Wednesday, November 4, 2026
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Jail Manuals: जेलों में जातिगत भेदभाव और बोर्ड ऑफ विजिटर्स पर 23 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों का केंद्र को जवाब न देना अत्यंत दुखद; सख्त चेतावनी

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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी बिंदु

  1. अक्टूबर 2024 का ऐतिहासिक फैसला और अनुपालन:अक्टूबर 2024 में शीर्ष अदालत ने 10 राज्यों की जेल नियमावलियों (Jail Manuals) के उन प्रावधानों को रद्द कर दिया था जो जाति के आधार पर बंदियों के काम के विभाजन (जैसे सफाई/खाना पकाना), बैरकों के आवंटन और विमुक्त जनजातियों (De-notified Tribes) व आदततन अपराधियों के प्रति पूर्वाग्रह को बढ़ावा देते थे। अदालत ने इन प्रावधानों को अनुच्छेद 14, 15, 17, 21 और 23 का स्पष्ट उल्लंघन माना था।
  2. जिला-स्तरीय बोर्ड ऑफ विजिटर्स (Board of Visitors) का गठन:सुप्रीम कोर्ट ने 30 जुलाई 2026 के अपने आदेश में सभी राज्यों को निर्देशित किया था कि वे ‘मॉडल प्रिजन मैनुअल 2016’ के तहत प्रत्येक जिले में प्रधान जिला जज (Principal District Judge) की अध्यक्षता में चार सप्ताह के भीतर Board of Visitors का गठन सुनिश्चित करें।
  3. 23 राज्यों का असहयोग और एमिकस क्यूरी की दलील:अदालत में पेश की गई केंद्र सरकार की नई स्टेटस रिपोर्ट से उजागर हुआ कि गृह मंत्रालय द्वारा बार-बार पत्र लिखे जाने के बावजूद 23 राज्यों और UTs ने मांगी गई जानकारी का कोई जवाब नहीं दिया है। न्यायमित्र (Amicus Curiae) डॉ. एस. मुरलीधर ने कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया कि राज्यों पर इन सुधारों और बोर्ड गठन पर रिपोर्ट हलफनामे के माध्यम से दाखिल करने की वैधानिक जिम्मेदारी है।

मुख्य विधिक बिंदु

1. समेकित रिपोर्ट (Composite Report) की तैयारी:

सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को अंतिम अवसर देते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्यों से जानकारी जुटाकर एक विस्तृत और समेकित रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे।

2. सुनवाई की अगली तारीख:

अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 13 जनवरी 2027 तय की है, जहाँ राज्यों के अनुपालन की समीक्षा की जाएगी।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 17, 21 व अनुच्छेद 23 (समानता का अधिकार, जातिगत भेदभाव का प्रतिषेध, अस्पृश्यता उन्मूलन, मानवीय गरिमा और जबरन श्रम/बेगार पर रोक), मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 (Model Prison Manual, 2016) के तहत जिला-स्तरीय ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ (Board of Visitors) का अनिवार्य गठन, मध्य प्रदेश पुलिस विनियम, 1937 जैसे अप्रचलित व औपनिवेशिक नियमों की समीक्षा, तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुकांत पात्रा बनाम भारत संघ व अन्य [2024 INSC 754] में दिए गए ऐतिहासिक फैसले के अनुपालन की विधिक निगरानी पर शीर्ष अदालत ने राज्यों की घोर प्रशासनिक शिथिलता पर तीखा रोष व्यक्त किया है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला (Justice J B Pardiwala) और न्यायमूर्ति मनमोहन (Justice Manmohan) की खंडपीठ ने जेलों में जातिगत भेदभाव से संबंधित स्वतः संज्ञान मामले (In Re: Discrimination inside prisons in India) की सुनवाई करते हुए 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के रवैये को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और “बेहद दुखद” (Very Sad) करार दिया।

