Wednesday, October 28, 2026
HomeLaworder HindiDisregarding judicial Order: जज का आदेश न मानना अक्षम्य… पुलिस अधिकारियों को...

Disregarding judicial Order: जज का आदेश न मानना अक्षम्य… पुलिस अधिकारियों को कैद की सजा, जानें गिरफ्तारी के 11 जरूरी नियम

Disregarding judicial Order: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने ललितपुर के एक मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस अधिकारियों द्वारा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के आदेशों की अनदेखी को “अक्षम्य” (Unpardonable) करार दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह केवल अवमानना नहीं, बल्कि कानून की सत्ता को सीधी चुनौती है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने न्यायपालिका की गरिमा और पुलिस की जवाबदेही को लेकर एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक कार्य करते समय एक ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट का पद जिले के डीएम, एसपी और यहाँ तक कि राज्य के राजनीतिक प्रमुख से भी ऊपर होता है।

मामले की मुख्य बातें और पुलिस की लापरवाही

  • अवैध हिरासत का आरोप: शानू उर्फ राशिद नामक व्यक्ति को धोखाधड़ी के मामले में 14 सितंबर 2025 को हिरासत में लिया गया, लेकिन उसकी गिरफ्तारी नहीं दिखाई गई।
  • CJM के आदेश की अनदेखी: जब आरोपी की बहन ने शिकायत की, तो CJM ललितपुर ने पुलिस को थाने की CCTV फुटेज पेश करने का आदेश दिया। पुलिस ने बार-बार आदेश मिलने के बावजूद फुटेज नहीं दी।
  • नियमों का उल्लंघन: पुलिस ने एक महिला सह-आरोपी को सुबह 4 बजे गिरफ्तार किया, जो सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले महिला की गिरफ्तारी पर रोक लगाने वाले कानून का उल्लंघन था।

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियां

  • पद की गरिमा: कोर्ट ने कहा, “जब एक न्यायिक अधिकारी अपने न्यायिक कर्तव्यों का पालन कर रहा होता है, तो वह जिला मजिस्ट्रेट (DM) या जिला पुलिस प्रमुख (SP) और यहाँ तक कि राज्य के राजनीतिक प्रमुख से भी ऊपर होता है।”
  • CCTV फुटेज का बहाना: पुलिस ने बहाना बनाया कि स्टोरेज क्षमता कम होने के कारण फुटेज डिलीट हो गई। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यूपी के थानों में सीसीटीवी का ठीक से काम न करना एक “नियमित विशेषता” बन गई है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करती है।

पुलिस को सजा और कड़े निर्देश

  • कोर्ट रूम में कैद: कोर्ट ने थानाध्यक्ष (SHO) और जांच अधिकारी (IO) को अवमानना का दोषी पाया और उन्हें सजा के तौर पर शाम 4 बजे तक (अदालत उठने तक) कस्टडी में रहने की सजा सुनाई।
  • ₹1 लाख का मुआवजा: राज्य सरकार को आदेश दिया गया कि वह पीड़ित (शानू) को अवैध हिरासत के लिए 1 लाख रुपये का मुआवजा दे। यह पैसा दोषी पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूला जाएगा।
  • मजिस्ट्रेट करेंगे ‘सरप्राइज चेक’: हाई कोर्ट ने एक बड़ा निर्देश दिया कि अब सभी जिलों के CJM या संबंधित मजिस्ट्रेट कोर्ट के समय के बाद अपने अधिकार क्षेत्र के पुलिस स्टेशनों का अचानक निरीक्षण (Random Check) करेंगे। वे यह जांचेंगे कि सीसीटीवी कैमरे सही ढंग से काम कर रहे हैं या नहीं।

निष्कर्ष

यह फैसला पुलिस के उस रवैये पर कड़ा प्रहार है जिसमें वे निचली अदालतों के आदेशों को गंभीरता से नहीं लेते। कोर्ट ने ‘डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल’ मामले के दिशा-निर्देशों की याद दिलाते हुए पुलिस को उनकी सीमाओं का एहसास कराया है।

