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मामले की पृष्ठभूमि और RTI कार्यवाही
- अपराधिक कानूनों में संशोधन और NCW का परामर्श:केंद्र सरकार के अनुरोध पर NCW ने भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) में महिलाओं के हितों के संरक्षण हेतु सुधार का अध्ययन किया था। NCW ने 2022 की शुरुआत में 5 क्षेत्रीय परामर्श आयोजित किए और 4 मार्च 2022 को केंद्र सरकार को एक समेकित रिपोर्ट (Consolidated Report) सौंपी थी। इन्हीं परामर्शों के बाद संसद ने IPC, CrPC और Evidence Act को बदलकर क्रमशः भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) पारित किया, जो 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुए।
- RTI में माँगी गई विशिष्ट जानकारी (Point No. 3):RTI आवेदक संजुक्ता बासु ने आयोग के 5 क्षेत्रीय परामर्शों की तिथियों, स्थलों, आयोजक संस्थानों, प्रतिभागियों की सूची तथा विचार-विमर्श की विस्तृत रिपोर्ट की प्रतियां मांगी थीं। NCW ने केवल 4 मार्च 2022 की समेकित रिपोर्ट उपलब्ध कराई थी, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रीय बैठकों (जैसे नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, ओडिशा और सिम्बायोसिस लॉ स्कूल, पुणे में हुए सत्रों) की व्यक्तिगत रिपोर्ट नहीं दी थी।
- NCW का दलील और CIC का रुख:सुनवाई के दौरान NCW ने तर्क दिया कि कुछ परामर्श ऑनलाइन आयोजित किए गए थे, इसलिए उनके भौतिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं। इस पर CIC ने स्पष्ट किया कि निरीक्षण सूचना प्राप्त करने का एक वैधानिक तरीका है। CPIO को निर्देश दिया गया कि वह निरीक्षण के दौरान आवेदक को प्रासंगिक दस्तावेजों की पहचान करने में सहायता करे और RTI नियमावली, 2012 के तहत शुल्क लेकर प्रतियां दे।
मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष
1. नीति-निर्माण में पारदर्शिता (Transparency in Lawmaking):
केंद्रीय सूचना आयोग ने माना कि नए आपराधिक कानूनों (BNS/BNSS/BSA) के निर्माण से जुड़े परामर्शों और सिफारिशों की सार्वजनिक पारदर्शिता अत्यंत महत्वपूर्ण है, और आम नागरिक को यह जानने का पूरा अधिकार है कि क्षेत्रीय स्तर पर क्या विचार-विमर्श हुए थे।
2. CPIO का वैधानिक दायित्व:
यदि कोई रिकॉर्ड NCW के पास वास्तव में मौजूद नहीं है या डिजिटल रूप से नष्ट हो गया है, तो सार्वजनिक प्राधिकरण को इसका स्पष्ट और कैटगोरिकल (Categorical) हलफनामा/स्पष्टीकरण देना होगा।
नई दिल्ली: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005) की धारा 2(j)(i) (सार्वजनिक अभिलेखों, दस्तावेजों व फाइलों के निरीक्षण का विधिक अधिकार), धारा 7(1) (विहित शुल्क पर प्रमाणित प्रतियां प्राप्त करना), आरटीआई नियमावली, 2012 (RTI Rules, 2012), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) व भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) के विधायी प्रारूपण के पूर्व आयोजित विधिक परामर्शों की पारदर्शिता, तथा राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 (NCW Act, 1990) के तहत महिलाओं के अधिकारों की विधिक समीक्षा के सार्वजनिक प्रकटीकरण पर केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission – CIC) ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।
