Court Boycott: त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने कहा, बार एसोसिएशन (Bar Association) उन वकीलों को दंडित या निलंबित नहीं कर सकते जो बार के घोषित अदालती बहिष्कार (Boycott) की कॉल के बावजूद अदालत में पेश होते हैं।
संपद चौधरी बनाम त्रिपुरा राज्य व अन्य केस में हुई सुनवाई
जस्टिस टी. अमरनाथ गौड़ की एकल पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश में यह साफ करते हुए एक जूनियर वकील को राहत दी। कहा कि एक वकील की अपने मुवक्किल (Client) और अदालत के प्रति वैधानिक जिम्मेदारी किसी भी बार बॉडी के सामूहिक फैसले या प्रस्ताव से ऊपर है। यह मामला संपद चौधरी बनाम त्रिपुरा राज्य व अन्य के नाम से है। याचिकाकर्ता, जो कि त्रिपुरा बार एसोसिएशन के एक जूनियर सदस्य हैं, ने बार एसोसिएशन द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) और उसके बाद किए गए अपने निलंबन (Suspension) को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
मामला क्या था? (The Background)
- बहिष्कार का प्रस्ताव: त्रिपुरा बार एसोसिएशन ने 19 जनवरी, 2026 को एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें सदस्यों से अगरतला स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (District Consumer Forum) के समक्ष पेश न होने (कार्य बहिष्कार करने) का आह्वान किया गया था।
- वकील की पेशी: जूनियर वकील ने अपने पेशेवर दायित्वों को निभाते हुए 6 फरवरी को उपभोक्ता फोरम के सामने अपने क्लाइंट का पक्ष रखा।
- बार की कार्रवाई: बार एसोसिएशन ने इसे अपने प्रस्ताव का जानबूझकर उल्लंघन माना और अगले ही दिन (7 फरवरी) वकील को कारण बताओ नोटिस जारी कर निलंबित कर दिया। हालांकि, ‘बार काउंसिल ऑफ त्रिपुरा’ (Bar Council of Tripura) ने इस कार्रवाई पर रोक लगा दी थी, लेकिन एसोसिएशन फिर भी कार्रवाई पर अड़ा रहा।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: कानून के खिलाफ है बार पदाधिकारियों का रवैया
- जस्टिस टी. अमरनाथ गौड़ ने बार एसोसिएशन के इस कदम की कड़े शब्दों में निंदा की।
- वैधानिक कर्तव्य सर्वोपरि: ‘अधिवक्ता अधिनियम’ (Advocates Act) के तहत अदालतों की सहायता करना और मुवक्किलों का प्रतिनिधित्व करना एक वकील का वैधानिक कर्तव्य है। बार एसोसिएशन का कोई भी नियम या उप-नियम (Bye-law) इस वैधानिक कर्तव्य को कम या बाधित नहीं कर सकता।
- नियमों में नहीं है बहिष्कार: “बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों की कार्रवाई पूरी तरह से कानून के विपरीत है और इसकी सराहना नहीं की जा सकती। किसी भी बार काउंसिल या बार एसोसिएशन के नियम और कानून अदालतों के बहिष्कार की मांग नहीं करते हैं।”
- कार्रवाई मनमानी: कोर्ट ने बार द्वारा जूनियर वकील के खिलाफ अपनाए गए रवैये को पूरी तरह से “अप्रासंगिक, बाहरी और मनमाना” करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों पर मुहर
- त्रिपुरा हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए ऐतिहासिक फैसलों (जैसे पूर्व कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ) का हवाला देते हुए दोहराया कि वकीलों को हड़ताल पर जाने या अदालतों का बहिष्कार करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इस तरह की कार्रवाइयां पूरी तरह से अनुचित और कानूनन अस्वीकार्य हैं।
- अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह ऐसा समय है जब न्यायपालिका को कानूनी बिरादरी की गरिमा और महिमा की रक्षा के लिए आगे आना होगा।
कोर्ट का अंतिम निर्देश
- हाई कोर्ट ने बार एसोसिएशन के 19 जनवरी के बहिष्कार प्रस्ताव और जूनियर वकील के खिलाफ की गई सभी दंडात्मक कार्रवाइयों पर तत्काल प्रभाव से रोक (Stay) लगा दी है।
- पीड़ित जूनियर वकील को बिना किसी डर या बाधा के सभी अदालतों और मंचों पर पेश होने की पूरी अनुमति दी गई है।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| बिंदु | मुख्य विवरण |
| अदालत | त्रिपुरा उच्च न्यायालय (जस्टिस टी. अमरनाथ गौड़)। |
| मामला | संपद चौधरी बनाम त्रिपुरा राज्य व अन्य (मई 2026)। |
| मुख्य विवाद | बार एसोसिएशन द्वारा अदालती बहिष्कार की कॉल का उल्लंघन करने पर जूनियर वकील का निलंबन। |
| अदालत का निर्णय | निलंबन और कारण बताओ नोटिस पर रोक; वकीलों को हड़ताल या बहिष्कार का अधिकार नहीं। |
जूनियर वकीलों के लिए बड़ी राहत
यह फैसला देश भर के उन जूनियर वकीलों के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच है जो अक्सर बार एसोसिएशनों के राजनीतिक या सामूहिक फैसलों और अपने मुवक्किलों के प्रति पेशेवर कर्तव्यों के बीच पिस जाते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी भी वकील को केवल इसलिए प्रताड़ित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने कानून और अपने क्लाइंट के हित को प्राथमिकता दी है।
HIGH COURT OF TRIPURA AGARTALA
HON’BLE JUSTICE DR. T. AMARNATH GOUD
IA No. 01 of 2026 in WP(C) No. 305 of 2026
Sri Sampad Choudhury
Versus
The State Of Tripura & Others.

