Thursday, August 20, 2026
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Public Employment: स्वीकृत पद है नहीं तो स्थायी कैसे कर दें…यह तो बैकडोर एंट्री देने जैसा हो जाएगा, IIT के लीगल ऑफिसर की याचिका पर यह टिप्पणी क्यों दी, पढ़ें

Public Employment: बंबई उच्च न्यायालय (Bombay High Court) ने सार्वजनिक रोजगार (Public Employment) और संविदात्मक सेवा (Contractual Service) को लेकर एक बड़ा सिद्धांत दोहराया है।

लीगल ऑफिसर की सेवा नियमित करने का मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस आर आई छागला और जस्टिस अद्वैत एम सेठना की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पात्रता और स्वीकृत पद (Sanctioned Post) न होने के बावजूद किसी को स्थायी करना सार्वजनिक रोजगार में “बैकडोर एंट्री” (पीछे के दरवाजे से प्रवेश) देने जैसा होगा, जिसकी कानूनन अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) में लगभग एक दशक (10 वर्ष) तक कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले एक लीगल ऑफिसर की सेवा नियमित (Regularise) करने की याचिका को खारिज कर दिया।

लीगल ऑफिसर ने टर्मिनेशन नोटिस को चुनौती दी थी

यह मामला युवराज बालासाहेब व्हराम्बले (Yuvraj Balasaheb Vharamble) का है, जो 2016 में आईआईटी बॉम्बे में एक्जीक्यूटिव ऑफिसर (लीगल) के पद पर संविदा के आधार पर शामिल हुए थे। मार्च में उन्हें एक नोटिस मिला, जिसमें सूचित किया गया कि उनका कार्यकाल 23 अप्रैल को समाप्त हो रहा है और इसे आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। याचिकाकर्ता ने इस टर्मिनेशन नोटिस को चुनौती देते हुए कोर्ट से खुद को स्थायी करने या डिप्टी रजिस्ट्रार (लीगल) के पद पर नियमित करने और वेतन बकाया की मांग की थी।

हाई कोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की? (The Court’s Reasoning)

  • उच्च न्यायालय ने आईआईटी बॉम्बे के पक्ष को सही ठहराते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु सामने रखे।
  • पद स्वीकृत नहीं था (Not a Sanctioned Post): अदालत ने पाया कि ‘एक्जीक्यूटिव ऑफिसर (लीगल)’ का पद कोई स्वीकृत या परमानेंट पद नहीं था। इसे केवल उस समय की प्रशासनिक आवश्यकताओं (Administrative Exigencies) को पूरा करने के लिए अस्थायी रूप से बनाया गया था।
  • शर्तें बिल्कुल स्पष्ट थीं: 2015 में जारी मूल विज्ञापन और 2016 के ऑफर लेटर में साफ तौर पर लिखा था कि यह पद ‘अस्थायी’ है और नियुक्ति 3 साल के कॉन्ट्रैक्ट पर है। इसके बाद समय-समय पर जब उनका कार्यकाल बढ़ाया गया या वेतन में बढ़ोतरी की गई, तब भी हर कार्यालय आदेश (Office Order) में यह स्पष्ट लिखा था कि “बाकी सभी नियम और शर्तें अपरिवर्तित रहेंगी।”
  • संविधान के अनुच्छेदों का हवाला: अदालत ने कहा कि प्रशासन में निष्पक्षता और पारदर्शिता कोई दया की बात नहीं है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत दायित्व हैं। बिना किसी तय प्रक्रिया के किसी अस्थायी कर्मचारी को परमानेंट करना उन नियमों का उल्लंघन होगा।

दोनों पक्षों के मुख्य तर्क (Arguments presented)

  • याचिकाकर्ता (लीगल ऑफिसर) के तर्क: वकील असीम नफाड़े ने दलील दी कि केवल ‘अस्थायी’ या ‘संविदात्मक’ शब्दों का इस्तेमाल करके नियोक्ता किसी को उसके संवैधानिक रोजगार के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता। याचिकाकर्ता के काम का रिकॉर्ड बेहतरीन था, उन्हें लगातार इंक्रीमेंट मिले और उनके खिलाफ कभी कोई शिकायत नहीं थी। 10 साल की लंबी सेवा के बाद केवल उम्र सीमा या तकनीकी कारणों से उन्हें हटाना मनमाना और अनुचित है।
  • प्रतिवादी (IIT बॉम्बे) के तर्क: आईआईटी बॉम्बे की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नौशाद इंजीनियर ने संस्थान के चार्टर और कानूनों (IIT Statutes) का हवाला दिया, जो नियमित रोजगार और संविदात्मक रोजगार के बीच स्पष्ट अंतर पैदा करते हैं। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता का रोजगार शुरू से ही पूरी तरह संविदात्मक था और पद की प्रकृति कभी भी स्थायी नहीं थी, जिसे याचिकाकर्ता ने खुद स्वीकार किया था।

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अदालत की मानवीय राहत

हालांकि हाई कोर्ट ने लीगल ऑफिसर को नौकरी पर बनाए रखने या नियमित करने से साफ इनकार कर दिया, लेकिन मानवीय आधार पर कोर्ट ने उन्हें 8 जून 2026 तक आईआईटी बॉम्बे के आधिकारिक आवास (Official Residence/Accommodation) में रहने की अनुमति दे दी है, ताकि वे इस बीच अपनी वैकल्पिक व्यवस्था कर सकें।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य बिंदुअदालत का कानूनी निष्कर्ष
माननीय न्यायाधीशजस्टिस आर आई छागला और जस्टिस अद्वैत एम सेठना
याचिकाकर्तायुवराज बालासाहेब व्हराम्बले (कार्यकाल: 2016 से 2026 तक संविदा पर)
संस्थानभारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे
अदालत का मूल सिद्धांतसंविदा पर लंबे समय तक काम करना सार्वजनिक रोजगार में सीधे स्थायी होने का कानूनी अधिकार नहीं देता।
आवास राहत8 जून 2026 तक सरकारी क्वार्टर में रहने की छूट।

संविदा कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी संदेश

बंबई हाई कोर्ट का यह फैसला देश भर के सार्वजनिक और शैक्षणिक संस्थानों में काम कर रहे संविदा कर्मचारियों (Contractual Employees) के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों की पुष्टि करता है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि भले ही किसी कर्मचारी का सेवा रिकॉर्ड बेदाग रहा हो और उसने दशक भर सेवा की हो, लेकिन यदि मूल पद स्वीकृत नहीं है और नियुक्ति विज्ञापन में साफ तौर पर इसे अस्थायी बताया गया था, तो इसे नियमित करना समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ माना जाएगा।

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