Thursday, October 29, 2026
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Gender Equality in Succession: विधवाएं दोयम दर्जे की वारिस नहीं… संविधान से ऊपर प्रथा नहीं, इस ऐतिहासिक फैसले को जानें

Gender Equality in Succession: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने महिला अधिकारों और लैंगिक समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

एक व्यक्ति की याचिका को खारिज कर दिया

हाईकोर्ट जस्टिस निधि गुप्ता की बेंच ने एक व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसने अपने भाई की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी को संपत्ति का अधिकार देने का विरोध किया था। हाईकोर्ट ने मेव जनजाति (Meo Tribe) की उस पुरानी परंपरा को खारिज कर दिया है, जिसमें विधवाओं को संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा जाता था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान लागू होने के बाद ऐसी कोई भी प्रथा जो महिला और पुरुष वारिसों के बीच भेदभाव करती हो, उसे कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।

मामला क्या था? (The Property Dispute)

  • विवाद: याचिकाकर्ता के भाई की 2015 में मृत्यु हो गई थी (बेऔलाद)। भाई की विधवा ने संपत्ति का एक हिस्सा किसी तीसरे पक्ष को बेच दिया।
  • याचिकाकर्ता का तर्क: भाई का सगा भाई होने के नाते वह “निकटतम पुरुष संबंधी” (Nearest Male Collateral) है।
  • कबीलाई प्रथा: उसने ‘रिवाज-ए-आम’ और मेव जनजाति की कृषि परंपराओं का हवाला देते हुए दावा किया कि विधवा को केवल भरण-पोषण के लिए संपत्ति रखने का हक है, उसे बेचने या स्थायी मालिक बनने का कोई अधिकार नहीं है।
  • पितृवंशीय सिद्धांत (Agnatic Theory): याचिकाकर्ता का कहना था कि संपत्ति केवल पुरुष वंशजों में ही रहनी चाहिए।

कोर्ट का कड़ा प्रहार: संविधान के खिलाफ कोई रिवाज नहीं

  • हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को “पुरातन और भेदभावपूर्ण” करार देते हुए महत्वपूर्ण बातें कहीं।
  • अनुच्छेद 13 का हवाला: कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 13 के तहत ‘रूढ़िवादी कानून’ (Customary Law) भी ‘कानून’ की परिभाषा में आता है। इसलिए, यदि कोई रिवाज संविधान के मौलिक अधिकारों (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है, तो उसे सिविल कोर्ट द्वारा लागू नहीं किया जा सकता।
  • विधवा के हक: कोर्ट ने साफ किया कि विधवा को “दोयम दर्जे का वारिस” (Second-class heir) नहीं माना जा सकता। उसे अपने पति की संपत्ति पर पूरा कानूनी हक है।
  • व्यक्तिगत कानून बनाम प्रथा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता इसे ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ का मामला बताकर गुमराह कर रहा था, जबकि यह पूरी तरह से एक कथित ‘कबीलाई रिवाज’ पर आधारित था। पर्सनल लॉ और कस्टमरी लॉ दो अलग क्षेत्र हैं।

रिवाज साबित करने की कठिन शर्तें

  • कोर्ट ने यह भी बताया कि अगर कोई किसी रिवाज (Custom) के आधार पर दावा करता है, तो उसे क्या साबित करना होगा।
  • निरंतरता: यह साबित करना होगा कि वह रिवाज शुरू से ही बिना किसी रुकावट के लागू था। अगर विपक्षी पार्टी रिवाज टूटने के कुछ भी उदाहरण दे दे, तो उसकी वैधता खत्म हो जाती है।
  • संपत्ति की प्रकृति: यह साबित करना होगा कि संपत्ति पैतृक (Ancestral) थी।
  • कानूनी जरूरत: यह दिखाना होगा कि संपत्ति की बिक्री बिना किसी ‘कानूनी आवश्यकता’ (Legal Necessity) के की गई थी।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
पक्षकारभाई (याचिकाकर्ता) बनाम विधवा (प्रतिवादी)।
क्षेत्रहरियाणा का नूह (Nuh) क्षेत्र।
प्रथा का नामरिवाज-ए-आम (मेव जनजाति की कृषि परंपरा)।
अदालती रुखलैंगिक भेदभाव करने वाला कोई भी रिवाज असंवैधानिक है।
फैसलानिचली अदालत द्वारा विधवा के पक्ष में दिए गए आदेश को बरकरार रखा।

सामाजिक न्याय की जीत

यह फैसला न केवल मेव जनजाति की महिलाओं के लिए, बल्कि भारत की उन सभी समुदायों की महिलाओं के लिए एक सुरक्षा कवच है जहाँ सदियों पुरानी प्रथाओं के नाम पर उन्हें संपत्ति से बेदखल किया जाता रहा है। हाई कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि ‘अज्ञेयवादी वंश’ (Agnatic Descent) जैसे सिद्धांत आधुनिक संवैधानिक भारत में मान्य नहीं हैं।

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