पीठ ने रेखांकित किया कि अक्टूबर 2024 में जेल मैनुअलों में जातिगत श्रम विभाजन, बैरकों के पृथक्करण और विमुक्त जनजातियों (DNT) के खिलाफ भेदभाव को ‘असंवैधानिक’ घोषित किए जाने के बावजूद, देश के 23 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अभी भी केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा मांगी गई जानकारी का कोई जवाब नहीं दे रहे हैं। अदालत ने सभी डिफ़ॉल्ट राज्यों को अंतिम अवसर (One Last Opportunity) प्रदान करते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि अगली सुनवाई तक केंद्र को पूर्ण जानकारी और अनुपालन हलफनामा नहीं भेजा गया, तो अदालत संबंधित राज्यों और यूटी के मुख्य सचिवों (Chief Secretaries) और प्रमुख गृह सचिवों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का आदेश जारी करेगी।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ’23 राज्यों/UTs का केंद्र के पत्रों का जवाब न देना बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण’:

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की नई स्टेटस रिपोर्ट का अवलोकन करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: “यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और बेहद दुखद (Very sad) है कि 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने भारत संघ के गृह मंत्रालय द्वारा मांगी गई जानकारी का अब तक कोई उत्तर नहीं दिया है। गृह मंत्रालय ने सभी संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अतिरिक्त मुख्य सचिवों/प्रमुख सचिवों (गृह), गृह सचिवों और पुलिस महानिदेशकों (DGP)/पुलिस प्रमुखों को औपचारिक पत्र लिखे थे। रिपोर्ट में रेखांकित किए गए इन राज्यों का केंद्रीय गृह मंत्रालय के पत्रों की अनदेखी करना न्यायिक आदेशों के प्रति घोर उदासीनता को दर्शाता है।”

2. ‘अंतिम अवसर; जवाब नहीं आया तो मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में खड़ा करेंगे’:

  • पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता एवं न्यायमित्र (Amicus Curiae) डॉ. एस. मुरलीधर (Senior Advocate S Muralidhar) की दलीलों का संज्ञान लेते हुए राज्यों को कड़ा अल्टीमेटम दिया:“राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का यह अनिवार्य विधिक दायित्व है कि वे उचित हलफनामों या रिपोर्टों के माध्यम से यह स्पष्ट करें कि जिला-स्तरीय बोर्ड ऑफ विजिटर्स (Board of Visitors) के गठन और पुलिस नियमों की समीक्षा के संबंध में अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।हम आज स्पष्ट रूप से यह चेतावनी देते हैं कि यदि अगली सुनवाई तक राज्यों ने अपना जवाब नहीं भेजा, तो हम संबंधित राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों और प्रमुख सचिवों (गृह) को व्यक्तिगत रूप से इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहने के लिए विवश होंगे (Compelled to direct Chief Secretaries to personally remain present)।”

3. कंपोजिट स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने हेतु एक मौका:

