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Consensual Relations: रिश्ता कड़वा होने पर उसे दुष्कर्म कहना गलत…प्रेम संंबंध के खराब होने पर आपराधिक रंग की चली परंपरा वाले केस समझें

Consensual Relations: दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने शादी के झूठे वादे के आधार पर दर्ज दुष्कर्म के एक मामले में आरोपी को बरी कर दिया है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) विशाल पाहुजा ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह मामला लगभग तीन साल तक चले एक सहमतिपूर्ण (Consensual) प्रेम संबंध का था, जिसे रिश्ता टूटने के बाद आपराधिक रंग देने की कोशिश की गई। अगस्त 2025 में दर्ज इस मामले में आरोपी सितंबर से न्यायिक हिरासत में था। अदालत ने पाया कि 27 वर्षीय पीड़िता ने अपनी इच्छा और प्रेम के चलते शारीरिक संबंध बनाए थे, न कि किसी दबाव या धोखे में।

सहमति बनाम शादी का वादा (Consent vs Promise of Marriage)

  • अदालत ने मामले में सहमति की कानूनी सीमा को रेखांकित किया।
  • स्वेच्छा से संबंध: अभियोजन पक्ष के सबूत दिखाते हैं कि पीड़िता ने प्यार और लगाव के कारण आरोपी के साथ संबंध बनाए। उसने केवल इसलिए सहमति नहीं दी क्योंकि उसने शादी का वादा किया था, बल्कि इसलिए क्योंकि वह खुद भी ऐसा चाहती थी।
  • मैच्योरिटी (परिपक्वता): कोर्ट ने नोट किया कि पीड़िता 27 वर्ष की एक समझदार महिला है। उसे अपने कार्यों के परिणामों का पूरा पता था। यह नहीं माना जा सकता कि वह इतनी नासमझ थी कि उसे शारीरिक संबंधों के परिणामों की जानकारी न हो।

FIR में ‘अस्पष्ट’ देरी (Fatal Delay in FIR)

  • कोर्ट ने इस मामले में शिकायत दर्ज कराने में हुई भारी देरी को अभियोजन पक्ष के लिए घातक माना।
  • देरी का कारण नहीं: पीड़िता का आरोप था कि दिसंबर 2022 से जून 2025 तक उसके साथ दुष्कर्म हुआ, लेकिन उसने अगस्त 2025 तक शिकायत नहीं की। वह इस देरी का कोई ठोस कारण नहीं बता सकी।
  • बदले की भावना? जज ने कहा कि संबंध कड़वे होने के बाद FIR दर्ज कराना इस संभावना को जन्म देता है कि आरोपी को झूठा फंसाया गया हो।

गर्भपात (Miscarriage) के आरोपों पर मेडिकल साक्ष्य का अभाव

  • महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसे दवा खिलाकर गर्भपात कराया। कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
  • कोई सबूत नहीं: कोर्ट ने कहा, मेडिकल दस्तावेज केवल गर्भावस्था की पुष्टि करते हैं, लेकिन कहीं भी आरोपी का नाम पिता के रूप में या गर्भपात के जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में नहीं है।
  • डॉक्टर की गवाही नहीं: पीड़िता ने किसी ऐसे डॉक्टर की गवाही नहीं कराई जिसने यह पुष्टि की हो कि गर्भपात किसी दवा के सेवन से हुआ था।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
रिश्ते की अवधिलगभग 3 साल (दिसंबर 2022 से जून 2025)।
आरोपी की स्थितिसितंबर 2025 से अप्रैल 2026 तक जेल में रहा।
सोशल मीडिया नैरेटिवबचाव पक्ष के अनुसार, केस को ‘लव जिहाद’ का रंग देने की कोशिश की गई थी।
कोर्ट की मुख्य टिप्पणी“बिना किसी ठोस कारण के FIR में देरी अभियोजन के केस को कमजोर करती है।”
गवाहों की कमीपीड़िता की माँ, जो एक महत्वपूर्ण गवाह हो सकती थीं, उनका बयान दर्ज नहीं किया गया।

प्रेम संबंधों का अपराधीकरण

दिल्ली कोर्ट का यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल है जहां लंबे समय तक चले सहमतिपूर्ण संबंधों के टूटने के बाद उसे दुष्कर्म की धारा में बदलने की कोशिश की जाती है। अदालत ने साफ कर दिया कि कानून का इस्तेमाल निजी प्रतिशोध या ‘रिश्ता खराब होने के गुस्से’ को शांत करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

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