Wednesday, September 9, 2026
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Graft Case Blow: पूर्व सीबीआई जज भी कानून के कटघरे में…व्हाट्सएप चैट और टाइमलाइन पर फंसा मामला, यह रहे बरी होेने के अहम कारण

Graft Case Blow: पंचकूला की एक विशेष सीबीआई अदालत ने एक बड़े फैसले में पूर्व सीबीआई जज सुधीर परमार और उनके भतीजे सहित पांच आरोपियों को भ्रष्टाचार के मामले में बरी (Discharged) कर दिया है।

अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश राजीव गोयल की अदालत ने सुधीर परमार, उनके भतीजे अजय परमार और रियल एस्टेट फर्मों के प्रतिनिधियों— रूप बंसल (M3M), अनिल भल्ला और ललित गोयल (IREO) को डिस्चार्ज कर दिया है। अदालत ने माना कि आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।

मामला क्या था? (The Allegations)

  • आरोप: सुधीर परमार पर आरोप था कि जब वह पंचकूला में विशेष सीबीआई और ईडी जज के रूप में तैनात थे, तब उन्होंने रियल एस्टेट डेवलपर्स (M3M और IREO ग्रुप) को उनके मामलों में फायदा पहुँचाने के बदले रिश्वत की मांग की थी।
  • ACB की कार्रवाई: अप्रैल 2023 में हरियाणा एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और आपराधिक साजिश (120-B) के तहत मामला दर्ज किया था। इसके बाद पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने परमार को निलंबित कर दिया था।

बचाव पक्ष की दलीलें: क्यों गिरे आरोप?

  • आरोपियों के वकीलों (एस.पी.एस. परमार और यवनीत ढाकला) ने कोर्ट में कई ऐसी दलीलें पेश कीं, जिन्होंने अभियोजन पक्ष (Prosecution) के केस की नींव हिला दी।
  • गायब सबूत (Missing Evidence): ACB ने दावा किया था कि रिश्वत की मांग व्हाट्सएप चैट के जरिए की गई थी। लेकिन बचाव पक्ष ने बताया कि खुद ACB ने स्वीकार किया कि ऐसी कोई चैट रिकवर नहीं की जा सकी।
  • समय का अंतर (Timeline Gap): आरोप था कि जज ने अपने भतीजे अजय को M3M में नौकरी दिलाने के लिए पद का दुरुपयोग किया। बचाव पक्ष ने साबित किया कि अजय ने दिसंबर 2020 में नौकरी जॉइन की थी, जबकि सुधीर परमार की पंचकूला में नियुक्ति नवंबर 2021 में हुई थी।
  • कोई फैसला नहीं लिया: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि जज परमार ने अपने कार्यकाल के दौरान M3M या उनके प्रमोटरों से जुड़ा कोई भी मामला न तो सुना और न ही उस पर कोई फैसला दिया।

कानूनी और प्रक्रियात्मक खामियाँ (Legal Flaws)

  • अदालत ने डिस्चार्ज अर्जी स्वीकार करते समय कुछ गंभीर कानूनी बिंदुओं पर गौर किया।
  • धारा 17A का उल्लंघन: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत किसी लोक सेवक के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले अनिवार्य पूर्व अनुमति (Prior Sanction) जरूरी है, जो इस मामले में शुरुआती स्तर पर नहीं ली गई थी।
  • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य: कथित इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के साथ ‘इंडियन एविडेंस एक्ट’ की धारा 65B का अनिवार्य सर्टिफिकेट नहीं था, जिससे उनकी कानूनी मान्यता संदिग्ध हो गई।
  • पुष्टि पूर्वाग्रह (Confirmation Bias): बचाव पक्ष ने आरोप लगाया कि पूरी जांच केवल एकतरफा सोच के साथ की गई थी, जिसमें तथ्यों की गहराई से जांच नहीं हुई।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मुख्य आरोपीसुधीर परमार (पूर्व विशेष सीबीआई जज)।
संबंधित फर्मेंM3M इंडिया और IREO ग्रुप।
अदालत का निर्णयडिस्चार्ज (मुकदमा चलाने लायक सबूत नहीं)।
जांच एजेंसीएंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB), पंचकूला।

न्यायपालिका की शुचिता और साक्ष्य का महत्व

यह मामला सुर्खियों में रहा क्योंकि इसमें खुद एक भ्रष्टाचार विरोधी अदालत (CBI Court) के जज पर भ्रष्टाचार के आरोप थे। हालांकि, पंचकूला कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि केवल आरोपों और पुष्टि न हो सकने वाली चैट्स के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी या व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

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