केंद्रीय सूचना आयोग के सूचना आयुक्त (Information Commissioner) पी.आर. रमेश (Information Commissioner P R Ramesh) ने राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women – NCW) के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (CPIO) को कड़ा निर्देश दिया है कि वह आरटीआई अपीलकर्ता को वर्ष 2022 में आपराधिक कानूनों की समीक्षा हेतु आयोजित पांचों क्षेत्रीय परामर्श बैठकों (Five Regional Consultations) से जुड़े सभी प्रासंगिक भौतिक (Physical) व इलेक्ट्रॉनिक (Electronic) अभिलेखों का निरीक्षण करने की अनुमति आदेश प्राप्ति के दो सप्ताह के भीतर सुनिश्चित करे।
सूचना आयोग ने रेखांकित किया कि यद्यपि एनसीडब्ल्यू ने केंद्र सरकार को भेजी गई अपनी 4 मार्च 2022 की समेकित रिपोर्ट (Consolidated Report) प्रदान कर दी थी, किंतु व्यक्तिगत क्षेत्रीय बैठकों के आयोजकों, प्रतिभागियों, कार्यवृत्त (Minutes) और विशिष्ट चर्चाओं से जुड़े बिंदु संख्या 3 का समुचित और विशिष्ट उत्तर नहीं दिया गया। आयोग ने व्यवस्था दी कि आरटीआई कानून की धारा 2(j) के तहत अभिलेखों का प्रत्यक्ष निरीक्षण सूचना प्राप्त करने का एक वैधानिक व सुस्थापित तरीका है।
केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं निर्देश
1. ‘धारा 2(j) के तहत फाइलों का निरीक्षण सूचना का वैध अधिकार; दो सप्ताह में अवसर दें’:
सूचना आयुक्त पी.आर. रमेश ने अभिलेखों के निरीक्षण के विधिक अधिकार को रेखांकित करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: “अपीलकर्ता द्वारा बिंदु संख्या 3 के तहत व्यक्तिगत क्षेत्रीय परामर्शों (Individual Regional Consultations) के संबंध में मांगी गई विशिष्ट जानकारी का लोक सूचना अधिकारी द्वारा विशिष्ट और पर्याप्त रूप से समाधान नहीं किया गया है (Has not been specifically addressed)। आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 2(j) दस्तावेजों और अभिलेखों के निरीक्षण (Right to inspect documents and records) तथा उनकी प्रमाणित प्रतियां प्राप्त करने के अधिकार को समाहित करती है। अभिलेखों का निरीक्षण सूचना तक पहुंच का एक मान्यता प्राप्त माध्यम है। अतः, सीपीआईओ, राष्ट्रीय महिला आयोग को निर्देशित किया जाता है कि वह आदेश प्राप्त होने के दो सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता को सभी प्रासंगिक भौतिक फाइलों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स का निरीक्षण (Inspection) करने का विधिवत अवसर प्रदान करे।”
2. ‘सघन तलाशी लें, निरीक्षण में सहायता करें और अनुपलब्ध होने पर लिखित बताएं’:
- आयोग ने एनसीडब्ल्यू को केवल औपचारिकता न निभाने की हिदायत देते हुए स्पष्ट निर्देश जारी किए:
- आयोग ने कहा कि एनसीडब्ल्यू से यह अपेक्षा की जाती है कि वह क्षेत्रीय परामर्शों से संबंधित अपनी सभी भौतिक फाइलों और डिजिटल रिकॉर्ड्स की एक सघन व कर्तव्यनिष्ठ तलाशी (Diligent Search) करे।
- सीपीआईओ को निर्देश दिया गया कि वह निरीक्षण के दौरान अपीलकर्ता को प्रासंगिक दस्तावेजों की पहचान करने में सक्रिय सहायता प्रदान करे।
- आरटीआई नियम, 2012 के तहत निर्धारित विहित शुल्क के भुगतान पर अपीलकर्ता द्वारा चिह्नित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां (Certified Copies) उपलब्ध कराई जाएं।
