Legal Age: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अंतरधार्मिक (Interfaith) जोड़े को सुरक्षा देने से इनकार कर दिया है।
कोर्ट द्वारा तय किए गए मुख्य सिद्धांत
| विवरण | कोर्ट का निष्कर्ष |
| लिव-इन की वैधता | यदि विवाह कानूनन वर्जित है, तो लिव-इन को उसका ‘विकल्प’ नहीं माना जा सकता। |
| सुरक्षा का अधिकार | हिंसा या अवैध हिरासत के खिलाफ सुरक्षा उपलब्ध है, लेकिन रिश्ते को ‘वैधता’ नहीं। |
| अभिभावकों का हक | बाल विवाह रोकने के लिए अभिभावक कानूनी कदम उठाने के लिए स्वतंत्र हैं। |
| याचिका का परिणाम | खारिज (क्योंकि धमकियों के आरोप अस्पष्ट और बिना सबूत के थे)। |
महिला व पुरुष ने दायर की थी याचिका
जस्टिस गरिमा प्रसाद की पीठ ने कहा कि जो रिश्ता कानूनन विवाह के रूप में वर्जित है, उसे लिव-इन का नाम देकर सुरक्षा प्रदान करना “विवाह के समान व्यवस्था” को अप्रत्यक्ष रूप से मंजूरी देने जैसा होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 19 वर्ष के पुरुष को कानूनन ‘बच्चा’ माना जाता है और ऐसे में लिव-इन रिलेशनशिप को विवाह के “विकल्प” के रूप में इस्तेमाल कर कानूनी वैधता नहीं दी जा सकती। यह याचिका एक 20 वर्षीय महिला और 19 वर्षीय पुरुष द्वारा दायर की गई थी, जो लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे और अपने परिजनों के हस्तक्षेप से सुरक्षा की मांग कर रहे थे।
19 साल का पुरुष: विवाह बनाम लिव-इन
- कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप की वैधता और कानूनी उम्र के बीच संबंध को स्पष्ट किया।
-कानूनी उम्र का उल्लंघन: कानून के अनुसार, पुरुष के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है। चूंकि याचिकाकर्ता की उम्र अभी 19 साल है, इसलिए वह विवाह के योग्य नहीं है। - अप्रत्यक्ष मंजूरी नहीं: कोर्ट ने कहा, “यदि कानून 21 वर्ष की आयु पूरी होने तक विवाह की अनुमति नहीं देता है, तो अदालत उसी परिणाम को लिव-इन रिलेशनशिप के रूप में न्यायिक समर्थन देकर प्राप्त नहीं कर सकती।”
‘सहमति’ बनाम कानूनी क्षमता
- अदालत ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया।
- बच्चे की परिभाषा: बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत, 21 वर्ष से कम आयु के पुरुष को ‘बच्चा’ माना जाता है।
- सहमति की सीमा: जैसे 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की की सहमति को विवाह के लिए मान्यता नहीं दी जाती (चाहे वह POCSO का मामला हो), वैसे ही 21 वर्ष से कम उम्र के लड़के की सहमति का उपयोग कानूनी प्रतिबंध को बायपास करने के लिए नहीं किया जा सकता।
- विवाह का विकल्प: कोर्ट के अनुसार, इस मामले में लिव-इन रिलेशनशिप का उपयोग केवल इसलिए किया जा रहा था क्योंकि कानून उन्हें अभी शादी करने की अनुमति नहीं देता।
माता-पिता और कानून का अधिकार
- अदालत ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा न देने का मतलब हिंसा की अनुमति देना नहीं है।
- कानूनी कदम: माता-पिता, अभिभावक या ‘बाल विवाह निषेध अधिकारी’ को बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत कानूनी कदम उठाने से नहीं रोका जा सकता।
- सीमित सुरक्षा: यदि जोड़े के साथ कोई वास्तविक हिंसा, अवैध हिरासत या अपहरण जैसा कृत्य होता है, तो वे कानून के तहत सुरक्षा के हकदार हैं। लेकिन सामान्य लिव-इन व्यवस्था को ‘संवैधानिक संरक्षण’ देना संभव नहीं है।
सामाजिक व्यवस्था और कानून का संतुलन
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उन जोड़ों के लिए एक चेतावनी है जो उम्र की कानूनी बाधा को पार करने के लिए लिव-इन रिलेशनशिप का सहारा लेते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उपयोग वैधानिक कानूनों (जैसे विवाह की आयु) को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता।

