Monday, August 10, 2026
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Siwane River: 1000 बागों का शहर अब धूसर कब्रगाह बना…इस तरह हजारीबाग जिले के सीवाने नदी के पास हुआ हाल, जानें खनन की स्थिति व निर्देश

Siwane River: झारखंड हाई कोर्ट ने हजारीबाग जिले में हो रहे अवैध खनन और क्रशर संचालन पर कड़ा प्रहार करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

हेमंत कुमार शिखरवार की जनहित याचिका

मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की पीठ ने हजारीबाग के गौरवशाली इतिहास और वर्तमान की बदहाली का जिक्र करते हुए कहा कि हजार बागों के शहर को धूसर कब्रगाह (Graveyard of Grey) में तब्दील किया जा रहा है। अदालत ने तत्काल प्रभाव से सभी अवैध खनन गतिविधियों पर रोक लगाने और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए हैं। यह मामला 2013 में हेमंत कुमार शिखरवार द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा है, जिसमें हजारीबाग की सीवाने नदी के आसपास अवैध खनन, प्रदूषण और अधिकारियों की मिलीभगत के आरोप लगाए गए थे।

पारिस्थितिक गिरावट की दुखद तस्वीर

  • अदालत ने हजारीबाग (फारसी शब्द ‘हज़ार’ और ‘बाग’ से व्युत्पन्न) के ऐतिहासिक महत्व को याद करते हुए टिप्पणी की।
  • ऐतिहासिक विरासत: कैप्टन रॉबर्ट स्मिथ के सर्वेक्षणों के अनुसार, यह क्षेत्र कभी घने जंगलों और घाटियों से घिरा था जहाँ बाघ, तेंदुए और भालू सुरक्षित रहते थे।
  • वर्तमान वास्तविकता: आज पत्थर खनन ने पहाड़ियों को घायल कर दिया है। ‘बागों’ की जगह ‘खतरनाक गड्ढों’ ने ले ली है।
  • वनस्पतियों का दम घुट रहा है: कोर्ट ने कहा कि पत्थर की धूल पौधों के रंध्रों (Stomata) को बंद कर देती है, जिससे उनकी प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया रुक जाती है। यह एक हरा-भरा अभयारण्य अब राख के रंग की कब्रगाह जैसा दिखता है।

अनुच्छेद 21: स्वच्छ पर्यावरण का मौलिक अधिकार

  • हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों (जैसे एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया।
  • जीवन का अधिकार: स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है।
  • डेथ ट्रैप (मौत के जाल): खनन के बाद छोड़े गए बिना बाड़ वाले गड्ढे बारिश के पानी से भर जाते हैं और ग्रामीणों व बच्चों के लिए ‘डेथ ट्रैप’ बन गए हैं।

प्रवर्तन एजेंसियों की विफलता पर फटकार

  • कोर्ट ने राज्य के खनन विभाग, पुलिस और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
  • तकनीक का दुरुपयोग: सैटेलाइट इमेजरी, जीआईएस मैपिंग और जीपीएस ट्रैकिंग जैसी ‘डिजिटल आंखें’ होने के बावजूद कार्रवाई न करना “जानबूझकर आंखें मूंद लेना” है।
  • खुली धोखाधड़ी: कोर्ट ने पूछा कि भारी मशीनरी और सार्वजनिक सड़कों पर चलने वाले परिवहन के बावजूद यह गतिविधियां गुप्त रूप से कैसे चल सकती हैं? यह स्पष्ट रूप से अधिकारियों की मिलीभगत को दर्शाता है।

कोर्ट के मुख्य दिशा-निर्देश (Binding Directions)

  • 13 साल पुराने इस मामले का निपटारा करते हुए अदालत ने कड़े निर्देश दिए हैं।
  • सत्यापन तक रोक: जब तक जिला स्तरीय टास्क फोर्स (DLTF) सभी अनुमतियों और अनुपालन रिकॉर्ड का सत्यापन नहीं कर लेती, तब तक कोई भी खनन या क्रशर गतिविधि नहीं चलेगी।
  • बफर जोन का नियम: हजारीबाग वन्यजीव अभयारण्य के 1 किलोमीटर के भीतर कोई गतिविधि नहीं होगी। वनों से 500 मीटर और क्रशर के लिए 400 मीटर की दूरी अनिवार्य है।
  • Polluter Pays (प्रदूषक भुगतान): प्रदूषण बोर्ड को निर्देश दिया गया है कि वह दोषी इकाइयों पर जुर्माना लगाए और उनके खिलाफ मुकदमा चलाए।
  • पब्लिक हेल्पलाइन: अवैध खनन की शिकायतों के लिए 4 सप्ताह के भीतर एक समर्पित हेल्पलाइन और ईमेल पता जारी किया जाए।
  • रिकवरी: अवैध रूप से निकाले गए खनिजों की कीमत दोषियों से वसूल की जाए।

भविष्य की सुरक्षा

हाई कोर्ट ने चेतावनी दी है कि चार महीने के भीतर वरिष्ठ जिला अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। यह फैसला न केवल हजारीबाग बल्कि पूरे झारखंड के लिए एक नजीर है कि विकास के नाम पर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की बलि नहीं दी जा सकती।

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