- यदि रिकॉर्ड्स के सत्यापन के बाद कोई सूचना वास्तव में उपलब्ध नहीं है या प्राधिकरण द्वारा संधारित (Maintained) नहीं की गई है, तो इस तथ्य की स्पष्ट व स्पष्टवादी लिखित सूचना (Communicate Categorically) अपीलकर्ता को दी जाए।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2022–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
|---|---|
| फोरम / आयोग | केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission – CIC), नई दिल्ली |
| पीठासीन सूचना आयुक्त | सूचना आयुक्त पी.आर. रमेश (Information Commissioner P R Ramesh) |
| आदेश की तिथि | 3 नवंबर 2026 |
| अपीलकर्ता / आरटीआई आवेदक | संयुक्ता बसु (Sanjukta Basu) — सामाजिक-विधिक शोधकर्ता एवं पत्रकार। |
| प्रतिवादी लोक प्राधिकरण | केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (CPIO), राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW), नई दिल्ली। |
| मूल विधिक कवायद (2022) | केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय) के अनुरोध पर राष्ट्रीय महिला आयोग ने वर्ष 2022 के आरंभ में ‘आपराधिक कानून समीक्षा: महिलाओं की स्थिति में सुधार’ (Review of Criminal Law: Improvement in Status of Women) शीर्षक से देश भर में पांच क्षेत्रीय विधिक परामर्श आयोजित किए थे। इसका उद्देश्य तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम में महिलाओं के अधिकारों के अनुकूल संशोधन सुझाना था। |
| समेकित रिपोर्ट (4 मार्च 2022) | एनसीडब्ल्यू ने 4 मार्च 2022 को अपनी सिफारिशों वाली एक समेकित रिपोर्ट केंद्र सरकार को प्रस्तुत की। इन्हीं सिफारिशों और गृह मामलों की स्थायी समिति की समीक्षा के उपरांत 1 जुलाई 2024 से तीन नए कानून—भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA)—लागू किए गए। |
| आरटीआई आवेदन में मांगी गई विशिष्ट जानकारी | अपीलकर्ता संयुक्ता बसु ने बिंदु संख्या 3 के तहत सभी पांचों क्षेत्रीय परामर्शों का विशिष्ट विवरण मांगा था: 1. प्रत्येक क्षेत्रीय परामर्श की सटीक तिथियां और आयोजन स्थल। 2. परामर्श आयोजित करने वाले शैक्षणिक संस्थान / सहयोगी संगठन। 3. भाग लेने वाले विषय विशेषज्ञों, वकीलों और प्रतिभागियों की सूची। 4. व्यक्तिगत परामर्शों की विस्तृत चर्चाओं, कार्यवृत्तों और डेलिबरेशन रिपोर्ट्स की प्रमाणित प्रतियां। |
| एनसीडब्ल्यू का पूर्व रुख व कमियां | एनसीडब्ल्यू ने अपीलकर्ता को केवल 4 मार्च 2022 का केंद्र सरकार को भेजा गया पत्र और समेकित रिपोर्ट सौंप दी थी, किंतु अलग-अलग परामर्शों की कार्यवाही उपलब्ध नहीं कराई। सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता ने साक्ष्य दिया कि NLU ओडिशा में हुए परामर्श की रिपोर्ट उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध है, तथा सिम्बायोसिस लॉ स्कूल, पुणे ने भी विस्तृत रिपोर्ट एनसीडब्ल्यू को भेजने की पुष्टि की थी। इसके विपरीत एनसीडब्ल्यू का कहना था कि कुछ परामर्श ऑनलाइन हुए थे, अतः उनकी भौतिक फाइलों का संधारण नहीं हुआ। |
| सीआईसी का अंतिम फैसला | द्वितीय अपील स्वीकार; एनसीडब्ल्यू को आदेश की प्राप्ति से दो सप्ताह के भीतर समस्त प्रासंगिक भौतिक व इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों का प्रत्यक्ष निरीक्षण (Inspection) कराने और शुल्क पर प्रतियां देने का आदेश। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘कानून निर्माण में जन-परामर्श, धारा 2(j) और प्री-लेजिस्लेटिव ट्रांसपेरेंसी’
- आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 2(j) का विधिक अधिदेश:
- धारा 2(j) “सूचना के अधिकार” को केवल कागजात मांगने तक सीमित नहीं रखती। इसके खंड (i) के अनुसार नागरिक को किसी भी लोक प्राधिकरण के “कार्य, दस्तावेजों और अभिलेखों का निरीक्षण करने” (Inspection of work, documents, records) की पूर्ण विधिक शक्ति है।
- जब कोई लोक प्राधिकरण यह दावा करता है कि जानकारी बिखरी हुई है या उसका संकलन कठिन है, तो निरीक्षण का विकल्प नागरिक को यह सुविधा देता है कि वह स्वयं पत्रावली देखकर आवश्यक अंशों की पहचान कर सके। इससे लोक सूचना अधिकारी पर फाइलों को छांटने का प्रशासनिक बोझ भी नहीं पड़ता।
- प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन और महिलाओं के अधिकार:
- आपराधिक न्यायप्रणाली का सुधार—विशेष रूप से बलात्कार, वैवाहिक दुष्कर्म, लैंगिक हिंसा, और कार्यस्थल पर उत्पीड़न जैसे गंभीर मुद्दों पर—देश की आधी आबादी के मौलिक अधिकारों से जुड़ा है।
- केंद्र सरकार की प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पॉलिसी (2014) यह अपेक्षा करती है कि संसद में कोई भी विधेयक पेश करने से पूर्व किए गए व्यापक परामर्शों के निष्कर्ष और हितधारकों की टिप्पणियां सार्वजनिक डोमेन में रखी जाएं। जब नए आपराधिक कानून (BNS/BNSS/BSA) लागू हो चुके हैं, तो नागरिकों को यह जानने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है कि महिला आयोग ने किन-किन कानूनी विशेषज्ञों और लॉ स्कूलों की राय के आधार पर सरकार को अपनी सिफारिशें दी थीं।
- ‘ऑनलाइन बैठकों का रिकॉर्ड न होना’ प्रशासनिक लापरवाही:
- सूचना आयोग ने एनसीडब्ल्यू के इस तर्क को खारिज किया कि बैठकें ऑनलाइन थीं इसलिए भौतिक रिकॉर्ड नहीं हैं।
- सूचना प्रौद्योगिकी कानून और आरटीआई की धारा 2(i) के तहत इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख, ईमेल, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के मिनट्स और डिजिटल ड्राफ्ट्स भी “अभिलेख” (Record) की कानूनी परिभाषा में आते हैं। लोक प्राधिकरण डिजिटल माध्यमों का बहाना बनाकर अपनी सांविधिक जवाबदेही से बच नहीं सकते।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- फोरम / अपीलीय अधिकरण: केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission – CIC), बाबा गंगनाथ मार्ग, मुनिरका, नई दिल्ली
- पीठासीन सूचना आयुक्त: पी.आर. रमेश (Information Commissioner P R Ramesh)
- निर्णय की तिथि: 3 नवंबर 2026
- अनुपालन की समय-सीमा: आदेश प्राप्ति के दो सप्ताह के भीतर
- कार्यवाही का स्वरूप: सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 19(3) के तहत द्वितीय अपील का निस्तारण; भौतिक एवं डिजिटल अभिलेखों के निरीक्षण का आदेश।
पक्षकारों का विवरण:
- अपीलकर्ता: संयुक्ता बसु (Sanjukta Basu)।
- प्रतिवादी: केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (CPIO), राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW), नई दिल्ली।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005):
- धारा 2(f) — “सूचना” की परिभाषा (इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में संधारित डेटा सहित)
- धारा 2(i) — “अभिलेख” (Record) की परिभाषा (दस्तावेज़, फाइल, माइक्रोफिल्म व कंप्यूटर जनित सामग्री)
