Sunday, September 20, 2026
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UP religious Case: उप्र की अवैध धर्मांतरण निषेध कानून…कानून की कुछ धाराओं को दी गई सुप्रीम चुनौती

UP religious Case: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के 2024 में संशोधित अवैध धर्मांतरण निषेध कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी है।

जनहित याचिका पर पीठ के सामने सुनवाई

मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ के सामने यह जनहित याचिका लखनऊ की रूपरेखा वर्मा और अन्य लोगों ने दायर की है। याचिका में कहा गया है कि इस कानून की कई धाराएं अस्पष्ट और बहुत व्यापक हैं, जिससे बोलने की आज़ादी और धार्मिक प्रचार के अधिकार पर असर पड़ता है। पीठ ने वरिष्ठ वकील एस मुरलीधर की दलीलों को सुना। कहा, कानून की कुछ धाराएं स्पष्ट नहीं हैं और इससे मनमानी कार्रवाई की आशंका बढ़ जाती है। हालांकि, कोर्ट ने अभी नोटिस जारी नहीं किया है और कहा है कि इस याचिका को 13 मई को अन्य लंबित मामलों के साथ सुना जाएगा।

कानून के कई प्रावधानों पर सवाल

याचिका में कहा गया है कि कानून की धारा 2 और 3 अस्पष्ट हैं और इनमें यह स्पष्ट नहीं है कि अपराध की परिभाषा क्या है। इससे कानून के दुरुपयोग की आशंका है और निर्दोष लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। याचिका में यह भी कहा गया है कि दंडात्मक कानूनों को स्पष्ट और सीमित दायरे में होना चाहिए, ताकि प्रशासनिक अधिकारियों को मनमानी करने का मौका न मिले।

शिकायत दर्ज कराने वालों का दायरा बढ़ाया गया

2024 के संशोधन में शिकायत दर्ज कराने के लिए अधिक लोगों को अधिकृत किया गया है, लेकिन इसके साथ कोई प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा नहीं जोड़ी गई है। याचिका में कहा गया है कि यह कानून हर धर्मांतरण को संदेह की नजर से देखता है और वयस्कों की व्यक्तिगत पसंद को राज्य की मंजूरी से जोड़ता है।

सज़ा का अनुपात असंगत, महिलाओं को लेकर पूर्वाग्रह

याचिका में कहा गया है कि कानून में सज़ा का अनुपात जरूरत से ज्यादा है और यह मान लिया गया है कि सभी महिलाएं धर्मांतरण के मामलों में कमजोर होती हैं। इससे महिलाओं की स्वायत्तता पर असर पड़ता है और यह संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

उल्टा प्रमाण भार, निर्दोष को सज़ा का खतरा

कानून में आरोपी पर ही यह साबित करने की जिम्मेदारी डाल दी गई है कि उसने कोई गलत काम नहीं किया। यह आपराधिक कानून की प्रक्रिया के खिलाफ है और इससे निर्दोष लोगों को सज़ा मिलने का खतरा बढ़ जाता है। देश के कई राज्यों के धर्मांतरण कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट में पहले से कई याचिकाएं लंबित हैं। अब इस याचिका को भी उन्हीं के साथ सुना जाएगा।

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