Friday, October 2, 2026
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Land Reform: बिना कानूनी डिग्री के अफसर कर रहे जमीन का फैसला; राजस्व अदालतों में सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट में चलेगी बड़ी बहस

Land Reform: सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर देश भर में ‘राजस्व न्यायिक सेवा’ (Revenue Judicial Service) गठित करने की मांग की गई है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि बिना कानूनी पृष्ठभूमि वाले अधिकारी जमीन के जटिल विवादों का फैसला कर रहे हैं, जिससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 2 अप्रैल को सुनवाई कर सकता है। याचिका में केंद्र और राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे राजस्व अधिकारियों (Revenue Officers) के लिए न्यूनतम कानूनी योग्यता और प्रशिक्षण मॉड्यूल निर्धारित करें।

याचिका का मुख्य तर्क: 66% केस जमीन के

  • याचिका में भूमि विवादों के निपटारे की मौजूदा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
  • विशेषज्ञता की कमी: देश में लगभग 66 प्रतिशत दीवानी (Civil) मामले जमीन से जुड़े हैं। इनका फैसला ऐसे अधिकारी (जैसे तहसीलदार, SDM) करते हैं जिनके पास औपचारिक कानूनी शिक्षा या न्यायिक प्रशिक्षण नहीं होता।
  • असंगत फैसले: कानूनी ज्ञान की कमी के कारण ये अधिकारी अक्सर त्रुटिपूर्ण और मनमाने फैसले लेते हैं, जिससे मुकदमेबाजी का बोझ बढ़ता है।

मौलिक अधिकारों का हनन

  • एडवोकेट अश्विनी दुबे द्वारा तैयार इस याचिका में कहा गया है कि मौजूदा व्यवस्था नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
  • अनुच्छेद 14 और 21: न्याय तक प्रभावी पहुंच न होना और संपत्ति के अधिकारों पर लंबे समय तक अनिश्चितता बने रहना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 21 (जीवन और स्वतंत्रता) का उल्लंघन है।
  • संपत्ति का हस्तांतरण: गलत फैसलों के कारण जमीन के उपयोग और ट्रांसफर पर रोक लग जाती है, जिससे आर्थिक नुकसान होता है।

याचिका की प्रमुख मांगें (Main Prayers)

  • याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से निम्नलिखित हस्तक्षेप की मांग की है।
  • राजस्व न्यायिक सेवा: राज्यों में एक समर्पित ‘राजस्व न्यायिक सेवा’ बनाई जाए।
  • न्यूनतम योग्यता: उत्तराधिकार (Succession), विरासत (Inheritance) और कब्जे (Possession) जैसे मामलों का फैसला करने वाले अधिकारियों के लिए ‘लॉ डिग्री’ अनिवार्य हो।
  • हाई कोर्ट की निगरानी: राजस्व अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले न्यायिक कार्यों की निगरानी और पर्यवेक्षण संबंधित राज्यों के हाई कोर्ट द्वारा किया जाना चाहिए।

इलाहाबाद हाई कोर्ट का संदर्भ

याचिका में जिक्र किया गया है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पहले भी इस मुद्दे पर निर्देश दिए थे, लेकिन उन्हें अभी तक सही भावना के साथ लागू नहीं किया गया है। वर्तमान में राजस्व अधिकारी प्रशासनिक और न्यायिक दोनों भूमिकाएं निभाते हैं, जिससे ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) का सिद्धांत भी प्रभावित होता है।

निष्कर्ष: राजस्व न्याय प्रणाली में बड़े बदलाव की आहट

यदि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका को स्वीकार करता है, तो यह भारत में भूमि रिकॉर्ड और विवाद समाधान प्रणाली में सबसे बड़े सुधारों में से एक होगा। इससे न केवल मुकदमों की संख्या कम होगी, बल्कि जमीन के मालिकों को अधिक पारदर्शी और कुशल न्याय मिल सकेगा।

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