  • शीर्ष अदालत ने सभी गैर-अनुपालनकारी राज्यों को तत्काल गृह मंत्रालय के सवालों का पूरा ब्योरा भेजने का निर्देश दिया, ताकि केंद्र सरकार अगली सुनवाई से पूर्व पूरे देश का एक समग्र संकलन (Composite Report) अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर सके।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2024–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित निगरानी क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32/142)
पीठन्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला (Justice J B Pardiwala) एवं न्यायमूर्ति मनमोहन (Justice Manmohan)
आदेश की तिथि3 नवंबर 2026 (अगली सुनवाई 13 जनवरी 2027 को नियत)
केस संदर्भस्वतः संज्ञान रिट याचिका (आपराधिक) — इन री: डिस्क्रिमिनेशन इनसाइड प्रिजन्स इन इंडिया [Suo Motu Writ Petition (Crl.) No. … / 2024-2026]
न्यायमित्र (Amicus Curiae)वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व मुख्य न्यायाधीश डॉ. एस. मुरलीधर (Senior Advocate S Muralidhar)।
केंद्र सरकार का पक्षकेंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल / विधि अधिकारी।
अक्टूबर 2024 का ऐतिहासिक फैसलातत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने 10 राज्यों (यथा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि) के जेल मैनुअलों के जातिगत प्रावधानों को निरस्त कर दिया था, जहाँ उच्च जातियों को रसोई का काम और तथाकथित निचली जातियों (दलितों) को मैला उठाने व झाड़ू-सफाई का काम सौंपा जाता था। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 15 व 17 का घोर उल्लंघन माना था।
30 जुलाई 2026 का अदालती निर्देशसर्वोच्च न्यायालय ने मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 के तहत चार सप्ताह के भीतर प्रत्येक जिले में प्रधान जिला न्यायाधीश (Principal District Judge) की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ (Board of Visitors) गठित करने का स्पष्ट आदेश दिया था, ताकि जेलों का औचक निरीक्षण कर जातिगत भेदभाव पर रोक लगाई जा सके।
10 सितंबर 2026 का अनुवर्ती निर्देशशीर्ष अदालत ने राज्यों को आदेश दिया था कि वे मध्य प्रदेश पुलिस विनियम, 1937 जैसे भेदभावपूर्ण औपनिवेशिक नियमों की पहचान करें, जो विमुक्त जनजातियों (De-notified Tribes – DNT) और ‘आदतन अपराधियों’ के नाम पर विशिष्ट जातियों की अवैध निगरानी और प्रोफाइलिंग को बढ़ावा देते हैं।
3 नवंबर 2026 की वस्तुस्थितिकेंद्र की नई स्टेटस रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि बार-बार पत्राचार के बावजूद 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने गृह मंत्रालय को कोई सूचना नहीं भेजी है।
अदालत का अंतिम आदेशसभी 23 डिफॉल्टर राज्यों को अंतिम अवसर; गृह मंत्रालय को कंपोजिट रिपोर्ट पेश करने का निर्देश; विफलता की स्थिति में मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत रूप से तलब करने की स्पष्ट चेतावनी।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘कैदी अधिकार, संस्थागत अस्पृश्यता और बोर्ड ऑफ विजिटर्स’

  • ‘सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन’ और अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत):
    • सर्वोच्च न्यायालय ने दशकों पूर्व स्थापित किया था कि जेल के द्वार पर प्रवेश करते ही किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते।
    • जेल मैनुअलों में जातियों के आधार पर काम का बंटवारा (जैसे ब्राह्मण/सवर्ण कैदी खाना बनाएंगे और दलित कैदी नालियां व शौचालय साफ करेंगे) संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) और अनुच्छेद 23 (जबरन श्रम व बेगार का प्रतिषेध) का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। राज्यों की निष्क्रियता यह दर्शाती है कि ऐतिहासिक फैसले के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर सामंती और जातिगत जड़ता बरकरार है।
  • ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ की विधिक अनिवार्यता:
    • जेलें बंद और अपारदर्शी संस्थान होती हैं, जहाँ बंदियों की आवाज बाहर नहीं आ पाती।
    • मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 के तहत प्रधान जिला न्यायाधीश (PDJ), जिला मजिस्ट्रेट (DM), पुलिस अधीक्षक (SP) और गैर-सरकारी सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक संयुक्त ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ गठित किया जाना अनिवार्य है। यह बोर्ड नियमित रूप से जेलों का औचक मुआयना करता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि जेलों में किसी भी कैदी को उसकी जाति के आधार पर अलग बैरक में न रखा जाए या अपमानजनक कार्य न सौंपा जाए। 23 राज्यों द्वारा इसका गठन न करना विधिक आदेशों की अवहेलना है।
  • विमुक्त जनजातियों (DNT) का आपराधिक कलंकीकरण:
    • मध्य प्रदेश पुलिस विनियम, 1937 जैसे कई राज्य पुलिस नियम आज भी 1871 के औपनिवेशिक ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ (Criminal Tribes Act) की मानसिकता को ढो रहे हैं।
    • इन नियमों के तहत कतिपय जातियों के लोगों को थाने में हाजिरी लगाने और संदिग्ध मानने के प्रावधान हैं। सर्वोच्च न्यायालय इन सभी नियमों को समाप्त कराने के लिए राज्यों से जानकारी मांग रहा है, किंतु प्रशासनिक स्तर पर जवाब न देना कानून के शासन के प्रति उपेक्षा को दर्शाता है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित निगरानी क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: स्वतः संज्ञान रिट याचिका (आपराधिक) — इन री: डिस्क्रिमिनेशन इनसाइड प्रिजन्स इन इंडिया [Suo Motu Writ Petition (Crl.) No. 2 of 2024 / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला (Justice J B Pardiwala) एवं न्यायमूर्ति मनमोहन (Justice Manmohan)
  • आदेश की तिथि: 3 नवंबर 2026
  • अगली सुनवाई की तिथि: 13 जनवरी 2027

