केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (Chhattisgarh High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद |
| याचिकाकर्ता | मदनपुर गांव (सूरजपुर) में काबिज बांग्लादेशी शरणार्थी |
| मुख्य विधिक प्रश्न | क्या लंबे समय से रह रहे विदेशी नागरिक सरकारी जमीन पर अधिकार के लिए आर्टिकल 226/रिट याचिका दायर कर सकते हैं? |
| उच्चतम न्यायालय के संदर्भित फैसले | Sarbananda Sonowal v. UOI एवं Jagpal Singh v. State of Punjab |
| अदालत का फैसला | याचिकाएं खारिज। विदेशी नागरिकों के अधिकार केवल Art. 21 तक सीमित हैं; अतिक्रमणकारियों को लंबे कब्जे से मालिकाना हक नहीं मिलता। |
Government Land: विदेशी नागरिकों के अधिकारों और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की पीठ ने 22 जुलाई को दिए अपने फैसले में यह व्यवस्था दी। शीर्ष अदालत ने बांग्लादेशी शरणार्थियों (Bangladeshi Refugees) द्वारा सरकारी जमीन से बेदखली से राहत पाने के लिए दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि बिना किसी कानूनी अधिकार के केवल लंबे समय तक सरकारी जमीन पर रहने या निर्माण कर लेने से स्वामित्व या कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।
📂 मामला क्या था? (Case Background)
- यह मामला सूरजपुर जिले के मदनपुर गांव स्थित सरकारी भूमि पर काबिज शरणार्थियों द्वारा दायर याचिकाओं से संबंधित है।
- याचिकाकर्ताओं का तर्क: बांग्लादेशी शरणार्थियों ने तर्क दिया कि वे और उनके परिवार 1964 में पुनर्वास योजना के तहत यहाँ बसाए गए थे। वे पिछले 60 से अधिक वर्षों से इस जमीन पर रह रहे हैं, मकान बनाए हैं, खेती कर रहे हैं और यही उनकी आजीविका का साधन है।
- विवाद की वजह: इस सरकारी जमीन को ‘महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय’ को कॉलेज परिसर निर्माण के लिए आवंटित कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने बेदखली और तोड़फोड़ के नोटिस को चुनौती देते हुए कहा कि जब अन्य vacant जमीन उपलब्ध थी, तो उन्हें क्यों उजाड़ा जा रहा है।
- राज्य सरकार का पक्ष: राज्य सरकार ने तर्क दिया कि यह जमीन पूरी तरह से सरकारी है और इसे सार्वजनिक हित के प्रोजेक्ट के लिए आवंटित किया गया है। याचिकाकर्ता ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके जो यह साबित करे कि जमीन पर उनका मालिकाना हक है।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “अनुच्छेद 21 तक सीमित हैं विदेशी नागरिकों के अधिकार”
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने माना कि रिट याचिका (Writ Petition) के तहत विवादित तथ्यों और अतिक्रमण के दावों का फैसला नहीं किया जा सकता।
विदेशी नागरिकों का मौलिक अधिकार
उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध फैसले ‘सर्बानंद सोनोवाल बनाम भारत संघ’ (Sarbananda Sonowal v. Union of India) का हवाला देते हुए टिप्पणी की। कहा, एक विदेशी नागरिक का मौलिक अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तक ही सीमित है… जो व्यक्ति न तो नागरिक है और न ही कोई वैध पात्रता साबित कर सकता है, वह सरकारी जमीन पर अनाधिकृत कब्जे को बचाने के लिए असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का सहारा नहीं ले सकता।
लंबे कब्जे से स्वामित्व नहीं मिलता
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य मील के पत्थर फैसले ‘जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य’ (Jagpal Singh v. State of Punjab) का भी संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि केवल लंबे समय से रहने या पक्का निर्माण करने से किसी अतिक्रमणकारी (Trespasser) को वैधानिक या इक्विटी अधिकार प्राप्त नहीं होता।
“कानूनी स्थिति अब पूरी तरह स्पष्ट (Res integra) है कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वाले को केवल लंबे समय तक कब्जे या निर्माण करने के आधार पर कोई कानूनी या निहित अधिकार हासिल नहीं होता।”
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय (Court Verdict)
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता सरकारी भूमि पर अपना कोई कानूनी अधिकार या स्वामित्व साबित करने में विफल रहे हैं। तदनुसार, अदालत ने बेदखली के खिलाफ दायर उनकी सभी रिट याचिकाओं को खारिज (Dismissed) कर दिया।

