Monday, August 17, 2026
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Adultery case: व्यभिचार में जीवनयापन का तात्पर्य निरंतर अनैतिक आचरण से है…यह रही पटना हाईकोर्ट की टिप्पणी

Adultery case: पटना हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि कुछ नैतिक चूक और फिर सामान्य जीवन में लौटना व्यभिचार में जीवनयापन नहीं कहा जा सकता।

अदालत में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई

हाईकोर्ट की यह टिप्पणी एक पति द्वारा फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की गई आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें फैमिली कोर्ट ने पत्नी को ₹3,000 प्रति माह और बेटी को ₹2,000 प्रति माह भरण-पोषण के रूप में देने का निर्देश दिया था। न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार की एकल पीठ ने कहा, व्यभिचार में जीवनयापन का तात्पर्य निरंतर अनैतिक आचरण से है, न कि किसी एक या दो बार के अनैतिक कार्यों से। एक या दो बार सद्गुणों से विचलन हो सकता है, लेकिन केवल उसी आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि महिला ‘व्यभिचार में जीवन यापन’ कर रही है। यदि यह आचरण निरंतर बना रहता है और इसके बाद भी व्यभिचारी जीवन चलता है, तभी उसे ‘व्यभिचार में जीवन यापन’ कहा जा सकता है।

सीआरपीसी की धारा 125 के प्रावधान पर चर्चा

कोर्ट ने यह भी कहा कि व्यभिचारी जीवन निश्चित रूप से पत्नी के लिए भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण पाने के अधिकार से वंचित करने का आधार है, लेकिन विवाह से पहले किसी महिला के किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक संबंध इस परिभाषा में नहीं आते, क्योंकि व्यभिचार एक ऐसा अपराध है जो जीवनसाथी के प्रति किया गया हो। कोर्ट ने यह जोड़ा, विवाह के बाद किसी पत्नी का व्यभिचारी जीवन निस्संदेह उसे पति से भरण-पोषण पाने के अधिकार से अयोग्य बनाता है। इस दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रंजन कुमार झा ने पैरवी की, जबकि प्रतिवादियों की ओर से APP उपेंद्र कुमार और वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार मिश्रा उपस्थित रहे।

यह है पूरा मामला

वर्ष 2012 में प्रतिवादी (पत्नी और बेटी) ने याचिकाकर्ता और उसके माता-पिता के खिलाफ CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की याचिका दायर की थी। बाद में माता-पिता को प्रतिवादी सूची से हटा दिया गया। आरोप था कि वर्ष 2010 में हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह हुआ और उसके बाद एक पुत्री का जन्म हुआ। आरोपों के अनुसार, पत्नी को अतिरिक्त दहेज की मांग पूरी न होने पर शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, जिससे वह ससुराल छोड़ने को विवश हुई। यह भी आरोप था कि पति का किसी अन्य महिला से अवैध संबंध था और ससुराल पक्ष उसे मरने के लिए मजबूर कर रहा था ताकि वह महिला से दोबारा विवाह कर सके और अच्छा-खासा दहेज प्राप्त कर सके। पत्नी ने यह भी कहा कि वह पति के साथ रहने को तैयार थी, लेकिन पति उसे साथ रखने को तैयार नहीं था। पत्नी का कहना था कि पति सरकारी नौकरी में है और खेती तथा व्यापार से कुल ₹24,000 मासिक आय अर्जित करता है।

यह रहा पति का पक्ष

पति ने यह कहा कि उसका विवाह मंदिर में जबरदस्ती कराया गया और बेटी की वैधता पर भी सवाल उठाया क्योंकि वह विवाह के केवल 4.5 महीने बाद पैदा हुई थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी का अपने जीजा से अवैध संबंध है और वह वैवाहिक जीवन जारी रखने की इच्छुक नहीं है। पति ने यह भी दावा किया कि उसकी मासिक आय केवल ₹11,000 है और दहेज मांगने व प्रताड़ना के आरोप निराधार हैं।

यह रही कोर्ट की विवेचना

हाईकोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता अवध किशोर साह ने कभी भी फैमिली कोर्ट या किसी सिविल कोर्ट में बेटी गुड़िया कुमारी की वैधता को लेकर कोई याचिका नहीं दायर की। अतः, कोई भी न्यायिक घोषणा नहीं हुई है जिससे यह साबित हो कि गुड़िया कुमारी याचिकाकर्ता की वैध संतान नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है, जिसका उद्देश्य पत्नी और बच्चों की दरिद्रता व बेसहारा स्थिति को रोकना तथा उन्हें भोजन, वस्त्र और आश्रय उपलब्ध कराना है। न्यायालय ने कहा कि इस तरह की कार्यवाही में विवाह या पितृत्व के कठोर प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती; न्यायालय की प्रारंभिक संतुष्टि ही आदेश देने के लिए पर्याप्त है।

पत्नी और बेटी का कोई आय का स्रोत नहीं

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह की कार्यवाही में marital status या child paternity पर कोई भी निष्कर्ष अस्थायी होते हैं और सिविल या फैमिली कोर्ट के आदेशों के अधीन होते हैं, जो कि वैवाहिक स्थिति या संतान की वैधता का अंतिम निर्णय देने में सक्षम हैं। कोर्ट ने कहा, इसलिए एक वैधानिक कानूनी अनुमान है कि गुड़िया कुमारी याचिकाकर्ता की वैध संतान है और रिकॉर्ड पर कोई भी सबूत इस अनुमान को खंडित नहीं करता। साथ ही, कोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्व दिया कि पत्नी और बेटी का कोई आय का स्रोत नहीं है जिससे वे अपना जीवनयापन कर सकें। कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित भरण-पोषण की राशि प्रतिवादियों की आवश्यकताओं और याचिकाकर्ता की आय के अनुसार अत्यधिक नहीं है।

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