Police Tampering: उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की एक अदालत ने पुलिसिया कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए पुलिसकर्मियों के खिलाफ ही FIR दर्ज करने का आदेश दिया है।
अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) मनीष कुमार सिंह की अदालत ने पुलिस की उस जालसाजी को पकड़ा, जहां एक युवती के पक्ष में दिए गए बयान को उसकी मर्जी के खिलाफ दिखाने की कोशिश की गई थी। अदालत ने पाया कि पुलिस ने एक युवती के बयान में हेरफेर (Tampering) करके आरोपी को झूठा फंसाने की कोशिश की।
मामला क्या था? (The Twist in the Tale)
- घटना: जलालाबाद थाना क्षेत्र की एक युवती अपनी मर्जी से एक युवक के साथ चली गई थी। पुलिस ने उन्हें राजस्थान के खाटू श्याम से बरामद किया।
- अदालत में पेशी: 16 अप्रैल को पुलिस ने युवती को कोर्ट में पेश किया। युवती ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह अपनी मर्जी से गई थी।
- पुलिस की हेराफेरी: जब अदालत ने पुलिस रिकॉर्ड की जांच की, तो पाया कि आधिकारिक दस्तावेजों में युवती के बयान के बीच में “नहीं” (not) शब्द डाल दिया गया था। यानी बयान को बदलकर “मैं अपनी मर्जी से नहीं गई थी” कर दिया गया।
वीडियो सबूत ने खोली पोल
- अदालत ने केवल कागजों पर भरोसा करने के बजाय आधुनिक तकनीक और साक्ष्यों का सहारा लिया।
- वीडियो रिकॉर्डिंग: कोर्ट ने जांच अधिकारी संजीव कुमार और उप-निरीक्षक काजल को युवती के बयान का वीडियो पेश करने का निर्देश दिया।
- सच्चाई आई सामने: वीडियो देखने पर साफ हो गया कि युवती ने कहीं भी “नहीं” शब्द का प्रयोग नहीं किया था और वह स्वेच्छा से जाने की बात कह रही थी।
कोर्ट का सख्त फैसला: SP को जांच के आदेश
- अदालत ने पुलिस की इस हरकत को न्याय प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ माना।
- कारण बताओ नोटिस: पहले कोर्ट ने जलालाबाद SHO और दो सब-इंस्पेक्टर्स को नोटिस जारी किया।
- असंतोषजनक जवाब: पुलिसकर्मियों के जवाब से संतुष्ट न होने पर, कोर्ट ने शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) को जांच करने और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| अदालत | ACJM मनीष कुमार सिंह, शाहजहांपुर। |
| आरोप | पुलिस द्वारा बयान में हेरफेर (Forgery in Statement)। |
| मुख्य सबूत | युवती के बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग। |
| कार्रवाई | जांच अधिकारी और सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ FIR का आदेश। |
खाकी की साख पर सवाल
यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस के कुछ कर्मियों द्वारा की जाने वाली गंभीर लापरवाही और साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की प्रवृत्ति को उजागर करता है। यदि अदालत ने वीडियो साक्ष्य की मांग न की होती, तो एक निर्दोष व्यक्ति को गलत बयान के आधार पर जेल जाना पड़ सकता था। यह फैसला यह भी याद दिलाता है कि बयान दर्ज करने की वीडियो रिकॉर्डिंग पुलिस की मनमानी को रोकने के लिए कितनी अनिवार्य है।

