RTI By Minors: केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सूचना का अधिकार (RTI) कानून नाबालिगों को जानकारी मांगने से नहीं रोकता।
आयोग का निष्कर्ष (Final Verdict)
| मुख्य बिंदु | आयोग का निर्णय |
| क्या नाबालिग RTI लगा सकता है? | हाँ, RTI एक्ट नाबालिगों को प्रतिबंधित नहीं करता। |
| जरूरी दस्तावेज | अभिभावक होने का प्रमाण या माता-पिता द्वारा अधिकृत पत्र। |
| शिकायत खारिज होने का कारण | ‘Locus Standi’ (कार्यवाही में शामिल होने का अधिकार) और प्रतिनिधित्व के प्रमाण की कमी। |
| सीख | बिना उचित प्राधिकरण के नाबालिग के नाम का उपयोग कानूनी कार्यवाही के लिए नहीं किया जा सकता। |
वैध अभिभावक का प्रमाण होना अनिवार्य
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी नाबालिग के नाम पर कार्यवाही शुरू करने के लिए वैध अभिभावक (Guardianship) या प्राधिकरण (Authorisation) का प्रमाण होना अनिवार्य है। आयोग ने एक 4 वर्षीय बच्ची के नाम पर दायर 5 शिकायतों को इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि उन्हें दाखिल करने वाले व्यक्ति (बच्ची के दादा) के पास कानूनी प्रतिनिधित्व का कोई प्रमाण नहीं था। यह मामला ‘एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया’ (AWBI) से संबंधित था, जहाँ एक 4 वर्षीय नाबालिग बच्ची के नाम से 5 अलग-अलग RTI आवेदन दाखिल किए गए थे।
RTI में क्या जानकारी मांगी गई थी?
इन आवेदनों के जरिए जानवरों से जुड़े गंभीर और तकनीकी सवाल पूछे गए थे, जैसे जानवरों के फिटनेस प्रमाणपत्र और परिवहन परमिट। एनिमल वेलफेयर बोर्ड (AWBI) का खर्च और कार्यप्रणाली। सर्कस के जानवरों के पुनर्वास की रिपोर्ट और पशु क्रूरता के खिलाफ की गई कार्रवाई। याक और ऊंटों के उपचार और पशु कल्याण योजनाओं के कार्यान्वयन का विवरण।
आयोग (CIC) का मुख्य तर्क: ‘लोकस स्टैंडी’ का अभाव
- सूचना आयुक्त ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि ये आवेदन वास्तव में बच्ची के दादा द्वारा उसकी पहचान का उपयोग करके दायर किए गए थे।
- नाबालिग का अधिकार: RTI अधिनियम, 2005 भारत के हर ‘नागरिक’ को जानकारी मांगने का अधिकार देता है। इसमें उम्र की कोई सीमा नहीं है, इसलिए एक नाबालिग भी तकनीकी रूप से “नागरिक” है।
- कानूनी क्षमता (Legal Capacity): चूंकि एक 4 साल का बच्चा स्वतंत्र रूप से कानूनी कार्यवाही नहीं कर सकता, इसलिए उसकी ओर से पैरवी करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि वह उसका प्राकृतिक या कानूनी अभिभावक है।
- प्रमाण का अभाव: इस मामले में, शिकायतकर्ता (दादा) ने माता-पिता (प्राकृतिक अभिभावक) से कोई आधिकारिक अनुमति पत्र या अपनी कानूनी अभिभावकता का प्रमाण पेश नहीं किया।
सूचना’ बनाम ‘स्पष्टीकरण
AWBI (विपक्षी दल) ने यह भी दलील दी कि आवेदक द्वारा पूछे गए सवाल बहुत व्यापक और अस्पष्ट थे। वे ‘जानकारी’ (जो रिकॉर्ड पर उपलब्ध हो) मांगने के बजाय बोर्ड से ‘स्पष्टीकरण’ या ‘स्पष्टता’ मांग रहे थे। लोक सूचना अधिकारी (CPIO) केवल वही डेटा दे सकता है जो रिकॉर्ड में मौजूद हो, वह जानकारी “बनाने या संकलित करने” के लिए बाध्य नहीं है।
अधिकारों का दुरुपयोग या जागरूकता?
CIC का यह आदेश एक संतुलन बनाने की कोशिश है। जहाँ एक ओर यह बच्चों के नागरिक अधिकारों को मान्यता देता है, वहीं दूसरी ओर यह सुनिश्चित करता है कि वयस्क लोग कानूनी पेचीदगियों से बचने या सिस्टम को परेशान करने के लिए नाबालिगों के नाम का ढाल की तरह उपयोग न करें।

