Monday, June 8, 2026
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Mamta Banerjee: स्पीकर का फैसला संसदीय नियमों के खिलाफ…रीताब्रत बनर्जी को नेता विपक्ष मान्यता देने के खिलाफ टीएमसी का एक्शन, पढ़िए मामला

Mamta Banerjee: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब एक अभूतपूर्व आंतरिक बगावत और कानूनी लड़ाई के दौर से गुजर रही है।

अदालत ने टीएमसी की याचिका खारिज कर दी

विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) रथींद्र बोस द्वारा बागी नेता रीताब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में मान्यता देने के फैसले को टीएमसी ने कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती दी है। टीएमसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शीर्षन्य बंदोपाध्याय ने इस मामले को जस्टिस कृष्ण राव की पीठ के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए पेश (Mention) किया। अदालत याचिका को स्वीकार करते हुए इस पर आगामी 11 जून 2026 को सुनवाई करने के लिए सहमत हो गई है।

क्या है पूरा विवाद? (पार्टी में विभाजन और विधायकों का गणित)

हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी को करारी हार का सामना करना पड़ा है। राज्य की 294 सीटों में से भाजपा ने 207 सीटों पर प्रचंड जीत दर्ज की, जबकि टीएमसी महज 80 विधायकों पर सिमट कर मुख्य विपक्षी दल बनी। विवाद तब शुरू हुआ जब मुख्य विपक्षी दल होने के नाते नेता प्रतिपक्ष (LoP) चुनने की बारी आई।

ममता बनर्जी की पसंद: टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने की सिफारिश विधानसभा अध्यक्ष से की थी।

रीताब्रत बनर्जी का ‘तख्तापलट’: इसी बीच टीएमसी विधायक दल के भीतर एक बहुत बड़ा गुट अलग हो गया। बागी नेता रीताब्रत बनर्जी ने चौंकाने वाला दावा करते हुए 58 टीएमसी विधायकों के समर्थन का पत्र स्पीकर को सौंप दिया।

स्पीकर का फैसला: चूंकि रीताब्रत के पास कुल 80 में से 58 विधायकों (दो-तिहाई से अधिक) का भारी बहुमत था, इसलिए विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने ममता बनर्जी की सिफारिश को दरकिनार कर रीताब्रत बनर्जी को आधिकारिक रूप से नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में मान्यता दे दी।

स्पीकर ने मनमानी की” बनाम “टीएमसी का अपना संविधान दोषपूर्ण

इस फैसले के बाद टीएमसी के भीतर हड़कंप मच गया और पार्टी नेतृत्व ने इस फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने का मन बनाया।

TMC का स्टैंड (संसदीय मानदंडों का उल्लंघन): टीएमसी सांसद और वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी ने कहा कि स्पीकर का यह फैसला पूरी तरह से स्थापित संसदीय प्रक्रियाओं, नियमों और परंपराओं के खिलाफ है। पार्टी का कहना है कि आधिकारिक पार्टी नेतृत्व द्वारा तय किए गए नाम (शोभनदेव) को ही मान्यता मिलनी चाहिए थी।

स्पीकर का बचाव: दूसरी ओर, विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि रीताब्रत बनर्जी के गुट के पास आवश्यक संख्या बल (Numerical Strength) मौजूद है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि टीएमसी द्वारा बागी विधायकों के खिलाफ जो निष्कासन (Expulsion) की प्रक्रिया शुरू की गई थी, वह खुद टीएमसी के अपने संगठनात्मक संविधान की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं थी।

विश्लेषण: फर्जी हस्ताक्षर विवाद और अदालती समीक्षा

यह राजनीतिक लड़ाई केवल विधानसभा के भीतर ही नहीं, बल्कि आपराधिक जांच के दायरे में भी पहुंच चुकी है, जिसने मामले को और पेचीदा बना दिया है।

विवाद का मुख्य पहलूवर्तमान स्थिति और कानूनी पेच
फर्जी हस्ताक्षर (Forged Signatures)शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त करने के लिए जो शुरुआती प्रस्ताव विधानसभा में भेजा गया था, उसमें कुछ विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर होने के आरोप लगे हैं, जो एक अलग आपराधिक जांच का विषय है।
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)टीएमसी ने हाई कोर्ट से मांग की है कि वह विधानसभा अध्यक्ष के इस फैसले की न्यायिक समीक्षा करे और रीताब्रत बनर्जी की नियुक्ति को अवैध घोषित कर शोभनदेव को मान्यता दिलाए।
दलबदल कानून (Anti-Defection)यदि 58 विधायक बागी हुए हैं, तो यह संख्या कुल 80 विधायकों का लगभग 72% (दो-तिहाई से अधिक) है, जो दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने के लिए पर्याप्त हो सकती है।
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