Sentence Suspension: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश पर नाराजगी जताई है।
कोई विशेष परिस्थिति न हो तब तक सजा निलंबन पर विचार नहीं
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच—जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन ने कहा, “यह इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक और आदेश है, जिससे हम निराश हैं।” कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने सजा निलंबन से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले—भगवान राम शिंदे गोसाई बनाम गुजरात राज्य (1999) 4 SCC 421—को नजरअंदाज किया। इस फैसले में कहा गया था कि जब किसी व्यक्ति को तय अवधि की सजा दी जाती है और वह अपील करता है, तो उसकी सजा निलंबित करने पर उदारता से विचार किया जाना चाहिए, जब तक कि कोई विशेष परिस्थिति न हो।
दोषी की सजा निलंबित करने की याचिका खारिज करने से जुड़ा मामला
यह आदेश एक दोषी की सजा निलंबित करने की याचिका खारिज करने से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने तय कानून को नजरअंदाज किया और बिना जरूरी कानूनी मूल्यांकन के याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का यह आदेश रद्द कर दिया और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेजा।
ट्रायल कोर्ट ने आराेपी काे 4 साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई थी
दोषी को POCSO एक्ट की धारा 7 और 8, IPC की धारा 354, 354A, 323 और 504 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(10) के तहत दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे 4 साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई थी, जो एक साथ चलने वाली थीं। दोषी ने सजा निलंबन के लिए CrPC की धारा 389 के तहत हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी, जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि अपराध गंभीर है। लेकिन हाईकोर्ट ने तय कानूनी सिद्धांतों के आधार पर याचिका का मूल्यांकन नहीं किया।
हाईकोर्ट ने तय कानूनों को नजरअंदाज किया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हाईकोर्ट ने तय कानूनों को नजरअंदाज कर केवल अभियोजन पक्ष की दलीलों और मौखिक गवाहियों को दोहराया।” कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को यह ध्यान में रखना चाहिए था कि सजा केवल 4 साल की तय अवधि की है और केवल तभी याचिका खारिज की जा सकती है, जब कोई ठोस कारण हो कि दोषी की रिहाई से जनहित को नुकसान होगा। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह दोषी की सजा निलंबन की याचिका पर दोबारा विचार करे और तय कानूनों के अनुसार 15 दिन के भीतर फैसला सुनाए।
पहले भी लग चुकी है फटकार
गौरतलब है कि कुछ दिन पहले भी सुप्रीम कोर्ट की यही बेंच इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अन्य आदेश पर सख्त टिप्पणी कर चुकी है। उस मामले में हाईकोर्ट के एक जज ने एक आपराधिक केस को यह कहकर खारिज करने से इनकार कर दिया था कि उससे जुड़ा सिविल केस प्रभावी नहीं है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया था कि उस जज को आपराधिक मामलों की सुनवाई से दूर रखा जाए।
CRIMINAL APPEAL NO.3409/2025
(@SPECIAL LEAVE PETITION (CRL.) NO.11361/2025
AASIF @ PASHA Appellant(s)
VERSUS
THE STATE OF U.P. & ORS. Respondent(s)

