POCSO Verdict: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 8 साल की बच्ची के साथ यौन शोषण और 7 साल की दूसरी बच्ची के साथ यौन शोषण के प्रयास के मामले में दोषी की 14 साल की कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा है।
हाईकोर्ट के जस्टिस लिसा गिल और जस्टिस मीनाक्षी आई. मेहता की बेंच ने कुरुक्षेत्र (हरियाणा) के एक दोषी की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा 2016 में दी गई सजा को सही ठहराया। कोर्ट ने आरोपी के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें उसने कहा था कि उसे 33 साल पुराने जमीन विवाद के कारण झूठा फंसाया गया है। यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि POCSO के मामलों में तकनीकी कमियों (जैसे FIR में देरी या मामूली मेडिकल विसंगतियां) का फायदा उठाकर अपराधी बच न सकें, खासकर जब मामला मासूम बच्चों से जुड़ा हो।
मुख्य विवाद: ‘पुरानी दुश्मनी’ का दावा
- आरोपी ने तर्क दिया था कि पीड़ित परिवार के साथ उसका 1981 से जमीन का विवाद चल रहा था, इसलिए उसे बदला लेने के लिए फंसाया गया है। इस पर हाई कोर्ट ने बेहद तार्किक टिप्पणी की:
- तर्क: “कोई भी समझदार व्यक्ति केवल बदला लेने के लिए अपनी बेटी की गरिमा और परिवार के सम्मान को दांव पर नहीं लगाएगा, वह भी साढ़े तीन दशक (34 साल) पुराने विवाद के लिए।”
- तथ्य: जमीन का विवाद 1982 में ही सुलझ गया था, जबकि यह घटना 2015 की है। इतने लंबे समय तक कोई रंजिश पालकर झूठा केस नहीं करेगा।
FIR में देरी और मेडिकल रिपोर्ट (MLR) की व्याख्या
- बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि FIR 4 दिन की देरी से दर्ज हुई और बच्ची की मेडिकल रिपोर्ट में “ताजा चोट के निशान” (Fresh Injury Marks) नहीं थे। कोर्ट ने इन्हें खारिज करते हुए कहा:
- मानसिक आघात (Trauma): बच्चियों की उम्र केवल 7-8 साल थी। ऐसी स्थिति में बच्चियां डरी होती हैं। मां ने बताया कि उसकी बेटी ने दो दिन तक खाना नहीं खाया और बार-बार पूछने पर ही मामला बताया। ऐसे में FIR में देरी पूरी तरह स्वाभाविक है।
- मेडिकल साक्ष्य: केवल ताजा चोट के निशान न होना आरोपी को बरी करने का आधार नहीं हो सकता। 7-8 साल की बच्चियां एक 38 साल के स्वस्थ वयस्क (Adult) का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं होतीं, इसलिए संघर्ष के निशान न होना मुमकिन है।
घटना का विवरण (The Incident)
- तारीख: 15 जून, 2015 (कुरुक्षेत्र, हरियाणा)।
- अपराध: आरोपी ने दो पड़ोसी बच्चियों को बहला-फुसलाकर अपने घर बुलाया, उन्हें चाकू दिखाकर डराया, बंधक बनाया और एक के साथ यौन शोषण किया।
- सजा: धारा 6 (POCSO): 14 साल की कठोर कैद और ₹10,000 जुर्माना।
- धारा 18 (यौन हमले का प्रयास): 10 साल की कैद।
- IPC धारा 506 व 342: आपराधिक धमकी और गलत तरीके से बंधक बनाने के लिए सजा।
कोर्ट का निष्कर्ष: तर्क की कसौटी
हाई कोर्ट ने कहा कि बच्चियों ने खुद गवाही दी है कि उनके माता-पिता और आरोपी के बीच कभी कोई लड़ाई नहीं हुई थी। आरोपी यह समझाने में पूरी तरह विफल रहा कि बच्चियां उसके खिलाफ इतने गंभीर आरोप क्यों लगाएंगी। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने अपना मामला बिना किसी संदेह के साबित किया है।

