Tuesday, August 11, 2026
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Electricity Tariff: उपभोक्ता बिजली कंपनी को सेवा के लिए भुगतान कर रही…सेवा नहीं तो पैसा किस बात का, सभी बिजली उपभोक्ता खबर जरूर देखें

Electricity Tariff: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने उपभोक्ताओं के पक्ष में एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

मामले का सारांश (Quick Review)

विवरणतथ्य
पावर प्लांटरिठाला कंबाइंड साइकिल पावर प्लांट (दिल्ली)।
संचालकटाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (TPDDL)।
विवाद का विषय15 साल के मूल्यह्रास (Depreciation) की वसूली।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णयकेवल सेवा प्रदान की गई अवधि (6 वर्ष) तक की वसूली की अनुमति।
मुख्य सिद्धांतसेवा की अनुपस्थिति में उपभोक्ता से शुल्क नहीं लिया जा सकता।

दिल्ली विद्युत नियामक आयोग के बिजली टैरिफ को लेकर सुनवाई

कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ग्राहकों को उस सेवा के लिए भुगतान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जो उन्हें अब मिल ही नहीं रही है। कोर्ट ने दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (DERC) की अपील को स्वीकार करते हुए रिठाला पावर प्लांट से जुड़े बिजली शुल्कों (Tariff) के मामले में यह व्यवस्था दी। बिजली शुल्क का निर्धारण केवल गणितीय गणना नहीं, बल्कि उपभोक्ता हितों और उपयोगिता लागतों के बीच एक “नियामक संतुलन” (Regulatory Balancing Act) है। यह मामला टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (TPDDL) के रिठाला स्थित 108 मेगावाट के गैस-आधारित पावर प्लांट से संबंधित है, जिसे विशेष रूप से 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth Games) के दौरान बिजली आपूर्ति के लिए बनाया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि: 6 साल बनाम 15 साल

  • उद्देश्य: इस प्लांट को अस्थाई रूप से 5 से 6 साल के लिए स्थापित किया गया था ताकि दिल्ली में बिजली की तत्कालीन कमी को पूरा किया जा सके।
  • विवाद: TPDDL ने तर्क दिया कि चूंकि प्लांट का तकनीकी जीवन (Useful Life) 15 साल है, इसलिए इसकी पूरी निर्माण लागत (Capital Cost) की वसूली 15 वर्षों के मूल्यह्रास (Depreciation) के माध्यम से उपभोक्ताओं से की जानी चाहिए।
  • DERC का रुख: नियामक आयोग ने केवल मार्च 2018 तक (लगभग 6 साल) के मूल्यह्रास की अनुमति दी थी, क्योंकि उसके बाद प्लांट ने बिजली की आपूर्ति बंद कर दी थी।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य कानूनी बिंदु

  • अदालत ने बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 61 की व्याख्या करते हुए अहम बातें कहीं।
  • उपभोक्ता कल्याण सर्वोपरि: धारा 61(d) स्पष्ट करती है कि शुल्क निर्धारण का मार्गदर्शन उपभोक्ता हितों की सुरक्षा से होना चाहिए। यह कोई गौण विचार नहीं बल्कि कानून का “केंद्रीय सिद्धांत” है।
  • सेवा नहीं तो शुल्क नहीं: कोर्ट ने कहा कि चूंकि मार्च 2018 के बाद उपभोक्ताओं को इस प्लांट से बिजली नहीं मिली, इसलिए उनसे इसकी लागत वसूलना अनुचित है।
  • अनुबंध की सीमा: पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) केवल 6 वर्षों के लिए स्वीकृत था। TPDDL ने अगस्त 2017 के उस आदेश को चुनौती नहीं दी थी जिसमें PPA की अवधि मार्च 2018 तक सीमित की गई थी।

APTEL के आदेश को पलटना

सुप्रीम कोर्ट ने विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) के फरवरी 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने DERC को निर्देश दिया था कि वह प्लांट की पूरी लागत (लगभग ₹94.59 करोड़ शेष) को 15 साल की अवधि में वसूलने की अनुमति दे। कोर्ट ने DERC के नवंबर 2019 के मूल आदेश को पूरी तरह बहाल कर दिया।

उपभोक्ताओं के लिए बड़ी जीत

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश भर के बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक सुरक्षा कवच है। यह सुनिश्चित करता है कि बिजली कंपनियां अपनी तकनीकी गणनाओं या निवेश की दुहाई देकर उन सेवाओं का बोझ जनता पर नहीं डाल सकतीं, जिनका लाभ जनता को मिल ही नहीं रहा है।

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