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • न्यायमित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर (Senior Advocate S Muralidhar)।
  • भारत संघ (केंद्रीय गृह मंत्रालय – MHA) की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एवं विधि अधिकारी।
  • संबंधित राज्यों की ओर से: राज्यों के स्थायी वकील (Standing Counsel)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (जातिगत भेदभाव का प्रतिषेध), अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत), अनुच्छेद 21 (मानवीय गरिमा) एवं अनुच्छेद 23 (बेगार व जबरन श्रम पर रोक)
    • मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 (Model Prison Manual, 2016) — अध्याय 27 व 28 (बोर्ड ऑफ विजिटर्स के कर्तव्य व निरीक्षण तंत्र)
    • प्रिजन्स एक्ट, 1894 (Prisons Act, 1894) / मॉडल प्रिजन्स एंड करेक्शनल सर्विसेज एक्ट, 2023
    • मध्य प्रदेश पुलिस विनियम, 1937 एवं अन्य राज्यों के समरूप नियम (विमुक्त व घुमंतू जातियों की निगरानी)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • जेलों में मानवाधिकार और संस्थागत सुधारों का विधिक मानक: ‘सलाखों के पीछे किसी भी नागरिक के साथ उसकी जाति, जनजाति या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता; जेल मैनुअलों में जातिगत श्रम विभाजन और विमुक्त जनजातियों की प्रोफाइलिंग संविधान के मूल ढांचे और अनुच्छेद 14, 15, 17 व 21 के सीधे विपरीत है; जिला स्तर पर प्रधान जिला न्यायाधीश की अध्यक्षता में ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ का गठन एक अनिवार्य वैधानिक सुरक्षा कवच है; केंद्रीय गृह मंत्रालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मांगी गई अनुपालन जानकारी का 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा उत्तर न देना प्रशासनिक अराजकता का परिचायक है; तथा न्यायिक आदेशों के समयबद्ध क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने हेतु संवैधानिक अदालतें मुख्य सचिवों और पुलिस प्रमुखों की व्यक्तिगत उपस्थिति सुनिश्चित करने की पूर्ण संप्रभु शक्ति रखती हैं।’
  • वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: 23 डिफ़ॉल्ट राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों को गृह मंत्रालय द्वारा अदालत के इस आदेश की प्रति तत्काल तामील कराई जा रही है; राज्यों को 13 जनवरी 2027 से पूर्व बोर्ड ऑफ विजिटर्स के गठन और पुलिस नियमों की समीक्षा पर बिंदुवार हलफनामा प्रस्तुत करना होगा, अन्यथा मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत रूप से शीर्ष अदालत में हाजिर होकर जवाबदेह होना पड़ेगा।

Jail Manuals:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति मनमोहन
मामला/साइटेशनइन री: भारत की जेलों में भेदभाव (In Re: Discrimination inside prisons in India)
न्यायालय मित्र (Amicus Curiae)वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर (Dr. S. Muralidhar)
ऐतिहासिक पृष्ठभूमिअक्टूबर 2024 का ऐतिहासिक फैसला: SC ने जेल नियमावलियों में मैनुअल स्केवेंजिंग, बैरकों के जातिगत पृथक्करण और विमुक्त जनजातियों के प्रति भेदभाव संबंधी 10 राज्यों के नियमों को “असंवैधानिक” घोषित कर दिया था।
मूल विवाद30 जुलाई और 10 सितंबर 2026 के अदालती आदेशों के तहत जिला-स्तरीय ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ (Board of Visitors) के गठन और पुलिस विनियमों में सुधार पर 23 राज्यों/UTs द्वारा केंद्र को रिपोर्ट न भेजना।
अदालत का अल्टीमेटमराज्यों को जवाब देने का अंतिम अवसर; अनुपालन न होने पर 13 जनवरी 2027 को मुख्य सचिवों की व्यक्तिगत पेशी की चेतावनी।
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