Wife’s Right: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा, यदि कोई पति किसी दूसरी महिला के साथ रह रहा है, तब भी वह अपनी पहली पत्नी को घर व गुजारा भत्ता देगा।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| विवरण | तथ्य |
| पक्षकार | सेवानिवृत्त नायब सूबेदार (पति) और उनकी पत्नी। |
| विवाद की अवधि | 30 साल पुराना वैवाहिक संबंध। |
| कोर्ट का आदेश | ₹3,000 मासिक गुजारा भत्ता और निवास का अधिकार बरकरार। |
| कानूनी आधार | घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act), 2005। |
| मुख्य बिंदु | स्वरोजगार (सिलाई) गुजारा भत्ता रोकने का आधार नहीं है। |
पत्नी ने राहत की मांग संबंधी याचिका दायर की थी
एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पति अपनी पहली पत्नी को निवास स्थान (Residence) और भरण-पोषण (Maintenance) प्रदान करने के अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो सकता। जस्टिस राकेश कैंथला ने एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी (Retire Army Man) की पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए कहा कि पति का दूसरी महिला के साथ रहना ही पत्नी के लिए अलग रहने और भरण-पोषण मांगने का पर्याप्त आधार है। यह मामला एक सेवानिवृत्त नायब सूबेदार और उनकी पत्नी के बीच का है, जिनकी शादी को लगभग 30 साल हो चुके हैं। पत्नी ने घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम (DV Act), 2005 के तहत राहत की मांग की थी।
मामला और पृष्ठभूमि
- विवाद: पत्नी का आरोप था कि शादी के 30 साल बाद पति ने उसे प्रताड़ित करना शुरू किया और विवाहेतर संबंध (Extramarital relations) विकसित कर उसे घर से निकाल दिया।
- दूसरी शादी: पति ने अदालत में स्वीकार किया कि वह दूसरी महिला के साथ रह रहा है, लेकिन दावा किया कि यह विवाह उसकी पहली पत्नी के सुझाव पर हुआ था।
- आय का विवरण: पति भारतीय सेना से सेवानिवृत्त है और उसे लगभग ₹25,000 मासिक पेंशन मिलती है। पत्नी ने दावा किया कि कृषि और अन्य स्रोतों से उसकी कुल आय ₹38,000 से अधिक है।
कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- अदालत ने पति की दलीलों को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण बातें कहीं।
- जीविका के प्रयास और हक: पति ने तर्क दिया कि पत्नी सिलाई का काम करके ₹3000-₹4000 कमा रही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी जीवित रहने के लिए कुछ काम करने की कोशिश कर रही है, तो केवल इस आधार पर उसे भरण-पोषण देने से मना नहीं किया जा सकता।
- पर्याप्त राशि: कोर्ट ने माना कि पत्नी को पहले मिल रहे ₹2,000 मासिक “न्यूनतम मजदूरी” की तुलना में भी काफी कम थे। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा अतिरिक्त ₹1,000 (कुल ₹3,000) का आदेश बिल्कुल सही है।
- निवास का अधिकार: चूंकि पति दूसरी महिला के साथ रह रहा है, इसलिए पत्नी उसके साथ रहने के लिए मजबूर नहीं है। पति का यह “कानूनी दायित्व” है कि वह उसे रहने के लिए स्थान (Residence) उपलब्ध कराए।
‘दूसरे परिवार’ का तर्क खारिज
- पति के वकील ने दलील दी कि उसे अपनी दूसरी पत्नी और बच्चों का भी भरण-पोषण करना है, जिसे कोर्ट ने नजरअंदाज कर दिया।
- अदालत का रुख: हाई कोर्ट ने राज्य के वकील की दलील से सहमति जताई कि दूसरी शादी का स्वीकारोक्ति ही पहली पत्नी के लिए अलग रहने और दावा करने का “न्यायोचित कारण” (Justifiable Reason) है। दूसरी शादी की जिम्मेदारी पहली पत्नी के अधिकारों को कम नहीं कर सकती।
महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का संरक्षण
यह फैसला उन महिलाओं के लिए एक सुरक्षा कवच है जिन्हें उम्र के इस पड़ाव पर बेसहारा छोड़ दिया जाता है। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पति की सामाजिक या व्यक्तिगत परिस्थितियाँ (जैसे दूसरी शादी) उसे उसकी पहली कानूनी पत्नी के प्रति वैधानिक जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं करतीं।

