Tuesday, June 9, 2026
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NPA Case: बड़े कॉरपोरेट्स को आंख मूंदकर भारी-भरकम लोन देते हैं बैंक, आम आदमी के छोटे लोन के लिए उत्पीड़न की हद तक जाते हैं…यह है केस

NPA Case: देश की बैंकिंग प्रणाली के दोहरे रवैये और कर्ज देने के तौर-तरीकों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद तीखी और आंखें खोलने वाली टिप्पणी की है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, आमतौर पर बैंक बड़ी कंपनियों को करोड़ों रुपये का लोन देने में बेहद लापरवाही (Casual) बरतते हैं, लेकिन जब कोई आम आदमी अपनी निजी जरूरतों के लिए छोटे लोन के लिए जाता है, तो उस पर इतनी कड़ी शर्तें और उबाऊ प्रक्रियाएं थोप दी जाती हैं, जो कई मामलों में उत्पीड़न (Borderline Harassment) की हद तक पहुंच जाती हैं।

भारतीय स्टेट बैंक ने बगैर उचित वित्तीय मूल्यांकन दिया था लोन

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने ‘भास्कर इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कंपनी की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। इस मामले में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने बिना किसी उचित वित्तीय मूल्यांकन (Proper Assessment) के उक्त कंपनी को ₹8,09,00,000 (8.09 करोड़ रुपये) का भारी-भरकम लोन स्वीकृत कर दिया था।

छोटे लोन देने के लिए होती है कड़ी शर्त

अदालत ने बैंक की इस कार्यशैली पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा, अदालत के संज्ञान में यह बात आ रही है कि एसबीआई सहित तमाम बैंक बड़ी संस्थाओं को भारी मात्रा में लोन देने में बहुत लापरवाह हैं। लेकिन इसके विपरीत, जब आम लोग अपनी निजी जरूरतों के लिए छोटे लोन के लिए आते हैं, तो उनसे बहुत ज्यादा मांग की जाती है, उन्हें बेहद कड़ी शर्तों और एक थकाऊ प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यह कृत्य कुछ मामलों में सीमांत उत्पीड़न (Borderline Harassment) के समान हो सकता है।

क्या है पूरा मामला? (6 साल तक डिफॉल्ट और पहली ही किस्त में फेल)

लोन और तत्काल डिफॉल्ट: यह कानूनी विवाद बैंक और एक डिफ़ॉल्टर कंपनी के बीच संपत्तियों पर कब्जे को लेकर था। भास्कर इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड को एसबीआई ने साल 2019 में 8.09 करोड़ रुपये का लोन दिया था। लेकिन कंपनी की वित्तीय स्थिति इतनी खराब थी कि वह लोन की सबसे पहली किस्त (First Instalment) भी नहीं चुका सकी और खाता तुरंत एनपीए (NPA) घोषित हो गया।

6 साल बाद कार्रवाई: कंपनी लगातार 6 साल तक डिफ़ॉल्टर रही। इसके बाद साल 2024 में जिला मजिस्ट्रेट (DM) ने बैंक के पक्ष में कंपनी की अचल संपत्तियों को कब्जे में लेने का आदेश जारी किया। जनवरी 2025 में हाई कोर्ट ने भी इस आदेश के निष्पादन (Execution) को मंजूरी दे दी।

सुप्रीम कोर्ट का रुख: कंपनी ने हाई कोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। कंपनी के वकील नचिकेता जोशी ने दलील दी कि वे अब पूरा मूलधन (Principal Amount) चुकाने को तैयार हैं, इसलिए एनपीए की कार्रवाई मनमानी है। हालांकि, एसबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अर्चना पाठक दवे ने इसका कड़ा विरोध किया।

फटकार: सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी को फटकार लगाते हुए कहा कि 6 साल तक लगातार डिफॉल्ट करने के बाद अब मूलधन चुकाने का प्रस्ताव देने का कोई मतलब नहीं है और यह बहुत देर से उठाया गया कदम है। कोर्ट ने कंपनी की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया, लेकिन अंतिम राहत के रूप में दो सप्ताह तक संपत्तियों की यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने की अनुमति दी ताकि वे डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) जा सकें।

एसबीआई के अधिकारियों की साफ लापरवाही: अदालत

भले ही सुप्रीम कोर्ट ने डिफॉल्टर कंपनी को कोई राहत नहीं दी, लेकिन उसने एसबीआई के अधिकारियों को भी नहीं बख्शा। अदालत ने साफ किया कि लोन देने में बैंक अधिकारियों की आपराधिक लापरवाही साफ नजर आती है। मौजूदा मामले में हम पाते हैं कि एसबीआई और उसके अधिकारियों की ओर से याचिकाकर्ता कंपनी को ₹8,09,00,000/- का भारी लोन देने में लापरवाही बरती गई है। इसका कारण यह है कि याचिकाकर्ता पहली किस्त भी नहीं चुका सके और शुरुआत में ही डिफॉल्ट कर गए। यह इस बात का स्पष्ट संकेतक है कि संबंधित एसबीआई अधिकारियों द्वारा कर्जदार की पुनर्भुगतान क्षमता (Repayment Capacity) का कोई उचित मूल्यांकन ही नहीं किया गया था।

विश्लेषण: आरबीआई और बैंकों के लिए सुप्रीम कोर्ट के सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणियों का मतलब यह कतई नहीं है कि बैंक लोन देने के नियमों को ढीला कर दें, बल्कि उनका जोर प्रक्रिया को मानवीय और निष्पक्ष बनाने पर था।

विषयसुप्रीम कोर्ट की व्याख्या और निर्देश
नियमों में ढील नहीं, प्रक्रिया आसान होकोर्ट ने कहा, “हमारा मतलब लोन सुविधाओं के लिए मानदंडों और आवश्यकताओं को आसान बनाना बिल्कुल नहीं है, यह काम रिज़र्व बैंक (RBI) और संबंधित बैंकों पर ही छोड़ना सबसे अच्छा है। लेकिन जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसे लोन चाहने वालों के लिए निश्चित रूप से आसान और अधिक निष्पक्ष (Fairer) बनाया जा सकता है, और यही बात रिकवरी के चरण में भी लागू होनी चाहिए।”
निचले पायदान के लोगों को मिले लाभपीठ ने कहा कि लोन पर रियायतें और प्रोत्साहन देने से जुड़ी नीतियां इस तरह बनाई जानी चाहिए, जिससे सामाजिक और वित्तीय पिरामिड के सबसे निचले पायदान (Lowest Rung) पर बैठे व्यक्ति को अधिकतम लाभ मिल सके।
एसबीआई को संदेशसुप्रीम कोर्ट ने एएसजी अर्चना पाठक दवे से कहा कि वे अपने उच्च पद और प्रभाव का उपयोग करें और अदालत के इन रचनात्मक सुझावों को भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के शीर्ष प्रबंधन तक पहुंचाएं।
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