Thursday, June 25, 2026
HomeHigh CourtMutual Consent: जब मियां-बीबी राजी तो क्या करेगा… जब दंपति की सहमति...

Mutual Consent: जब मियां-बीबी राजी तो क्या करेगा… जब दंपति की सहमति है तो फैमिली कोर्ट तलाक से इनकार नहीं कर सकते, यह आर्डर पढ़ें

Mutual Consent: केरल हाई कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय (Family Court) के एक फैसले को पलट दिया कि आपसी सहमति है तो तलाक देने से इंकार नहीं कर सकते हैं।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणतथ्य
संबंधित कानूनतलाक अधिनियम, 1869 (Divorce Act) की धारा 10-A।
मुख्य बिंदुआपसी सहमति होने पर अलग रहने का ‘कारण’ पूछना अनिवार्य नहीं।
केरल HC का आदेशफैमिली कोर्ट का फैसला रद्द; शादी को भंग (Dissolve) करने का आदेश।
सहमति का महत्वजब तक सहमति लिखित या मौखिक रूप से वापस न ली जाए, वह प्रभावी रहती है।

शादी के कुछ ही समय बाद अलग होने का फैसला किया

हाईकोर्ट के जस्टिस जे. निशा बानू और जस्टिस शोभा अन्नम्मा एपेन की खंडपीठ ने कहा कि आपसी सहमति के मामलों में कोर्ट का काम केवल यह देखना है कि विवाह वैध था और क्या दोनों पक्ष अपनी मर्जी से तलाक के लिए सहमत हैं। हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है कि यदि पति-पत्नी आपसी सहमति (Mutual Consent) से तलाक चाहते हैं, तो अदालत इस आधार पर तलाक देने से मना नहीं कर सकती कि वे “बिना किसी ठोस कारण” के अलग रह रहे थे।यह मामला तलाक अधिनियम (Divorce Act), 1869 की धारा 10-A के तहत दायर एक संयुक्त याचिका से जुड़ा है। रोमन कैथोलिक ईसाई समुदाय के इस जोड़े ने शादी के कुछ ही समय बाद आपसी मतभेदों के कारण अलग होने का फैसला किया था।

फैमिली कोर्ट की गलती क्या थी?

निचली अदालत (फैमिली कोर्ट) ने तलाक की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि पति ने बयान दिया था कि वे “बिना किसी वैध कारण” के अलग रह रहे हैं। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि उनके बीच वास्तव में ‘आपसी सहमति’ नहीं है और उनमें से एक पक्ष ने सहमति वापस ले ली है।

हाई कोर्ट का कानूनी तर्क: ‘सहमति’ की परिभाषा

  • हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों और बयानों (Depositions) की समीक्षा करने के बाद निम्नलिखित टिप्पणियाँ कीं।
  • सहमति की निरंतरता: रिकॉर्ड से पता चलता है कि न तो पति और न ही पत्नी ने कभी अपनी सहमति वापस ली। दोनों ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वे तलाक चाहते हैं।
  • अनावश्यक निष्कर्ष: हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट का यह निष्कर्ष ‘अनुचित’ था कि सहमति वापस ले ली गई है। केवल इसलिए कि उन्होंने “बिना कारण अलग रहने” की बात कही, उनकी आपसी सहमति को अवैध नहीं माना जा सकता।
  • अदालत की जांच का दायरा: धारा 10-A के तहत, कोर्ट को बस यह जांच करनी चाहिए कि क्या विवाह संपन्न हुआ था और क्या याचिका में किए गए दावे (कि वे अब साथ नहीं रह सकते) सच हैं।

मामले की पृष्ठभूमि (Factual Background)

  • शादी: वर्ष 2023 में चर्च में ईसाई रीति-रिवाजों से विवाह हुआ।
  • विवाद: शादी के तुरंत बाद मतभेद शुरू हुए और सुलह की कोशिशें नाकाम रहीं।
  • प्रक्रिया: दोनों ने संयुक्त याचिका दायर की। 6 महीने की ‘कूलिंग पीरियड’ (प्रतीक्षा अवधि) और काउंसलिंग के बाद भी वे अपने फैसले पर अडिग रहे।
  • परिणाम: फैमिली कोर्ट द्वारा याचिका खारिज होने के बाद पत्नी ने हाई कोर्ट में अपील की, जिसे अब स्वीकार कर लिया गया है।

व्यक्तिगत स्वायत्तता का सम्मान

केरल हाई कोर्ट का यह फैसला संदेश देता है कि जब दो वयस्क व्यक्ति कानूनी रूप से अपने रिश्ते को खत्म करने का फैसला कर लेते हैं, तो न्यायपालिका को उनके व्यक्तिगत कारणों की गहराई में जाकर बाधा उत्पन्न नहीं करनी चाहिए, बशर्ते सहमति स्वैच्छिक हो।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
overcast clouds
37 ° C
37 °
37 °
33 %
1.3kmh
90 %
Thu
44 °
Fri
46 °
Sat
46 °
Sun
44 °
Mon
41 °

Recent Comments