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Judiciary vs Narrative: राजनेता तय नहीं करेंगे कि कौन सा जज उनका केस सुनेगा…केस से नहीं हटेंगे, केजरीवाल की कल्पना वाले केस को अंत तक पढ़ें

Judiciary vs Narrative: दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने आबकारी नीति (Excise Policy) मामले में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जजों की गरिमा पर बेहद कड़े और महत्वपूर्ण तर्क दिए।

एक घंटै तक मामले में फैसले को सुनाया गया

हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने स्पष्ट किया कि किसी मुकदमेबाज (Litigant) की निराधार आशंकाओं को संतुष्ट करने के लिए जज अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते। उन्होंने कहा कि किसी जज पर व्यक्तिगत हमला, पूरी न्यायपालिका पर हमला है। अरविंद केजरीवाल और अन्य AAP नेताओं की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने जज को इस केस की सुनवाई से हटने (Recusal) की मांग की थी। जस्टिस शर्मा ने करीब एक घंटे तक चले अपने फैसले में एक-एक बिंदुओं का वर्णन किया।

जज को जज नहीं कर सकता मुकदमेबाज

  • जस्टिस शर्मा ने फैसले में कुछ बहुत सख्त टिप्पणियाँ कीं।
  • संस्था की मर्यादा: “एक राजनीतिक नेता को बिना किसी आधार के एक संस्था (न्यायपालिका) को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। एक राजनेता सीमा पार करके जज की क्षमता का न्याय नहीं कर सकता।”
  • फोरम शॉपिंग की चेतावनी: जज ने चेतावनी दी कि अगर ऐसे दबाव में जज हटने लगे, तो यह ‘शक्तिशाली मुकदमेबाज़ों’ के लिए जजों और उनके परिवारों पर हमला करने और अपनी पसंद की बेंच चुनने (Forum Shopping) के दरवाजे खोल देगा।
  • सच्चाई बनाम सोशल मीडिया: उन्होंने कहा कि किसी झूठे आरोप को अगर कोर्ट या सोशल मीडिया पर 1,000 बार भी दोहराया जाए, तो वह सच नहीं बन जाता।
  • अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा के खिलाफ मुख्य रूप से तीन आपत्तियां उठाई थीं, जिन्हें जज ने सिरे से खारिज कर दिया।

केजरीवाल की आपत्तियों पर जज का जवाब

आपत्ति: पिछला फैसला- केजरीवाल का तर्क था कि जज ने पहले उनकी गिरफ्तारी को सही ठहराया था और सिसोदिया-कविता को राहत नहीं दी थी।
जवाब: जज ने कहा कि किसी न्यायिक फैसले की शुद्धता केवल ऊपरी अदालत तय कर सकती है, यह ‘पूर्वाग्रह’ (Bias) का आधार नहीं हो सकता।

आपत्ति: RSS से जुड़ाव का आरोप- केजरीवाल ने उनके एक कानूनी संगठन (Adhivakta Parishad) के कार्यक्रम में शामिल होने पर सवाल उठाया था।
जवाब: जस्टिस शर्मा ने कहा कि जज किसी ‘हाथीदांत की मीनार’ (Ivory Tower) में नहीं रहते। वकीलों के पेशेवर कार्यक्रमों में शामिल होना राजनीतिक जुड़ाव नहीं है।

आपत्ति: हितों का टकराव (Conflict of Interest)-आरोप था कि जज के बच्चे केंद्र सरकार के पैनल में हैं।
जवाब: जज ने इसे “बेहद आपत्तिजनक” बताया। उन्होंने कहा कि किसी मुकदमेबाज़ को यह तय करने का हक नहीं है कि जज के बच्चे अपना जीवन और करियर कैसे जिएं। बच्चों का करियर उनके माता-पिता के पद के कारण खत्म नहीं किया जा सकता।

एक अन्य मामले से हुईं अलग (Naresh Balyan Case)

दिलचस्प बात यह है कि जहाँ जस्टिस शर्मा ने आबकारी मामले से हटने से मना कर दिया, वहीं उसी दिन उन्होंने AAP के पूर्व विधायक नरेश बाल्यान की 2025 की एक जमानत याचिका (MCOCA केस) की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। उन्होंने इसका कोई विशेष कारण नहीं बताया और मामले को दूसरी बेंच को भेजने का निर्देश दिया।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
याचिकाकर्ताअरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, दुर्गेश पाठक, विजय नायर आदि।
विपक्षसॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (CBI की ओर से)।
जज का रुख“मैं पीछे नहीं हटूंगी (I will not recuse)।”
मूल मामलानिचली अदालत द्वारा केजरीवाल और अन्य को डिस्चार्ज (बहाल) करने के खिलाफ CBI की अपील।

संविधान के प्रति निष्ठा

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा का यह फैसला यह संदेश देता है कि अदालतें राजनीतिक विमर्श या सोशल मीडिया के दबाव में नहीं आएंगी। उन्होंने साफ कर दिया कि न्याय दबाव में झुकने में नहीं, बल्कि निष्पक्षता से अपना काम करने में है। अब वह CBI की उस याचिका पर सुनवाई जारी रखेंगी जिसमें निचली अदालत द्वारा केजरीवाल को दी गई राहत को चुनौती दी गई है।

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