समझें: गिरफ्तारी मामले में जानें डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल का केस

डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) का मामला भारतीय कानूनी इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पुलिस द्वारा गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान अपनाए जाने वाले 11 अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए थे, ताकि पुलिस की बर्बरता और हिरासत में होने वाली मौतों (Custodial Deaths) को रोका जा सके।

गिरफ्तारी के समय पुलिस के लिए अनिवार्य 11 नियम

  • स्पष्ट पहचान: गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी की वर्दी पर उसकी नाम-पट्टिका (Name tag) और पद स्पष्ट रूप से अंकित होना चाहिए।
  • गिरफ्तारी मेमो (Arrest Memo): गिरफ्तारी के समय पुलिस को एक ‘मेमो’ तैयार करना होगा, जिसमें गिरफ्तारी का समय, तारीख और स्थान लिखा हो। इस पर कम से कम एक गवाह (जो परिवार का सदस्य या स्थानीय प्रतिष्ठित व्यक्ति हो) के हस्ताक्षर होने चाहिए।
  • सूचना का अधिकार: गिरफ्तार व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपने किसी रिश्तेदार या मित्र को अपनी गिरफ्तारी और स्थान की सूचना दे।
  • लिखित रिकॉर्ड: यदि गिरफ्तार व्यक्ति का कोई रिश्तेदार जिले से बाहर रहता है, तो पुलिस को गिरफ्तारी के 8 से 12 घंटे के भीतर संबंधित जिले के ‘कानूनी सहायता केंद्र’ या पुलिस स्टेशन के माध्यम से सूचना भेजनी होगी।
  • डायरी में प्रविष्टि (General Diary Entry): गिरफ्तारी के बारे में पुलिस स्टेशन की डायरी में विस्तृत जानकारी लिखनी होगी, जिसमें सूचना पाने वाले व्यक्ति का नाम भी शामिल होगा।
  • मेडिकल जांच: गिरफ्तार व्यक्ति के शरीर पर यदि पहले से कोई चोट है, तो उसे ‘निरीक्षण मेमो’ (Inspection Memo) में दर्ज किया जाना चाहिए। हर 48 घंटे में एक सरकारी डॉक्टर द्वारा उसका मेडिकल परीक्षण होना अनिवार्य है।
  • वकील से मिलने का अधिकार: पूछताछ के दौरान (पूरी पूछताछ के दौरान नहीं) गिरफ्तार व्यक्ति को अपने वकील से मिलने की अनुमति दी जानी चाहिए।
  • पुलिस कंट्रोल रूम (PCR): गिरफ्तारी की जानकारी स्थानीय पुलिस कंट्रोल रूम को तुरंत देनी होगी, जहाँ इसे सार्वजनिक नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए।
  • अधिकारों की जानकारी: पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति को तुरंत बताना होगा कि उसे किसी को सूचना देने का कानूनी अधिकार है।
  • मजिस्ट्रेट के सामने पेशी: किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
  • दस्तावेजों की प्रतियाँ: गिरफ्तारी से संबंधित सभी दस्तावेजों की प्रतियाँ मजिस्ट्रेट को भेजी जानी चाहिए।

इन नियमों का उल्लंघन होने पर क्या होगा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हालिया फैसले में जो सजा सुनाई, वह इन्हीं नियमों के उल्लंघन का परिणाम थी। यदि पुलिस इन नियमों को तोड़ती है, तो
संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही हो सकती है। अधिकारी को निलंबित (Suspend) किया जा सकता है। पीड़ित व्यक्ति राज्य से मुआवजे की मांग कर सकता है।

महत्वपूर्ण तथ्य

इन दिशा-निर्देशों को बाद में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में कानूनी प्रावधानों के रूप में शामिल कर लिया गया है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
overcast clouds
23.7 ° C
23.7 °
23.7 °
70 %
2.1kmh
92 %
Wed
29 °
Thu
22 °
Fri
22 °
Sat
27 °
Sun
29 °

Recent Comments