PC Act: राउज एवेन्यू कोर्ट (दिल्ली) के विशेष न्यायाधीश विद्या प्रकाश ने भ्रष्टाचार के एक चर्चित मामले में दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह नरुका को बरी कर दिया है।
इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह नरुका पर रिश्वत का था आरोप
यह मामला 2014 में ‘आज तक’ न्यूज चैनल द्वारा प्रसारित स्टिंग ऑपरेशन “ऑपरेशन दिल्ली पुलिस” से जुड़ा था। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बिना किसी संदर्भ (Context) के केवल कुछ शब्दों का उच्चारण यह साबित नहीं करता कि रिश्वत की मांग की गई थी। इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह नरुका पर आरोप था कि उन्होंने 2014 में एक अंडरकवर जर्नलिस्ट से ₹5,000 की रिश्वत ली थी ताकि किसी मामले में एफआईआर (FIR) दर्ज न की जाए।
“संदर्भहीन” बातचीत और कानूनी आधार
- अदालत ने स्टिंग ऑपरेशन के ट्रांसक्रिप्ट का विश्लेषण करते हुए पाया कि रिपोर्टर द्वारा कहे गए शब्द जैसे “भाई साहब ये ‘दस हजार रुपये’ हैं, ओह, ‘पांच हजार रुपये हैं’ ये, लेकिन भाई साहब ये है और दूसरा मुद्दा ये है कि एफआईआर न हो”—यह साबित नहीं करते कि आरोपी ने पैसे मांगे थे।
- कोर्ट का तर्क: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत, केवल पैसे की बरामदगी काफी नहीं है। जब तक ‘मांग’ (Demand) और ‘स्वीकृति’ (Acceptance) स्वतंत्र रूप से साबित न हो जाए, तब तक किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल
- अदालत ने अभियोजन पक्ष (Prosecution) की जांच में कई गंभीर खामियां पाईं।
- मूल डिवाइस की अनुपस्थिति: जिस iPhone से स्टिंग ऑपरेशन रिकॉर्ड किया गया था, उसे न तो कभी जब्त किया गया और न ही अदालत में पेश किया गया। मूल डिवाइस के बिना इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है।
- अपुष्ट साक्ष्य (Hearsay Evidence): कोर्ट ने नोट किया कि पेश किए गए अधिकांश सबूत केवल ‘सुनी-सुनाई’ बातों पर आधारित थे, जिन्हें कानूनन विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
गवाहों और परिस्थितियों का असर
- ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष का केस कमजोर हो गया।
- पत्रकार की मृत्यु: स्टिंग ऑपरेशन करने वाले मुख्य पत्रकार अक्षय सिंह की कार्यवाही के दौरान ही मृत्यु हो गई थी, जिससे उनका मुख्य गवाह के रूप में परीक्षण नहीं हो सका।
- मुकरे गवाह: मामले के अन्य महत्वपूर्ण गवाह अपने बयानों से मुकर गए (Hostile witnesses)।
आरोपी इंस्पेक्टर का पक्ष
इंस्पेक्टर नरुका ने शुरू से ही इन आरोपों को खारिज किया था। उनके अनुसार, यह मामला न्यूज चैनल की TRP बढ़ाने के उद्देश्य से गढ़ा गया था। वीडियो फुटेज के साथ छेड़छाड़ की गई थी (Tampered and Doctored)। उन्होंने किसी भी प्रकार की रिश्वत की मांग या स्वीकृति से इनकार किया।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| विवरण | कोर्ट का निष्कर्ष / टिप्पणी |
| मुख्य मामला | 2014 का ‘आज तक’ स्टिंग ऑपरेशन (ऑपरेशन दिल्ली पुलिस)। |
| आरोपी | इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह नरुका। |
| कोर्ट का आदेश | संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया। |
| बड़ी खामी | मूल रिकॉर्डिंग डिवाइस (iPhone) का न मिलना और रिश्वत की ‘मांग’ साबित न होना। |
| सिद्धांत | सुप्रीम कोर्ट के अनुसार: रिश्वत की मांग और उसकी प्राप्ति का स्वतंत्र प्रमाण अनिवार्य है। |
संदेह से परे’ सबूत की अनिवार्यता
दिल्ली कोर्ट का यह फैसला भ्रष्टाचार के मामलों में ‘साक्ष्य की गुणवत्ता’ के महत्व को दोहराता है। स्टिंग ऑपरेशंस अक्सर सनसनीखेज होते हैं, लेकिन कानूनी रूप से वे तभी टिक सकते हैं जब मूल साक्ष्य (Original Devices) सुरक्षित हों और बातचीत में स्पष्ट रूप से अपराध की पुष्टि होती हो। इस मामले में, अभियोजन पक्ष “संदेह से परे” (Beyond reasonable doubt) दोष साबित करने में विफल रहा।

