Monday, August 24, 2026
HomeLaworder HindiLegal Precedents: वकील साहब ! केवल बहस के लिए कोर्ट का समय...

Legal Precedents: वकील साहब ! केवल बहस के लिए कोर्ट का समय बर्बाद न करें…सराह मैथ्यू मामले की मिसाल दोहराई, पढ़िए पूरा फैसला

Legal Precedents: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों को ‘कानूनी मर्यादा’ और ‘समय की कीमत’ याद दिलाई।

सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों द्वारा अदालतों का कीमती समय बर्बाद करने और स्थापित कानूनी मिसाल (Settled Precedents) के खिलाफ केवल “तर्क कौशल” (Argumentative Skills) दिखाने के लिए बहस करने पर सख्त नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी मुद्दे पर संवैधानिक पीठ (Constitution Bench) का फैसला मौजूद हो, तो वकीलों को उसका सम्मान करना चाहिए।

विवाद क्या था? (The Core Issue: Limitation Period)

  • यह पूरा मामला Section 468 Cr.P.C. के तहत ‘सीमा अवधि’ (Limitation Period) की गणना से जुड़ा था।
  • सवाल: किसी आपराधिक मामले में संज्ञान (Cognizance) लेने की समय सीमा कब से गिनी जाएगी?
  • विकल्प A: जिस दिन आपराधिक शिकायत दर्ज (Complaint filed) की गई?
  • विकल्प B: जिस दिन कोर्ट/मजिस्ट्रेट ने उस पर संज्ञान (Cognizance taken) लिया?

हाई कोर्ट की गलती और सुप्रीम कोर्ट का सुधार

  • हाई कोर्ट का फैसला: हाई कोर्ट ने शिकायत को यह कहकर रद्द कर दिया था कि मजिस्ट्रेट ने 1 साल की समय सीमा बीतने के बाद संज्ञान लिया। हाई कोर्ट ने “संज्ञान की तारीख” को आधार माना था।
  • सुप्रीम कोर्ट का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने ‘सराह मैथ्यू बनाम कार्डियो वैस्कुलर डिजीज संस्थान (2014)’ के ऐतिहासिक फैसले को नजरअंदाज किया।
  • स्थापित कानून: संवैधानिक पीठ ने पहले ही तय कर दिया है कि समय सीमा की गणना “शिकायत दर्ज करने की तारीख” से होगी, न कि कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने की तारीख से।

वकीलों को सख्त नसीहत (Caution for Lawyers)

  • सुनवाई के दौरान प्रतिवादी (Respondent) के वकील ने ‘सराह मैथ्यू’ केस की एक अलग व्याख्या करने की कोशिश की और FIR व निजी शिकायत के बीच एक “कृत्रिम अंतर” पैदा करने का तर्क दिया।
  • बाध्यकारी मिसाल (Binding Precedent): जिस तरह अदालतें संवैधानिक पीठ के फैसलों को मानने के लिए बाध्य हैं, वकीलों से भी उम्मीद की जाती है कि वे स्थापित कानूनों का सम्मान करें।
  • सिर्फ दिखावे के लिए बहस नहीं: केवल अपनी तर्क क्षमता दिखाने के लिए ऐसी दलीलें देना जो स्थापित कानून के सामने “बेकार” (Worthless) हों, जनता के कीमती समय की बर्बादी है।
  • तर्क का आधार: वकील केवल तभी मिसाल से हटकर तर्क दें जब उनके पास मामले को अलग साबित करने के लिए कोई “असाधारण आधार” (Exceptional Grounds) मौजूद हो।

Key Highlights

विषयसुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष
Limitation की गणनागणना “शिकायत दर्ज करने या कार्यवाही शुरू करने” की तारीख से होगी।
FIR बनाम शिकायतचाहे मामला FIR से शुरू हुआ हो या मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत से, तारीख वही मानी जाएगी जब कार्यवाही शुरू हुई।
नतीजाहाई कोर्ट का आदेश रद्द; आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही बहाल (Restore) कर दी गई।
वकीलों के लिए संदेशस्थापित कानूनी स्थिति (Settled Law) के खिलाफ अनावश्यक बहस से बचें।

समय और कानून का सम्मान

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह साफ संदेश देता है कि अदालती कार्यवाही “बौद्धिक व्यायाम” (Intellectual Exercise) के लिए नहीं, बल्कि न्याय के लिए है। वकीलों को चाहिए कि वे कानून की स्थापित सीमाओं के भीतर रहकर ही अपनी दलीलें पेश करें ताकि न्याय मिलने में देरी न हो।

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CORAM: PRASHANT KUMAR MISHRA, ,J, N.V. ANJARIA, ,J.
CRIMINAL APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL APPEAL NOS. 1831-1832 OF 2026
(Arising out of SLP (Crl.) Nos.9971-9972 of 2025)
ROMA AHUJA
VERSUS
THE STATE AND ANOTHER

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
heavy intensity rain
29 ° C
29 °
29 °
89 %
5.7kmh
96 %
Mon
29 °
Tue
34 °
Wed
34 °
Thu
32 °
Fri
34 °

Recent Comments