Tuesday, September 29, 2026
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POCSO Case: हम असहाय महसूस कर रहे…राज्य की ओर से नाबालिग मां का समर्थन न करने पर कोलकाता हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, पढ़ें

POCSO Case: कलकत्ता हाई कोर्ट ने POCSO एक्ट के एक मामले में मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सुरक्षा के अभाव को देखते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

जस्टिस तीर्थंकर घोष और जस्टिस चैताली चटर्जी की बेंच ने एक ऐसे मामले की सुनवाई की जहाँ कानून और मानवीय रिश्तों के बीच गहरा संघर्ष था। कोर्ट ने एक ऐसे व्यक्ति की 20 साल की सजा को घटाकर साढ़े तीन साल (जो वह पहले ही काट चुका था) कर दिया है, जिसे उसकी नाबालिग पड़ोसी (पीड़िता) अपना पति मानती है और जिससे उसका एक बच्चा भी है।

यह था मामला

  • सजा: निचली अदालत (Trial Court) ने 2023 के एक मामले में व्यक्ति को धारा 6 (Aggravated Penetrative Sexual Assault) के तहत दोषी ठहराते हुए 20 साल की कड़ी कैद सुनाई थी।
  • खुलासा: मामला तब सामने आया जब नाबालिग पीड़िता ने अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया और मेडिकल स्टाफ ने पुलिस को इसकी सूचना दी।
  • पीड़िता का पक्ष: पीड़िता ने अदालत में स्पष्ट कहा कि वह आरोपी को अपना पति मानती है और उसके साथ ‘वैवाहिक जीवन’ (Conjugal Life) बिताना चाहती है।

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी और चिंता

  • कोर्ट ने राज्य सरकार (State) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
  • सामाजिक सुरक्षा का अभाव: कोर्ट ने बेबसी जाहिर करते हुए कहा कि राज्य ने इस नाबालिग मां और उसके बच्चे को कोई सामाजिक या वित्तीय सुरक्षा (Social Security) प्रदान नहीं की।
  • मुआवजा और आश्रय: जब सरकारी वकील से पूछा गया कि क्या पीड़िता को कोई शेल्टर होम या गुजारे के लिए मुआवजा दिया गया, तो वे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए।
  • अदालत का तर्क: कानून की नजर में नाबालिग की सहमति, सहमति नहीं है, लेकिन राज्य का यह भी कर्तव्य है कि वह सर्वाइवर को सुरक्षा दे। चूंकि राज्य इसमें विफल रहा, इसलिए कोर्ट को कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए अपनी अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Powers) का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

सजा कम करने का आधार

  • हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई दोषसिद्धि (Guilt) को तो बरकरार रखा, लेकिन सजा को कम कर दिया।
  • साढ़े तीन साल की जेल: आरोपी पहले ही साढ़े तीन साल जेल में काट चुका था। कोर्ट ने इसे ही पर्याप्त सजा मानते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया।
  • परिवार की रक्षा: कोर्ट ने माना कि अगर आरोपी जेल में रहता है, तो नाबालिग पीड़िता और उसके बच्चे का भविष्य पूरी तरह असुरक्षित हो जाएगा।

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का समान फैसला

  • इसी दौरान हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने भी एक ऐसा ही फैसला सुनाया।
  • शादी और बच्चा: वहां भी आरोपी ने पीड़िता के बालिग होने पर उससे शादी कर ली थी और उनका डेढ़ साल का बच्चा था।
  • पीड़िता का हित सर्वोपरि: जस्टिस संदीप शर्मा ने कहा कि अगर ऐसे मामलों में कार्यवाही जारी रहती है, तो “सबसे ज्यादा नुकसान पीड़िता का ही होगा।” इसलिए कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ FIR को रद्द कर दिया।

निष्कर्ष: कानून बनाम सामाजिक वास्तविकता

ये दोनों फैसले दर्शाते हैं कि POCSO एक्ट जैसे कड़े कानूनों को लागू करते समय अदालतें अब पीड़िता के भविष्य और सामाजिक पुनर्वास को अधिक महत्व दे रही हैं, खासकर उन मामलों में जहां आरोपी और पीड़िता ने परिवार बसा लिया है।

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