Suo Motu: दिल्ली हाईकोर्ट ने आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज, दुर्गेश पाठक, देवेश विश्वकर्मा और विनय मिश्रा के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेते हुए अपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की है।
सोशल मीडिया पर जजों और उनके परिवारों को निशाना
हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने सोशल मीडिया पर जजों और उनके परिवारों को निशाना बनाकर चलाए जाने वाले ‘विच हंट’ और ‘दुष्प्रचार अभियानों’ पर बेहद सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि ताकतवर वादियों (Litigants) को डराने-धमकाने और न्याय के सोते को प्रदूषित करने (Poison the fountain of justice) की अनुमति नहीं दी जा सकती।
दिल्ली आबकारी नीति से जुड़ा मामला
यह पूरा मामला दिल्ली आबकारी नीति (Delhi Excise Policy Case) से जुड़ी एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) के दौरान शुरू हुआ। कोर्ट द्वारा 9 मार्च, 2026 को नोटिस जारी किए जाने के बाद, कुछ आरोपियों ने जज पर राजनीतिक झुकाव का आरोप लगाते हुए मामले से हटने (Recusal) की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने 20 अप्रैल, 2026 को खारिज कर दिया था।
सोशल मीडिया पर चलाया गया ‘टारगेटेड कैंपेन’
- अदालत ने पाया कि आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती देने के बजाय, नेताओं और उनकी पार्टी ने ‘X’ (ट्विटर) और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर एक समन्वित (Coordinated) अभियान शुरू किया।
- भ्रामक वीडियो का प्रसार: जज की सत्यनिष्ठा पर सवाल उठाने के लिए उनके द्वारा काशी में दिए गए एक पुराने व्याख्यान (Lecture) के संपादित (Edited) और भ्रामक क्लिप सोशल मीडिया पर प्रसारित किए गए।
- न्यायाधीश के परिवार को घसीटना: कोर्ट ने गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा कि जजों को मानसिक रूप से प्रताड़ित और अपमानित करने के लिए उनके परिवारों को भी इस विवाद में घसीटा गया।
- अदालती कार्यवाही का बहिष्कार: अरविंद केजरीवाल और अन्य नेताओं ने अदालत की कार्यवाही में शामिल न होने की घोषणा की और अपनी अनुपस्थिति को “सत्याग्रह” का नाम दिया।
कोर्ट की सख्त टिप्पणियां: “हजार बार बोला गया झूठ सच नहीं बनता”
- जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने आदेश में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को रेखांकित करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कहीं।
- आलोचना की आड़ में धमकी मंजूर नहीं: “एक झूठ को हजार बार बोलने से वह सच नहीं बन जाता। आलोचना के लिबास में छिपी धमकी को अवमानना कानून से छूट नहीं मिल सकती।”
- सहानुभूति या तालियों की जरूरत नहीं: “यह अदालत न तो सहानुभूति मांगती है और न ही आलोचना से मुक्ति। इस अदालत को तालियों की आवश्यकता नहीं है; यह जनता के संवैधानिक विश्वास पर काम करती है।”
- संविधान के प्रति निष्ठा: अदालत का प्राथमिक कर्तव्य संविधान के प्रति वफादार रहना है, न कि सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से दबाव बनाने वाले शक्तिशाली वादियों की उम्मीदों को पूरा करना।
जज ने खुद को नहीं हटाया (No Recusal), लेकिन मामला दूसरी बेंच को भेजा
- अदालत ने साफ किया कि वह किसी दबाव या अपमान के डर से मामले से पीछे नहीं हट रही है, बल्कि न्यायिक औचित्य (Judicial Propriety) के कारण मुख्य मामले को दूसरी बेंच को भेज रही है।
- ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने का मौका नहीं: जज ने कहा कि अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के बाद यदि वही बेंच मुख्य मामले को सुनती, तो आरोपी खुद को ‘पूर्वाग्रह का शिकार’ (Victims of Bias) दिखाकर नया नैरेटिव (प्रचार) शुरू कर देते। कोर्ट आरोपियों को यह विवाद खड़ा करने का मौका नहीं देना चाहती।
- कानून का शासन: कोर्ट का पेन (Pen) बदनामी के डर से नहीं, बल्कि पूरी तरह से कानून के शासन (Rule of Law) से संचालित होता है।
मुख्य हाइलाइट्स (Quick Summary)
| बिंदु | विवरण |
| अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा)। |
| किनके खिलाफ कार्यवाही? | अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज और अन्य। |
| आरोप | सोशल मीडिया (‘X’, YouTube) पर जजों और उनके परिवारों के खिलाफ अपमानजनक अभियान चलाना। |
| अदालत का कदम | स्वत: संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना का मामला दर्ज; मुख्य केस और अवमानना मामला दूसरी बेंच को ट्रांसफर। |
मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया मामला
हाई कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि इन नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना का मामला दर्ज कर इसे आवंटन के लिए मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के समक्ष पेश किया जाए, ताकि इसे किसी अन्य बेंच को सौंपा जा सके। इस कड़े फैसले से न्यायपालिका ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि राजनीतिक रसूख और सोशल मीडिया की ताकत का इस्तेमाल अदालतों को डराने या उनकी छवि धूमिल करने के लिए नहीं किया जा सकता।

