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JDA Case: संविदा पर काम करने वालों का पद पर कोई स्थायी हक नहीं…राजस्थान HC ने सहायक अधिवक्ताओं से यह बात कहा, जान लें

JDA Case: राजस्थान हाई कोर्ट ने जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) द्वारा सहायक अधिवक्ताओं (Assistant Advocates) को सेवा से हटाने के फैसले को बरकरार रखा है।

हाईकोर्ट के जस्टिस गणेश राम मीणा की बेंच ने ‘प्रताप सिंह बनाम जेडीए’ और अन्य जुड़ी हुई याचिकाओं को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने नवंबर 2025 में जेडीए द्वारा उनकी सेवाएं समाप्त किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविदात्मक (Contractual) और अस्थायी जुड़ाव वाले कर्मियों के पास पद पर बने रहने का कोई मौलिक या निहित अधिकार (Vested Right) नहीं है।

मामला क्या था? (The Contractual Engagement)

  • नियुक्ति: जेडीए ने पैनल वकीलों और कार्यालय के बीच समन्वय (Coordination) के लिए 2009 की नीति के तहत सहायक अधिवक्ताओं को नियुक्त किया था।
  • विवाद: नवंबर 2025 में जेडीए ने एक साझा आदेश जारी कर कई अधिवक्ताओं की सेवाएं समाप्त कर दीं।
  • याचिकाकर्ताओं का तर्क: वकीलों ने दलील दी कि उनका काम ‘संतोषजनक’ था और उन्हें बिना किसी ठोस कारण या सुनवाई के हटाना ‘प्राकृतिक न्याय’ (Natural Justice) के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

कोर्ट का मुख्य निष्कर्ष: “नियमों के तहत कार्रवाई”

  • अदालत ने जेडीए की नीतियों (2009, 2014 और 2022 के आदेश) का अध्ययन करने के बाद पाया।
  • अस्थायी प्रकृति: यह जुड़ाव पूरी तरह से अस्थायी और संविदात्मक था, न कि कोई स्थायी सरकारी नौकरी।
  • हटाने का अधिकार: नीतिगत आदेशों में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि यदि प्रदर्शन संतोषजनक नहीं पाया जाता है, तो उन्हें हटाया जा सकता है।
  • लंबा कार्यकाल आधार नहीं: कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि किसी ने लंबे समय तक सेवा की है, वह पद पर बने रहने का दावा नहीं कर सकता।

जेडीए (JDA) का पक्ष

  • जेडीए के वकील ने मजबूती से अपना पक्ष हाईकोर्ट के सामने रखते हुए कई बिंदुओं को बताया।
  • कोई निहित अधिकार नहीं: याचिकाकर्ताओं के पास सेवा जारी रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
  • अनुबंध की शर्तें: नियुक्ति के समय ही यह स्पष्ट था कि यह सेवा कभी भी समाप्त की जा सकती है। जेडीए को किसी विशिष्ट व्यक्ति को बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

अंतिम फैसला: याचिकाएं खारिज

राजस्थान हाई कोर्ट ने माना कि जेडीए ने अपनी निर्धारित शर्तों और नियमों के भीतर रहकर ही यह फैसला लिया है। कोर्ट ने याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि संविदात्मक संबंधों में नियोक्ता (Employer) के पास अनुबंध की शर्तों के अनुसार सेवा समाप्त करने का पूर्ण अधिकार होता है।

निष्कर्ष: संविदा कर्मियों के लिए कड़ा संदेश

यह फैसला एक बार फिर साफ करता है कि सरकारी या अर्ध-सरकारी निकायों (जैसे JDA) में संविदा पर काम करने वाले प्रोफेशनल्स को स्थायी कर्मचारियों के समान अधिकार प्राप्त नहीं होते। यदि अनुबंध की शर्तों में हटाने का प्रावधान है, तो उसे मनमाना नहीं कहा जा सकता।

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