Monday, August 17, 2026
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Aged mother: बेटे-बेटी संपत्ति हड़पकर ऐश कर रहे…उधर मां किराए के मकान में रहने को मजबूर है, केस से समझें इस संसार की दुखभरी कहानी

Aged mother: कर्नाटक हाईकोर्ट ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक बेहद भावुक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

सेवानिवृत्त सरकारी स्कूल शिक्षिका का मामला

हाईकोर्ट के न्यायाधीश सचिन शंकर मगादम की एकल पीठ ने 44 वर्षीय बेटी (आर. पवित्रा) की याचिका को खारिज करते हुए, उसकी 62 वर्षीय मां (जी. हेमा) के पक्ष में ‘गिफ्ट डीड’ (उपहार विलेख) को रद्द करने और संपत्ति वापस सौंपने के प्रशासनिक आदेश को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी बेटी अपनी वृद्ध मां की देखभाल करने के “कानूनी, नैतिक और सामाजिक” कर्तव्य से पीछे नहीं हट सकती। यह मामला एक सेवानिवृत्त सरकारी स्कूल शिक्षिका (जी. हेमा) का है, जिन्होंने अपने बच्चों के बहकावे में आकर अपनी स्व-अर्जित (Self-acquired) संपत्ति उनके नाम कर दी थी, ताकि उसके किराए से उनकी आजीविका चल सके। लेकिन संपत्ति मिलते ही बच्चों ने मां को बेसहारा छोड़ दिया।

मामला क्या था? (Background of the Dispute)

  • पारिवारिक विवाद: पति के साथ अनबन के कारण 62 वर्षीय हेमा करीब साढ़े तीन साल तक अपनी बेटी पवित्रा के साथ उसके घर में रहीं। इस दौरान उनके बच्चों (बेटी पवित्रा और बेटे आर. वेणुगोपाल) ने उन्हें सलाह दी कि वे अपनी संपत्ति को ‘गिफ्ट डीड’ के जरिए उनके नाम ट्रांसफर कर दें, और उस संपत्ति से मिलने वाले किराए का इस्तेमाल उनकी (मां की) देखभाल के लिए किया जाएगा।
  • संपत्ति मिलते ही प्रताड़ना: मां ने बच्चों पर भरोसा करके गिफ्ट डीड कर दी। इसके बाद बेटे-बेटी ने संपत्ति के अलग-अलग हिस्सों से किराया वसूलना शुरू कर दिया, लेकिन मां को बुनियादी जरूरतें और वित्तीय सुरक्षा देने के बजाय मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।
  • किराए के मकान में रहने को मजबूर: नौबत यहां तक आ गई कि मां को खुद रहने के लिए एक दूसरा मकान किराए पर लेना पड़ा, जबकि उनके खुद के घर का किराया उनके बच्चे वसूल रहे थे।

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कानून की तकनीकी खामी का फायदा उठाने की कोशिश

परेशान होकर मां ने ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007’ की धारा 23(1) के तहत मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल (रखरखाव न्यायाधिकरण) का दरवाजा खटखटाया। ट्रिब्यूनल ने गिफ्ट डीड को रद्द कर संपत्ति मां को लौटाने का आदेश दिया। इस फैसले को डिप्टी कमिश्नर ने भी बरकरार रखा। इसके खिलाफ बेटी पवित्रा ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। बेटी की मुख्य दलील यह थी कि “गिफ्ट डीड (दस्तावेज) में कहीं भी यह लिखित शर्त (Express Condition) नहीं थी कि संपत्ति के बदले उसे अपनी मां का भरण-पोषण करना होगा। यह संपत्ति केवल प्रेम और स्नेह के कारण दी गई थी, इसलिए इसे रद्द नहीं किया जा सकता।”

हाई कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी: लिखित शर्त जरूरी नहीं, आचरण ही काफी है

  • जस्टिस सचिन शंकर मगादम ने बेटी की ‘हाइपर-टेक्निकल’ (अति-तकनीकी) दलीलों को पूरी तरह खारिज करते हुए कानून की व्यापक परिभाषा तय की।
  • निहित आश्वासन (Implied Condition): कोर्ट ने कहा कि हर मामले में दस्तावेज के भीतर औपचारिक रूप से यह लिखना जरूरी नहीं है कि बच्चे माता-पिता की सेवा करेंगे। जब एक बुजुर्ग मां अपनी जीवनभर की कमाई बच्चों को सौंप देती है, तो उसमें देखभाल और सुरक्षा का एक अंतर्निहित (Implicit) भरोसा शामिल होता है।
  • बेटी का आचरण निंदनीय: अदालत ने नोट किया कि याचिकाकर्ता (बेटी) के पास खुद का एक स्वतंत्र मकान है, फिर भी उसने अपनी बुजुर्ग मां को किराए के मकान में रहने के लिए मजबूर किया। यह उनका नैतिक और वैधानिक कर्तव्य निभाने में पूरी तरह विफलता को दर्शाता है।
  • कानून का उद्देश्य: कोर्ट ने कहा कि यह अधिनियम वरिष्ठ नागरिकों को बेसहारा होने और उपेक्षा से बचाने के लिए बनाया गया एक कल्याणकारी कानून (Beneficial Legislation) है। इसे केवल शब्दों की तकनीकी कमी के आधार पर निष्प्रभावी (Otiose) नहीं बनाया जा सकता।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य बिंदुविवरण
माननीय न्यायाधीशजस्टिस सचिन शंकर मगादम
अधिनियम/कानूनवरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 (धारा 23)
अदालत का संदेशयदि बच्चे संपत्ति लेने के बाद माता-पिता को बुनियादी सुविधाएं और वित्तीय सुरक्षा नहीं देते, तो वह हस्तांतरण ‘धोखाधड़ी या दबाव’ के तहत माना जाएगा और रद्द कर दिया जाएगा।
अंतिम आदेशबेटी की याचिका खारिज; बुजुर्ग मां को उनकी संपत्ति और उसका किराया वापस मिलेगा।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए बड़ा संबल

कर्नाटक उच्च न्यायालय का यह फैसला उन सभी बच्चों के लिए एक कड़ा सबक है जो माता-पिता की संपत्ति तो ले लेते हैं लेकिन बुढ़ापे में उनकी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि भारतीय समाज और कानून में बुजुर्गों की देखभाल करना केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य बाध्यता है।

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