- धारा 2(j)(i) — दस्तावेजों और अभिलेखों के निरीक्षण का अधिकार
- धारा 7(1) — सूचना उपलब्ध कराने और विहित शुल्क की प्रक्रिया
- धारा 19(3) — केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील
- आरटीआई नियमावली, 2012 (Right to Information Rules, 2012) — निरीक्षण एवं प्रतिलिपि शुल्क के नियम
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS), एवं भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA)
- राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 (NCW Act, 1990) — धारा 10 (महिलाओं को प्रभावित करने वाले कानूनों की समीक्षा के वैधानिक कार्य)
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005):
- संबद्ध न्यायिक एवं प्रशासनिक सिद्धांत:
- पूर्व-विधायी परामर्शों की पारदर्शिता और अभिलेख निरीक्षण का विधिक मानक: ‘आपराधिक कानूनों में सुधार और महिलाओं के विधिक अधिकारों के संरक्षण हेतु आयोजित किए जाने वाले क्षेत्रीय परामर्श कोई गोपनीय आंतरिक संवाद नहीं हैं, बल्कि वे व्यापक सार्वजनिक हित से जुड़े नीतिगत दस्तावेज हैं; आरटीआई अधिनियम की धारा 2(j) के तहत अपीलकर्ता को ऐसे विधिक परामर्शों की भौतिक व इलेक्ट्रॉनिक पत्रावलियों के प्रत्यक्ष निरीक्षण का निरपेक्ष विधिक अधिकार है; लोक प्राधिकरण केवल यह कहकर सूचना देने से पल्ला नहीं झाड़ सकते कि बैठकें ऑनलाइन थीं अथवा व्यक्तिगत क्षेत्रीय रिपोर्ट संधारित नहीं हैं; सीपीआईओ का यह सांविधिक दायित्व है कि वह डिजिटल व भौतिक अभिलेखों की गहन तलाशी (Diligent Search) कराए, निरीक्षण में सहयोग करे, और विहित शुल्क पर प्रमाणित प्रतियां प्रदान करे; तथा यदि कोई दस्तावेज वास्तव में नष्ट या अनिर्मित है तो उसका स्पष्ट लिखित प्रकटीकरण करे।’
- वर्तमान स्थिति व भावी अनुपालन: केंद्रीय सूचना आयोग के इस आदेश के पश्चात राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के सीपीआईओ को आगामी 14 दिनों के भीतर अपीलकर्ता संयुक्ता बसु को आयोग के नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में आमंत्रित कर वर्ष 2022 के सभी पांच क्षेत्रीय परामर्शों (जिनमें NLU ओडिशा, सिम्बायोसिस लॉ स्कूल पुणे आदि शामिल हैं) के मिनट्स, एजेंडा, प्रतिभागी सूचियों और पत्राचारों की फाइलों को निरीक्षण हेतु प्रस्तुत करना होगा।
NCW Case: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित निकाय/अदालत | केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission – CIC), नई दिल्ली |
| सूचना आयुक्त | पी. आर. रमेश (Information Commissioner P R Ramesh) |
| सार्वजनिक प्राधिकरण | राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women – NCW) |
| RTI आवेदक | संजुक्ता बासु (Sanjukta Basu) |
| मूल विषय/परियोजना | ‘Review of Criminal Law Improvement in Status of Women’ के तहत NCW द्वारा 2022 में आयोजित 5 क्षेत्रीय परामर्शों के विस्तृत रिकॉर्ड। |
| ऐतिहासिक संदर्भ | NCW की सिफारिशों के आधार पर IPC, CrPC और Evidence Act को बदलकर BNS, BNSS और BSA लागू किए गए (जो 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुए)। |
| CIC का अंतिम निर्देश | NCW CPIO को आदेश कि वह 2 सप्ताह के भीतर आवेदक को सभी भौतिक व इलेक्ट्रॉनिक फाइलों का निरीक्षण कराए तथा निर्धारित शुल्क पर प्रमाणित प्रतियां प्रदान करे। |

