Death Of Estate Leaver: बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा पीठ ने मई 2026 में गोवा उत्तराधिकार कानून से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अधिकारों के अंतर को समझाया
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस आशीष एस. चव्हाण की खंडपीठ ने इस फैसले में ‘अधिकारों के निहित होने’ (Vesting of Rights) और ‘अधिकारों के स्पष्ट/तय होने’ (Crystallisation of Rights) के बीच के कानूनी अंतर को स्पष्ट किया है। अदालत ने ‘गोवा उत्तराधिकार, विशेष नोटरी और सूची कार्यवाही (संशोधन) अधिनियम, 2022 और 2023’ की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह बरकरार रखा है।
मृत्यु के पहले बिना वसीयत का मामला
यह मामला उन परिवारों से जुड़ा था जहाँ किसी व्यक्ति की मृत्यु 2022 और 2023 के संशोधनों से पहले बिना वसीयत किए (Intestate) हो गई थी। मूल 2012 के अधिनियम के तहत, उत्तराधिकार के क्रम में माता-पिता और भाई-बहनों को वरीयता या विशिष्ट स्थान प्राप्त था। लेकिन नए संशोधनों के बाद, जीवित जीवनसाथी (Surviving Spouse) को प्राथमिकता दी गई, जिससे पुराने वारिसों को लंबित सूची कार्यवाही (Inventory Proceedings) से बाहर कर दिया गया था। इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं।
कोर्ट का मुख्य कानूनी सिद्धांत: ‘निहित होना’ बनाम ‘तय होना’
- हाई कोर्ट ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि सूची कार्यवाही पूरी होने तक अधिकार निहित नहीं होते। कोर्ट ने कानून की व्याख्या करते हुए दो महत्वपूर्ण चरण स्पष्ट किए।
- अधिकार का तुरंत निहित होना (Vesting): 2012 के अधिनियम की धारा 8 और 13 के तहत, जैसे ही किसी संपत्ति के मालिक (Estate Leaver) की मृत्यु होती है, उत्तराधिकार के अधिकार उसी क्षण (Immediately) उसके कानूनी वारिसों में निहित (Transmit) हो जाते हैं। इसके लिए किसी अदालती कार्यवाही की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है।
- अधिकारों का तय होना (Crystallisation): हालांकि अधिकार मृत्यु के तुरंत बाद निहित हो जाते हैं, लेकिन उन्हें अंतिमता या स्पष्टता (Crystallisation) केवल एक अंतिम अदालती डिक्री (Final Decree) या पंजीकृत विभाजन विलेख (Registered Partition Deed) के बाद ही मिलती है।
पूर्वव्यापी (Retroactive) संशोधन को क्यों माना वैध?
- याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि विधायिका उनके उन “निहित अधिकारों” को नहीं छीन सकती जो वसीयतकर्ता की मृत्यु के समय ही उन्हें मिल चुके थे।
- विधायिका की शक्ति: विधायिका के पास कानून में पूर्वव्यापी (पीछे की तारीख से) संशोधन करके इन वैधानिक अधिकारों को बदलने की पूरी क्षमता है।
- लंबित मामलों पर लागू: 2023 का संशोधन 21 दिसंबर, 2016 से प्रभावी माना गया है। कानून में दी गई व्याख्या के अनुसार, जिन मामलों में अंतिम डिक्री आ चुकी है (अधिकार तय हो चुके हैं), उन्हें नहीं बदला जाएगा। लेकिन जो मामले या अपील वर्तमान में विभिन्न अदालतों में लंबित (Pending) हैं, वे उत्तराधिकार के नए नियमों (जीवित जीवनसाथी को प्राथमिकता) के तहत ही संचालित होंगे।
जीवनसाथी को प्राथमिकता देना सही नीतिगत निर्णय
अदालत ने गोवा के विशिष्ट सामाजिक और कानूनी ढांचे (Communion of Assets) का हवाला देते हुए जीवित जीवनसाथी को माता-पिता या भाई-बहनों से ऊपर प्राथमिकता देने के विधायी निर्णय को तार्किक और वैध माना। अदालत ने कहा कि सूची कार्यवाही का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत हिस्सों को चिन्हित और विभाजित करना है।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| कानूनी बिंदु | हाई कोर्ट का निष्कर्ष / फैसला |
| अदालत | बॉम्बे हाई कोर्ट, गोवा पीठ (जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस आशीष एस. चव्हाण)। |
| अधिकार कब मिलता है? | संपत्ति के मालिक की मृत्यु के तुरंत बाद (Vesting)। |
| अधिकार अंतिम कब होता है? | अंतिम अदालती डिक्री या रजिस्टर्ड बंटवारे के बाद (Crystallisation)। |
| संशोधन का प्रभाव | 2022 और 2023 के नए उत्तराधिकार नियम सभी लंबित मामलों और अपीलों पर लागू होंगे। |
| किसे मिलेगी प्राथमिकता? | अब लंबित मामलों में जीवित पति/पत्नी को माता-पिता और भाई-बहनों पर प्राथमिकता मिलेगी। |
लंबित विवादों पर सीधा असर
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि गोवा में उत्तराधिकार से जुड़े जितने भी मामले अदालतों में लंबित हैं, उनमें अब नए संसोधित नियम लागू होंगे। यदि किसी मामले में अभी तक अंतिम रूप से बंटवारा तय नहीं हुआ है, तो जीवित जीवनसाथी का अधिकार अन्य रिश्तेदारों (जैसे भाई-बहन या माता-पिता) से ऊपर माना जाएगा। हाई कोर्ट ने सभी रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसलों को सही ठहराया है।

