Kumar M)।
  • प्रतिवादी (कर्नाटक राज्य) की ओर से: उच्च न्यायालय सरकारी अधिवक्ता (High Court Government Pleader) वाहिदा एम.एम. (HCGP Waheeda MM)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC):
      • धारा 482 — अंतर्निहित शक्तियां (कार्रवाई रद्द करने का अधिकार)
      • धारा 196 — राज्य के विरुद्ध अपराधों और लोक शांति के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन हेतु पूर्व मंजूरी की अनिवार्यता
    • भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC):
      • धारा 153B — राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन, प्राख्यान
      • धारा 505(1)(b) — लोक उपद्रव कारित करने वाले कथन (जनता में भय या संत्रास फैलाने का आशय)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (कानूनी प्रक्रिया के अनुचित दुरुपयोग से व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • आपराधिक आशय, नारों में मानवीय त्रुटि और प्रक्रिया के दुरुपयोग का विधिक मानक: ‘किसी राजनीतिक दल द्वारा किसी विदेशी राष्ट्र के आचरण के विरोध में आयोजित प्रदर्शन के दौरान यदि नारों के प्रवाह में गलती से किसी प्रदर्शनकारी के मुख से विरोधी नारा निकल जाए, तो इसे बिना किसी आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea) के जानबूझकर किया गया अपराध नहीं माना जा सकता; संदर्भ और पृष्ठभूमि का मूल्यांकन न्यायिक संज्ञान के समय अनिवार्य है; घटना के दो वर्ष बाद केवल सोशल मीडिया वीडियो के आधार पर दर्ज की गई ऐसी शिकायतें, जिनसे समाज में कोई वास्तविक अशांति या उपद्रव उत्पन्न न हुआ हो, दुर्भावनापूर्ण हैं; आईपीसी की धारा 505(1)(b) के तहत अनिवार्य सांविधिक पूर्व-मंजूरी (धारा 196 CrPC) के बिना लिया गया संज्ञान विधि की दृष्टि में शून्य है; तथा ऐसे मामलों में आपराधिक विचारण को जारी रहने देना न्यायिक प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग (Abuse of Process of Law) है, जिसे उच्च न्यायालय अपनी असाधारण अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर रद्द करने हेतु बाध्य है।’
  • वर्तमान स्थिति व तात्कालिक परिणाम: उच्च न्यायालय के इस फैसले के साथ ही मांड्या के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) के समक्ष डी.एस. रवि कुमार के विरुद्ध लंबित आपराधिक मुकदमा पूरी तरह समाप्त हो गया है और उनके विरुद्ध लगाए गए सभी आरोप विधिक रूप से निरस्त कर दिए गए हैं।

Slogan Row: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद (Justice V Srishananda)
केस / याचिकाकर्ताडी. एस. रवि कुमार बनाम कर्नाटक राज्य (DS Ravi Kumar v. State of Karnataka)
प्रतिनिधित्वयाचिकाकर्ता: अधिवक्ता विनोद कुमार एम. | राज्य पक्ष: हाईकोर्ट सरकारी वकील वहीदा एम.एम.
दर्ज एफआईआर धाराएं (IPC)धारा 153B (राष्ट्रीय एकीकरण के प्रतिकूल लांछन/आरोप) एवं धारा 505(1)(b) (सार्वजनिक उपद्रव/Public Mischief)
घटना की तिथि व पृष्ठभूमि18 दिसंबर 2022 को पाकिस्तान के विदेश मंत्री के बयान के खिलाफ मांड्या में बीजेपी कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध प्रदर्शन।
अदालत का अंतिम आदेशआपराधिक केस रद्द: 2 साल की देरी से दर्ज शिकायत, जांच की कमी और धारा 505 हेतु अनिवार्य पूर्व मंजूरी (Prior Sanction) न होने के आधार पर केस निरस्त।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
clear sky
29.7 ° C
29.7 °
29.7 °
40 %
2.6kmh
8 %
Thu
30 °
Fri
29 °
Sat
29 °
Sun
30 °
Mon
30 °

Recent Comments