केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | पटना उच्च न्यायालय का निर्णय (2026) |
| मामले का नाम | नजमा खातून बनाम बिहार राज्य एवं अन्य (Najma Khatoon v. State of Bihar) |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस पूर्णेंदु सिंह (Justice Purnendu Singh) |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत दूसरी/जीवित पत्नी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन की हकदार है? |
| अदालत का फैसला | हां। बहुविवाह पर रोक का कानून न होने और 2011 की राज्य नीति के तहत जीवित मुस्लिम विधवाएं पेंशन की हकदार हैं। |
| संबंधित नियम/नीति | बिहार सरकार वित्त विभाग संकल्प (27 जून 2011); बिहार सरकारी सेवक आचार नियम, 1976 (नियम 23) |
Polygamy In Muslim: पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी है कि मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह (Polygamy) को प्रतिबंधित करने वाला कोई कानून न होने की स्थिति में, मृतक सरकारी कर्मचारी की मुस्लिम विधवाएं (Multiple Widows) पारिवारिक पेंशन (Family Pension) पाने की हकदार हैं, बशर्ते उनकी शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ (Mohammedan Personal Law) के तहत वैध हो।
यह आदेश जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने नजमा खातून (Najma Khatoon) द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बिहार सरकार के वित्त विभाग का 27 जून 2011 का स्पष्टीकरण (Resolution), जो मुस्लिम कर्मचारियों की जीवित विधवाओं को पेंशन का लाभ देता है, आज भी प्रभावी है और सरकारी प्राधिकारी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते।
मामला क्या था? (Case Background)
- याचिकाकर्ता की मांग: याचिकाकर्ता नजमा खातून के पति बिहार सरकार के कर्मचारी थे, जिनका निधन 14 अक्टूबर 2020 को हो गया था। पहली पत्नी के निधन के बाद पति ने पेंशन पेमेंट ऑर्डर (PPO) में नजमा खातून का नाम जोड़ने का अनुरोध विभाग से किया था, लेकिन इसके बावजूद प्राधिकारियों ने उनके पक्ष में पारिवारिक पेंशन स्वीकृत नहीं की।
- याचिकाकर्ता का तर्क: याचिकाकर्ता ने वित्त विभाग के 27 जून 2011 के संकल्प (Memo No. 1549) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि किसी मुस्लिम कर्मचारी ने पर्सनल लॉ के तहत एक से अधिक वैध शादियां की हैं, तो सभी जीवित विधवाएं समान अनुपात में पारिवारिक पेंशन की हकदार होंगी। चूंकि पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए अकेली जीवित पत्नी होने के नाते वह पूरी पेंशन की हकदार हैं।
- राज्य सरकार का रुख: राज्य सरकार ने स्वीकार किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू होता है, लेकिन बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम 23 (Rule 23) का हवाला दिया। नियम 23 के तहत किसी भी सरकारी सेवक को पर्सनल लॉ में अनुमति होने के बावजूद दूसरी शादी करने से पहले सरकार से पूर्व अनुमति (Prior Permission) लेना अनिवार्य है।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण एवं मुख्य बिंदु
जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की पीठ ने राज्य सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत तय किए।
पर्सनल लॉ और समान नागरिक संहिता (UCC)
हाई कोर्ट ने कहा कि हालांकि संविधान का अनुच्छेद 44 (Article 44) समान नागरिक संहिता (UCC) की परिकल्पना करता है, लेकिन अभी तक राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया है जो मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह को समाप्त या प्रतिबंधित करता हो।
“समान नागरिक संहिता लाने या मुस्लिमों के बीच बहुविवाह को प्रतिबंधित करने वाले किसी कानून के अभाव में, मुस्लिम पर्सनल लॉ ही मुस्लिमों के वैवाहिक अधिकारों और दायित्वों को नियंत्रित करता रहेगा।”
सेवा नियमों (Rule 23) और पर्सनल लॉ में समन्वय
कोर्ट ने माना कि यद्यपि नियम 23 सरकारी कर्मचारियों के सेवा आचरण को विनियमित करता है, लेकिन इसका प्रावधान (Proviso) लागू पर्सनल लॉ के तहत अनुमति प्राप्त विवाहों को स्पष्ट मान्यता देता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एक पुरुष को 4 शादियां करने की कानूनी अनुमति है।
2011 के वित्त विभाग संकल्प का प्रभाव
अदालत ने पाया कि वित्त विभाग का 27 जून 2011 का संकल्प अभी भी लागू है और इसे वापस नहीं लिया गया है। इस संकल्प ने स्पष्ट किया था कि 6 सितंबर 1996 की पुरानी अधिसूचना मुस्लिम कर्मचारियों की वैध विधवाओं को पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं कर सकती।
उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश (Court Order)
- पटना उच्च न्यायालय ने नजमा खातून की याचिका को स्वीकार कर लिया।
- कोर्ट ने सिविल सर्जन, लखीसराय को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता के पक्ष में पारिवारिक पेंशन स्वीकृत करने और बकाया राशि का भुगतान करने के लिए त्वरित व आवश्यक कदम उठाएं।

