Sunday, August 30, 2026
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Kidnapping in POCSO: नाबालिग मर्जी से जाए तो यह किडनैपिंग नहीं होगी…POCSO केस में यह एक अहम कानूनी स्पष्टीकरण, केस पढ़ें

Kidnapping in POCSO: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने किडनैपिंग (Kidnapping) और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण दिया।

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की बेंच ने 24 वर्षीय दीपक वैष्णव की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत का फैसला पलट दिया। देते हुए कहा है कि यदि कोई नाबालिग अपनी मर्जी से प्रेमी के साथ घर छोड़कर जाती है, तो इसे अपहरण नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने 20 साल की सजा काट रहे एक युवक को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

मामला क्या था? (The Background)

  • घटना: सितंबर 2022 में 15 वर्षीय एक लड़की स्कूल जाने के लिए घर से निकली, लेकिन वापस नहीं लौटी।
  • सफर: लड़की रास्ते में आरोपी से मिली और दोनों मुंगेली, रायपुर होते हुए हैदराबाद और फिर विजयवाड़ा पहुँच गए।
  • लिव-इन: वे लगभग एक महीने तक आगरापल्ली में एक किराए के कमरे में पति-पत्नी की तरह रहे।
  • निचली अदालत का फैसला: ट्रायल कोर्ट ने युवक को अपहरण और पॉक्सो एक्ट के तहत दोषी मानते हुए 20 साल जेल की सजा सुनाई थी।

हाई कोर्ट का कानूनी तर्क (Legal Reasoning)

A. अपहरण (Kidnapping) के लिए ‘उकसावा’ जरूरी

  • अदालत ने पाया कि किडनैपिंग का चार्ज लगाने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने लड़की को फुसलाया या मजबूर किया।
  • कोई दबाव नहीं: रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं था कि युवक ने लड़की को घर छोड़ने के लिए मजबूर किया या उकसाया।
  • स्वैच्छिक कदम: लड़की ने खुद स्वीकार किया था कि उसने ही भागने और साथ चलने का सुझाव दिया था। वह एक महीने तक बिना किसी विरोध या शिकायत के उसके साथ रही।

B. पॉक्सो (POCSO) के आरोपों पर संदेह

  • हालांकि लड़की ने शारीरिक संबंध बनाने की बात कही थी, लेकिन मेडिकल और फोरेंसिक रिपोर्ट ने अभियोजन (Prosecution) के दावों को कमजोर कर दिया।
  • मेडिकल रिपोर्ट: शारीरिक परीक्षण में किसी चोट की पुष्टि नहीं हुई और न ही यौन संबंध के बारे में कोई निश्चित राय दी गई।
  • FSL रिपोर्ट: फोरेंसिक रिपोर्ट भी नेगेटिव रही।
  • संदेह का लाभ: कोर्ट ने कहा कि इन कमियों के कारण मामले में गहरा संदेह पैदा होता है, और कानून का लाभ आरोपी को मिलना चाहिए।

‘सहमति’ बनाम ‘नाबालिग’ का पेंच

  • राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि लड़की नाबालिग थी, इसलिए उसकी सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है।
  • तथ्यों की परख: हाई कोर्ट ने साफ किया कि अपहरण के अपराध के लिए ‘बल’ (Force) या ‘लालच’ (Inducement) का होना अनिवार्य तत्व है।
  • इच्छाशक्ति: जब नाबालिग खुद घर से निकलकर आरोपी के पास जाती है और लंबी यात्रा के दौरान किसी से मदद नहीं मांगती, तो इसे अपहरण की श्रेणी में रखना न्यायसंगत नहीं है।

फैसले के मुख्य बिंदु

बिंदुविवरण
मुख्य आदेशआरोपी को सभी आरोपों से बरी (Acquitted) किया गया।
कोर्ट की टिप्पणीलड़की स्वेच्छा से आरोपी के साथ रही, कोई जबरदस्ती नहीं की गई।
सबूतों की स्थितिमेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्य पॉक्सो के आरोपों की पुष्टि करने में विफल रहे।
बचाव पक्षएडवोकेट सैयद माजिद अली ने आरोपी का पक्ष रखा।

न्याय का व्यक्तिगत मूल्यांकन

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह फैसला इस बात पर जोर देता है कि पॉक्सो और किडनैपिंग जैसे गंभीर मामलों में केवल उम्र को आधार बनाकर किसी को सजा नहीं दी जा सकती, बल्कि उस घटना के पीछे की परिस्थितियों और ठोस साक्ष्यों का मिलान करना भी अनिवार्य है।

HIGH COURT OF CHHATTISGARH AT BILASPUR
Hon’ble Shri Ramesh Sinha, Chief Justice
Hon’ble Shri Ravindra Kumar Agrawal, Judge
CRA No. 119 of 2024
Deepak Vaishnav
versus
State of Chhattisgarh

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