HomeDelhi-NCRRTI reply: 15 साल बाद आया फैसला…RTI का जवाब ने CBI की...

RTI reply: 15 साल बाद आया फैसला…RTI का जवाब ने CBI की जांच में बुनियादी कानूनी खामियां बताईं

RTI reply: दिल्ली की एक अदालत ने कथित पेट्रोलियम डायवर्जन मामले में व्यवसायी मनीष कुमार अग्रवाल और उनकी फर्म मैसर्स रिलायबल इंडस्ट्रीज को सभी आरोपों से मुक्त (Discharge) कर दिया है।

एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ज्योति माहेश्वरी ने पाया कि CBI की जांच में बुनियादी कानूनी खामियां थीं और अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि संबंधित उत्पाद ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’ के दायरे में आते हैं। यह फैसला निचली अदालतों के लिए एक ‘फिल्टर’ के रूप में कार्य करने की याद दिलाता है, ताकि कमजोर और आधारहीन मामलों के कारण न्यायिक प्रणाली पर बोझ न बढ़े और निर्दोष व्यक्तियों की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे।

RTI का जवाब बना टर्निंग पॉइंट

  • इस केस का सबसे निर्णायक मोड़ उपभोक्ता मामले मंत्रालय द्वारा दिया गया एक RTI जवाब था।
  • दस्तावेज: 1 फरवरी 2016 के RTI जवाब में मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि ‘थिनर’ (Thinner) और ‘रिड्यूसर’ (Reducer) औद्योगिक रासायनिक उत्पाद हैं और ये आवश्यक वस्तु अधिनियम (EC Act) के दायरे में नहीं आते।
  • कोर्ट की टिप्पणी: अदालत ने कहा कि जब यह ‘स्टर्लिंग क्वालिटी’ का दस्तावेज पेश किया गया, तो इसे झुठलाने की जिम्मेदारी CBI की थी, जिसे उसने पूरा नहीं किया।

15 साल का इंतजार और कागजी लेनदेन

  • अदालत ने मामले की लंबी अवधि और जांच की खामियों पर तीखी टिप्पणी की।
  • देरी: मामला 2011 में दर्ज हुआ था और 2026 तक केवल ‘चार्ज’ (आरोप तय करने) के चरण में था। कोर्ट ने कहा कि 15 साल तक मुकदमा झेलना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है।
  • कागजी सेल: CBI ने आरोप लगाया था कि 10.63 करोड़ रुपये की बिक्री केवल कागजों पर दिखाई गई ताकि पेट्रोलियम उत्पादों के डायवर्जन को छिपाया जा सके। लेकिन कोर्ट ने पाया कि जब उत्पाद ही विनियमित (Regulated) नहीं थे, तो EC Act के तहत अपराध नहीं बनता।
  • जांच में कमियां: न तो आरोपी के परिसर से ‘नैप्था’ (Naptha) की बरामदगी हुई और न ही कोई लैब रिपोर्ट पेश की गई जिससे साबित हो कि उत्पादों में प्रतिबंधित डेरिवेटिव थे।

अदालत का कड़ा रुख: मुकदमा चलाना समय की बर्बादी

एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में कहा, “यदि अभियोजन पक्ष के सभी सबूतों को पूरी तरह स्वीकार भी कर लिया जाए, तो भी एकमात्र निष्कर्ष यही निकलता है कि आरोपी दोषी नहीं हैं। ऐसी स्थिति में मुकदमा चलाना केवल समय की बर्बादी (Exercise in futility) होगी।

बचाव पक्ष की दलील

आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ता के.के. शर्मा ने तर्क दिया कि CBI की जांच “दोषपूर्ण और चयनात्मक” (Defective and Selective) थी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल को गलत तरीके से फंसाया गया था और RTI के माध्यम से मिली जानकारी ने अभियोजन के पूरे आधार को ही ध्वस्त कर दिया है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
mist
19 ° C
19 °
19 °
82 %
0kmh
40 %
Mon
33 °
Tue
37 °
Wed
38 °
Thu
39 °
Fri
37 °

Recent Comments