Wednesday, July 15, 2026
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Enforcement Directorate: भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ें, पर कानून के दायरे में रहकर…प्रवर्तन निदेशालय को अदालत से क्यों लगी फटकार, पढ़ें

Enforcement Directorate: प्रवर्तन निदेशालय द्वारा बिना किसी आधार अपराध (Predicate Offence) के सीधे छापेमारी और जब्ती करने के रवैये पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है।

हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने साफ किया कि ईडी केवल अपनी मर्जी से किसी का भी घर नहीं खंगाल सकती; कानून की सीमाएं और शर्तें सभी संवैधानिक व जांच एजेंसियों पर समान रूप से लागू होती हैं। अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए ईडी को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई यानी 22 जुलाई 2026 तक याचिकाकर्ताओं के खिलाफ किसी भी तरह की कठोर या बलपूर्वक कार्रवाई (Coercive Action) न की जाए।

यह रही अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा, आप भले ही भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने वाले (Crusader) महायोद्धा हों, लेकिन आपकी हर कार्रवाई कानून के दायरे में ही होनी चाहिए। यदि आपके भीतर किसी भी विभाग से भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने का सच्चा जज्बा है, तो उसे स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार ही करें; देश की कोई भी अदालत आपके काम में हस्तक्षेप नहीं करेगी। लेकिन ईडी को कोर्ट में आकर ऐसी कार्रवाई का बचाव करने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, जो प्रथम दृष्टया (Prima Facie) पूरी तरह से गैर-कानूनी और असमर्थनीय (Indefensible) है।

मामला क्या है?: लोकयुक्त का ट्रैप केस और ‘बिना कनेक्शन’ के ईडी की रेड

यह कानूनी विवाद कर्नाटक आबकारी विभाग (Excise Department) के एडिशनल कमिश्नर वाई. मंजूनाथ, उनकी पत्नी महादेवी मंजूनाथ (जो मंत्री सतीश जारकीहोली की बहन हैं) और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा है।

लोकायुक्त का मुख्य मामला: लोकायुक्त पुलिस ने आबकारी विभाग के एक अधिकारी ‘जगदीश नायक’ को ₹25 लाख की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। नायक के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) की धारा 7A के तहत मामला दर्ज हुआ।

ईडी की सीधी एंट्री: इस ट्रैप केस को आधार बनाकर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 23 जून को एक सर्च वारंट जारी किया। अगले ही दिन सुबह पौने सात बजे ईडी की टीमों ने मंजूनाथ परिवार के बेलगावी निवास पर धावा बोल दिया और लगभग 23 घंटे तक छापेमारी की।

गंभीर जब्ती: इस दौरान ईडी ने महादेवी मंजूनाथ के स्त्रीधन (सोने के गहने) को भी जब्त कर लिया, जबकि वे आयकर विभाग के रिकॉर्ड में पहले से घोषित थे। बेंगलुरु स्थित आवास पर भी 17 घंटे तक छापेमारी चली, जहां से मोबाइल, प्रॉपर्टी के दस्तावेज, ₹2 लाख कैश और करीब ₹3 लाख की विदेशी मुद्रा जब्त की गई।

याचिकाकर्ताओं की दलील: याचिकाकर्ताओं ने वरिष्ठ वकील प्रभु लिंग नवदगी के माध्यम से कोर्ट को बताया कि वे लोकायुक्त के रिश्वत मामले में न तो आरोपी हैं और न ही उनका उस मामले से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध है। बिना किसी ‘प्रेडिकेट ऑफेंस’ (मूल अपराध) के ईडी मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) के तहत अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल कर ‘फिशिंग इंक्वायरी’ (बिना सबूत अंधेरे में तीर चलाना) कर रही है।

“क्या आप लोकायुक्त का काम कर रहे हैं?”-कोर्ट के ईडी से तीखे सवाल

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागप्रसन्ना ने कानून के मूल सिद्धांतों का हवाला देते हुए ईडी के विशेष सरकारी वकील मधु एन. राव से कई कड़े और असहज करने वाले सवाल पूछे।

बिना प्रेडिकेट ऑफेंस के ईडी कैसे पहुंची?

“मनी लॉन्ड्रिंग का मामला बनने के लिए एक ‘मनी ट्रेल’ (पैसों के लेन-देन का सिंडिकेट) होना चाहिए। इन लोगों का आरोपी से क्या संबंध है? ये पूरी तरह से असंबद्ध लोग हैं। जब उनके खिलाफ कोई प्रेडिकेट ऑफेंस दर्ज ही नहीं है, तो आप उनके घर कैसे घुस गए? यह पूरी तरह समझ से परे (Unfathomable) है।”

क्या ₹25 लाख का ट्रैप केस ‘Proceeds of Crime’ बन गया?

कोर्ट ने पूछा कि लोकायुक्त का वह मामला केवल ₹25 लाख की रिश्वत का था। क्या वह राशि खुद-ब-खुद ‘अपराध की कमाई’ (Proceeds of Crime) बन गई? ईडी उस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है जिसने रिश्वत ली। लेकिन उससे पूरी तरह असंबद्ध लोगों पर इस तरह कार्रवाई कैसे की जा सकती है?

प्रेस रिलीज से अधिकार क्षेत्र तय नहीं होता

जस्टिस नागप्रसन्ना ने ईडी द्वारा जारी उस प्रेस रिलीज पर भी नाराजगी जताई जिसमें आबकारी विभाग में व्यापक भ्रष्टाचार का दावा किया गया था। कोर्ट ने तंज कसते हुए पूछा, कर्नाटक में लोकायुक्त जैसी एक बेहतरीन और सुस्थापित संस्था मौजूद है। क्या अब आप लोकायुक्त का काम भी खुद ही करने लगे हैं?

विधिक केस शीट: कर्नाटक हाई कोर्ट ईडी अधिकार क्षेत्र समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतरिम आदेश
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (High Court of Karnataka)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस एम. नागप्रसन्ना (Justice M Nagaprasanna)
याचिकाकर्तामहादेवी मंजूनाथ, वाई. मंजूनाथ व अन्य
मुख्य विधिक मुद्दाबिना प्रेडिकेट ऑफेंस के PMLA की धारा 17 (सर्च और जब्ती) का उपयोग।
अदालत का अंतरिम निर्देश22 जुलाई 2026 तक याचिकाकर्ताओं के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक।
याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकीलवरिष्ठ अधिवक्ता प्रभु लिंग नवदगी और के.एन. फणीन्द्र

अगर ईडी बिना किसी ठोस कड़ियों और सबूतों के केवल राजनीतिक या प्रशासनिक रसूखदारों के रिश्तेदारों पर हाथ डालने लगेगी, तो कानून का राज खतरे में पड़ जाएगा। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि उत्साह में आकर अधिकारों की सीमा लांघना न्यायपालिका बर्दाश्त नहीं करेगी। 22 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में ईडी को कोर्ट के इन तीखे विधिक सवालों का लिखित जवाब देना होगा।

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