Sunday, June 28, 2026
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Illegal Jhuggi: पीएम मोदी के आवास की सुरक्षा के आगे झुग्गी पुनर्वास…राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए हाईकोर्ट ने कुछ ऐसा फैसला सुनाया, पढ़िए

Illegal Jhuggi: दिल्ली हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) को सर्वोपरि मानते हुए प्रधानमंत्री आवास के पास स्थित झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को हटाने के फैसले को बरकरार रखा है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणकोर्ट का निर्देश / निष्कर्ष
विवादित क्षेत्ररेस कोर्स (प्रधानमंत्री आवास के समीप)।
मुख्य कारणरक्षा बुनियादी ढांचे का निर्माण और राष्ट्रीय सुरक्षा।
पुनर्वास स्थलसावदा घेवरा (Savda Ghevra)।
समय सीमा15 दिन में जमीन खाली करनी होगी।
संवैधानिक स्थितिराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आश्रय के अधिकार को स्थान-परिवर्तित किया जा सकता है।

रेस कोर्स क्षेत्र में स्थित झुग्गी बस्तियों से जुड़ा मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने भाई राम कैंप, DID कैंप और मस्जिद कैंप के निवासियों की याचिकाओं का निपटारा करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि अनुच्छेद 21 के तहत आश्रय का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सरकारी भूमि पर कब्जा बनाए रखने का पूर्ण अधिकार नहीं देता। यह मामला रेस कोर्स क्षेत्र में स्थित झुग्गी बस्तियों से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि प्रधानमंत्री आवास और अन्य रणनीतिक प्रतिष्ठानों की संवेदनशीलता को देखते हुए रक्षा बुनियादी ढांचे (Defense Infrastructure) को मजबूत करने के लिए इस जमीन की तत्काल आवश्यकता है।

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राष्ट्रीय सुरक्षा और कार्यकारी नीति

अदालत ने सरकार के पक्ष को स्वीकार करते हुए कहा, वर्तमान वैश्विक और भू-राजनीतिक घटनाओं को देखते हुए, सुरक्षा संबंधी चिंताएं बस्तियों को हटाने का एक ठोस और विशिष्ट कारण हैं। कोर्ट ने माना कि सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्यकारी नीतिगत फैसलों (Executive Policy Decisions) में न्यायपालिका को बहुत अधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

अनुच्छेद 21 और पुनर्वास का अधिकार

  • अदालत ने झुग्गी निवासियों के अधिकारों और सुरक्षा के बीच एक संतुलन बनाया।
  • विस्थापित होना अधिकार का उल्लंघन नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि निवासियों को वैकल्पिक आवास (Alternative Accommodation) प्रदान किया जा रहा है, तो उनकी बेदखली अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन नहीं मानी जाएगी।
  • सावदा घेवरा में पुनर्वास: याचिकाकर्ताओं को दिल्ली के सावदा घेवरा क्षेत्र में बसाया जाएगा। हालांकि निवासियों ने काम और स्कूल से दूरी की शिकायत की थी, लेकिन कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक भूमि पर अनधिकृत कब्जा करने वाले उस विशिष्ट स्थान पर हमेशा बने रहने का दावा नहीं कर सकते।

“गरिमापूर्ण जीवन” की शर्तें

  • कोर्ट ने दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) के प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए सरकार को सख्त निर्देश दिए।
  • बुनियादी सुविधाएं: पुनर्वास स्थल (सावदा घेवरा) पर कार्यात्मक स्कूल, पेयजल, स्वास्थ्य सेवा और परिवहन की सुविधाएं सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है।
  • समय सीमा: निवासियों को अगले 15 दिनों के भीतर अपना आवंटन पत्र प्राप्त कर रेस कोर्स क्षेत्र के कैंपों को खाली करना होगा।
  • पुनः अपील की छूट: यदि अधिकारी पुनर्वास कॉलोनी में अनिवार्य सुविधाएं प्रदान करने में विफल रहते हैं, तो याचिकाकर्ता दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

सुरक्षा और मानवता के बीच संतुलन

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला यह रेखांकित करता है कि जब बात राष्ट्र की सुरक्षा और प्रधानमंत्री जैसे उच्च पदों की सुरक्षा की हो, तो व्यक्तिगत हितों को सामूहिक सुरक्षा के लिए समायोजित करना पड़ता है। हालांकि, अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया है कि विस्थापन का मतलब केवल “घर से निकालना” नहीं है, बल्कि सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह उन्हें एक मानवीय और गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक सुविधाएं प्रदान करे।

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