Rape Case: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट को दुष्कर्म के आरोपी का डीएनए टेस्ट कराने की पुलिस की मांग को खारिज नहीं करना चाहिए।
एक दुष्कर्म पीड़िता की अपील पर सुनाया फैसला
यह फैसला जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की बेंच ने एक दुष्कर्म पीड़िता की अपील पर सुनाया। पीड़िता ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें दिल्ली पुलिस की डीएनए टेस्ट की मांग को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि डीएनए जांच एक लगभग परफेक्ट साइंस है, जिससे यह तय किया जा सकता है कि रेप हुआ या नहीं। साथ ही यह जांच आरोपी की बेगुनाही या दोष साबित करने में भी अहम भूमिका निभाती है। पीड़िता ने एक व्यक्ति पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था और बाद में एक बच्चे को जन्म दिया, जिसके बारे में उसने कहा कि वह रेप से गर्भवती हुई थी। पुलिस आरोपी को एम्स लेकर गई, लेकिन उसने खून का सैंपल देने से इनकार कर दिया।
पहले दर्ज हुई थी छेड़छाड़ की एफआईआर, बाद में जोड़ा गया दुष्कर्म की धारा
दिल्ली पुलिस ने 2021 में आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 354, 506 और 509 के तहत एफआईआर दर्ज की थी। बाद में पीड़िता के मजिस्ट्रेट के सामने बयान के बाद धारा 376 (दुष्कर्म) भी जोड़ी गई। पुलिस ने आरोपी के खून का सैंपल लेने की कोर्ट से इजाजत मांगी, लेकिन अप्रैल 2023 में कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि घटना के समय पीड़िता शादीशुदा थी।
पीड़िता ने हाईकोर्ट में कहा कि डीएनए जांच जरूरी है
पीड़िता ने हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा कि डीएनए जांच से यह साबित किया जा सकता है कि बच्चा किसका है और इससे बच्चे के हितों को कोई नुकसान नहीं होगा। कोर्ट ने माना कि यह जांच जरूरी है।
डीएनए जांच से सच सामने आता है
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा, “डीएनए जांच एक लगभग परफेक्ट साइंस है, जिससे यह तय किया जा सकता है कि दुष्कर्म हुआ या नहीं। 2006 में सीआरपीसी की धारा 53A जोड़ी गई थी, जिसके तहत रेप मामलों में खून की जांच और डीएनए टेस्ट लगभग अनिवार्य है।” उन्होंने कहा, “यह जांच न केवल पीड़िता के पक्ष में काम करती है, बल्कि कई मामलों में आरोपी को झूठे आरोपों से बरी करने में भी मदद करती है।”
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए आरोपी को 15 दिन के भीतर खून का सैंपल देने को कहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर आरोपी विरोध करता है तो पुलिस उचित बल का प्रयोग कर सकती है।
शादीशुदा होने का तर्क खारिज किया
कोर्ट ने आरोपी के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि पीड़िता शादीशुदा थी, इसलिए बच्चा उसके पति का माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता और उसका पति 2018 से अलग रह रहे थे और दोनों ने तलाक के समय यह स्वीकार किया था कि उनके बीच कोई संबंध नहीं था। यह बात फैमिली कोर्ट में दिए गए हलफनामे से भी साबित होती है।

