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PMLA vs Banks: अपराध की कमाई पर पहला हक सरकार का, बैंकों का नहीं…बॉम्बे HC ने पलटा ट्रिब्यूनल का फैसला

PMLA vs Banks: बॉम्बे हाई कोर्ट (नागपुर बेंच) ने मनी लॉन्ड्रिंग और कर्ज वसूली के कानूनों के बीच जारी कानूनी टकराव पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की अपील स्वीकार किया

हाईकोर्ट के जस्टिस एम. एस. जावलकर और जस्टिस नंदेश देशपांडे की बेंच ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की अपील स्वीकार करते हुए PMLA अपीलीय ट्रिब्यूनल के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बैंकों के ‘कर्ज वसूली’ के अधिकार को प्राथमिकता दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब मामला “अपराध की कमाई” (Proceeds of Crime) की कुर्की का हो, तो PMLA (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट) का प्रभाव बैंक वसूली कानूनों (SARFAESI और RDB) पर सर्वोपरि होगा।

मामला क्या था? (Grace Industries & HDFC Bank)

  • शुरुआत: 2012 में CBI ने ‘ग्रेस इंडस्ट्रीज लिमिटेड’ के खिलाफ कोयला ब्लॉक आवंटन में अनियमितताओं की जांच शुरू की थी।
  • ED की कार्रवाई: ED ने ₹24.92 करोड़ को “अपराध की कमाई” के रूप में चिन्हित किया और 2015 में कंपनी की संपत्तियों को कुर्क (Attach) कर लिया।
  • बैंक का दावा: HDFC बैंक ने तर्क दिया कि ये संपत्तियां ED की कार्रवाई से पहले ही उनके पास गिरवी (Mortgage) रखी गई थीं, इसलिए SARFAESI एक्ट के तहत कर्ज वसूली पर उनका ‘वैधानिक प्राथमिकता’ (Statutory Priority) का अधिकार है।

कोर्ट का मुख्य तर्क: उद्देश्य अलग-अलग हैं

  • हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि PMLA को अन्य कानूनों के अधीन नहीं माना जा सकता क्योंकि दोनों के उद्देश्य अलग हैं।
  • PMLA (विशेष दांडिक कानून): इसका उद्देश्य “कलंकित संपत्ति” (Tainted Property) को जब्त करना और मनी लॉन्ड्रिंग रोकना है। यह कर्ज वसूली का जरिया नहीं है।
  • SARFAESI/RDB (सिविल कानून): इनका उद्देश्य बैंकों के बकाया कर्ज की वसूली करना है।
  • निष्कर्ष: चूंकि PMLA का उद्देश्य ‘जब्ती’ (Confiscation) है, इसलिए इसे बैंक वसूली की सामान्य सिविल कार्यवाही के नीचे नहीं रखा जा सकता।

प्रायर इंटरेस्ट’ बनाम ‘कुर्की

कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के ‘Axis Bank’ मामले के फैसले की पुष्टि करते हुए कहा, सिर्फ इसलिए कि किसी बैंक या लेनदार का संपत्ति पर पहले से अधिकार (Prior Secured Interest) है, PMLA के तहत की गई कुर्की अवैध नहीं हो जाती।

बैंकों के लिए अब क्या रास्ता है?

  • अदालत ने बैंकों को पूरी तरह निराश नहीं किया है, लेकिन प्रक्रिया बदल दी है।
  • स्पेशल कोर्ट की भूमिका: यदि कुर्की का आदेश पारित हो चुका है या PMLA की धारा 4 के तहत मुकदमा शुरू हो गया है, तो बैंक को अपनी ‘वैध हिस्सेदारी’ (Legitimate Interest) साबित करने के लिए PMLA स्पेशल कोर्ट में आवेदन करना होगा।
  • अपीलीय ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द: हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के पुराने आदेश को “अवैध और मनमाना” बताते हुए बैंक को ‘स्पेशल कोर्ट’ जाने की छूट दी है।

यह रहा अदालत का निष्कर्ष: दांडिक न्याय की जीत

यह फैसला साफ करता है कि अपराध के जरिए बनाई गई संपत्ति पर समाज और देश का पहला हक है। बैंक अपने कमर्शियल हितों के आधार पर आपराधिक संपत्तियों की जब्ती में बाधा नहीं बन सकते। अब बैंकों को अपनी फंसी हुई राशि वापस पाने के लिए PMLA की विशेष अदालतों में लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा।

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