SC news: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह गलत परंपरा बनती जा रही है कि आरोपी पहले बेल के लिए बड़ी रकम जमा करने की पेशकश करते हैं और बाद में अदालत से उन शर्तों में ढील देने की मांग करते हैं।
न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता भी उतनी ही जरूरी है
जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति के अधिकारों का ध्यान रखना जरूरी है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता भी उतनी ही जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि बेल की शर्तें जरूरत से ज्यादा सख्त नहीं होनी चाहिए, लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि आरोपी खुद क्या पेशकश कर रहा है। एक अहम टिप्पणी में कोर्ट ने इस रवैये को निंदनीय बताया।
13.73 करोड़ टैक्स चोरी का मामला
यह मामला मद्रास हाईकोर्ट के एक आदेश से जुड़ा है। याचिकाकर्ता पर 13.73 करोड़ रुपए की टैक्स चोरी का आरोप है। उसे 27 मार्च को गिरफ्तार किया गया था। 8 मई को जब उसकी बेल याचिका हाईकोर्ट में लगी, तो उसके वकील ने कहा कि आरोपी पहले ही 2.86 करोड़ रुपए जमा कर चुका है और वह किसी भी सख्त शर्त को मानने को तैयार है।
2.50 करोड़ जमा करने की पेशकश खुद की थी
हाईकोर्ट में आरोपी के वकील ने यह भी कहा कि बेल मिलने के 10 दिन के भीतर वह 2.50 करोड़ रुपए और जमा कर देगा। इसके बाद हाईकोर्ट ने उसे 50 लाख रुपए ट्रायल कोर्ट में जमा करने की शर्त पर बेल दी। बाकी 2 करोड़ रुपए 10 दिन में जमा करने को कहा गया।
बेल के बाद शर्तों में ढील की मांग
बेल मिलने के बाद 12 मई को आरोपी ने हाईकोर्ट में अर्जी लगाकर कहा कि 50 लाख रुपए बेल से पहले जमा करना उसके लिए संभव नहीं है। उसने मांग की कि यह रकम बेल मिलने के बाद जमा करने की अनुमति दी जाए। हाईकोर्ट ने 14 मई को आदेश दिया कि आरोपी बेल मिलने के 10 दिन के भीतर पूरी 2.50 करोड़ रुपए की रकम जमा कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह गलत तरीका है
अब आरोपी ने हाईकोर्ट के 14 मई के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह चिंताजनक है कि आरोपी पहले बेल के लिए रकम जमा करने की पेशकश करते हैं और बाद में कहते हैं कि वकील को ऐसा कहने का अधिकार नहीं था। कोर्ट ने कहा कि अगर शुरुआत में रकम जमा करने की बात नहीं होती, तो हाईकोर्ट मामले की मेरिट पर विचार करता।
8 और 14 मई के आदेशों को रद्द करने पर विचार
कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने हाईकोर्ट के आदेश का फायदा उठाकर बेल ले ली। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 8 और 14 मई के आदेशों को रद्द करने पर विचार किया, लेकिन अंत में 14 मई के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें बेल के 10 दिन के भीतर 2.50 करोड़ रुपए जमा करने की बात कही गई थी।

